ख़्वाब से परे सच
जन्म-जन्म से, रूहें हमारी,
कर्म-क़ानून से बँधी,
जगत में भटकें मारी-मारी।
हर नवजन्म मिले इक मौक़ा,
ज़ंजीर तोड़, ऊँचे चढ़ने का,
सच को पहचानने का।
सतगुरु बन आए प्रकाश दीप हमारे,
राह दिखाएँ घोर अंधियारे।
मेहर-दया से, हुआ हमें दीदार,
अंतर में है राह, जिस पर चल हम उतरे पार।
सिमरन करत, हुआ मन निश्चल,
प्रकट हुआ प्रकाश, दिव्य और असल।
अनहद शब्द, रहनुमा है धारा,
ज़ाहिर हुआ ख़्वाब से परे सच का नज़ारा।
कर्म न बाँधें अब ज़ंजीर।
सफ़र हुआ पूरा, सुरत भरी उड़ान,
सतगुरु प्रेम से, हम पहुँचे नूरी जहान।
- तट पर, किनारे पर।