हम इस प्रेम का अनुभव कर चुके हैं
हमारी इस ज़िंदगी का मक़सद क्या है? संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि हमें मनुष्य शरीर इसलिए मिला है ताकि हम परमात्मा से रिश्ता क़ायम कर सकें। हम अनगिनत जन्मों और योनियों में रिश्ते-नातों, उपलब्धियों, इंद्रियों के सुखों का अनुभव कर चुके हैं। हम चौरासी के चक्र में फँसे हुए हैं, यहाँ मिलने वाली नश्वर चीज़ों और सुखों के मोह में खोए हुए हैं और इस भ्रम का शिकार हैं कि हमें इस दुनिया में असल और स्थायी सुख मिल सकता है। दुनियावी चीज़ों में से संतुष्टि की तलाश करते-करते हम अपनी गहरी आंतरिक तड़प को कभी समझ नहीं पाते। हमें किसी चीज़ की कमी महसूस होती है और हम इस कमी को पूरा करना चाहते हैं।
संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि हम जिस तड़प को महसूस करते हैं वह हमारी आत्मा की अपने रचयिता से मिलाप की तड़प है। हम उस शाश्वत प्रेम, आनंद और शांति को ढूँढ़ते हैं जिसे हम कभी जानते थे और अब भूल चुके हैं।
असीसी के सेंट फ्रांसिस हमें बताते हैं कि हम सब अपने असल स्रोत को भूल जाने का दु:ख मना रहे हैं:
अगर एक जादू की छड़ी सूरज को चाँद में बदल दे तो क्या चाँद उस शानदार चमक के खो जाने का शोक नहीं मनाएगा जो पहले कभी उसके पास थी? हम सब अपने असल वुजूद के खो जाने का शोक मना रहे हैं जिसे हम जानते थे और अब हमें उसकी कमी खलती है।
लव पोइम्स फ्रॉम गॉड: ट्वेल्व सेक्रेड वॉएसेस् फ्रॉम द ईस्ट एंड वेस्ट
डैनियल लैडिंस्की द्वारा अनुवादित
हमें याद नहीं है कि प्यार के सागर में डूबे रहना कैसा था। फिर भी मन और कर्मों के भारी बोझ के नीचे दबी हमारी आत्मा उस एहसास को भूली नहीं है। यह दोबारा उस परमात्मा से मिलाप करना चाहती है जो इससे प्यार करता है और जिसके साथ हमारा संबंध है। इनसान परमात्मा का अंश है, परमात्मा ने इनसान को अपने ही रूप में बनाया है इसलिए इनसान में परमात्मा जैसे दिव्य गुण मौजूद हैं और पूरा ब्रह्मांड हमारे इस नश्वर शरीर में समाया हुआ है। लेकिन हम इस अंधकारपूर्ण जगत, दुनियावी चिंताओं के जाल में फँसे हुए हैं। हम अपनी रूहानी विरासत से बेख़बर हैं, अपने पिछले जन्मों में किए कर्मों से अनजान हैं मगर फिर भी पिछले सभी बुरे कर्मों के लिए ज़िम्मेदार हैं।
हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी ब्रह्मांड के उन अटल नियमों के बारे में बताते हैं जो हमें इस सृष्टि में क़ैद रखते हैं:
यह जगत एक बहुत बड़ा जेलखाना है जिसे भूलभुलैया कहा जा सकता है क्योंकि इसमें हज़ारों दरवाज़े हैं जो इतने उलझानेवाले और एक जैसे हैं कि एक बार अंदर जाने के बाद कोई कभी बाहर नहीं निकल सकता।…[वह भूलभुलैया] जिसमें इनसान खो गया है, चौरासी की विशाल भूलभुलैया है, जिसमें वह युगों-युगों तक, एक शरीर से दूसरे शरीर में बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है।…
इस भूलभुलैया में, अलग-अलग शरीर में जन्म लेकर जीव विकास की इस सीढ़ी पर ऊपर-नीचे आते-जाते रहते हैं। कोई भी – इस अंधकारपूर्ण दुखों की नगरी में रहने वाला एक भी जीव – यहाँ तक कि देवता भी जन्म और मृत्यु के चक्र से बचे नहीं हैं।…
बहुत लंबे समय तक निचली योनियों में भटकने के बाद, आत्मा आख़िरकार इनसान के रूप में जन्म लेती है।
डिस्कोर्सेस ऑन संत मत, वॉल्यूम I
इस वर्तमान जन्म में, हम रचना की सीढ़ी के सबसे ऊपरी डण्डे पर हैं। मुक्ति के लिए हमें बस थोड़ी-सी मेहनत करने की ज़रूरत है। हमें समझाया जाता है कि हमें यह मनुष्य शरीर परमात्मा से रिश्ता जोड़ने के लिए मिला है। परमात्मा से नाता जोड़कर इस भूलभुलैया से बाहर निकलने के बजाय हम इसे व्यर्थ गँवा देते हैं। जीवन के अस्थायी, क्षणभंगुर सुखों में लिप्त रहने के कारण हमें अपने कर्मों का हिसाब चुकता करने के लिए फिर से जन्म लेना पड़ता है।
तो फिर, हम उससे रिश्ता कैसे क़ायम कर सकते हैं जो हमारी कल्पना से परे है, जो अगम्य है? हमें परमात्मा से मिलाने और उनके पास वापस जाने का रास्ता दिखाने के लिए, परमात्मा संत-महात्माओं को इस संसार में भेजता है। जब परमात्मा की रज़ा होती है तब जिज्ञासु को किसी ऐसे पूर्ण देहधारी सतगुरु की संगति प्राप्त हो जाती है जिसकी लिव निरंतर परमात्मा से जुड़ी रहती है। नामदान के समय, सतगुरु शिष्य की सुरत को फिर से परमात्मा की रचनात्मक शक्ति ‘शब्द’ से जोड़ देते हैं जो हर जीव के अंदर धुनकारें देती है। हालाँकि ‘शब्द’ हमारे शरीर के रोम-रोम में प्राणों का संचार करता है लेकिन अनगिनत जन्मों में इकट्ठे किए कर्मों के भारी बोझ की वजह से हम इससे अनजान हैं।
‘शब्द’ की निर्मल धुनों को सुनने से हम फिर से परमात्मा की पहचान करने के क़ाबिल बन जाते हैं। शब्द-धुन पर अपना ध्यान एकाग्र करके हम दुनिया का चिंतन करना छोड़ देते हैं और ख़ुद को उसके हवाले कर देते हैं जो हमसे प्यार करता है और हमारा सहारा बनता है। भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा प्रेम के बढ़ने से हमें अपने अंदर परमात्मा की मौजूदगी का एहसास होने लगता है।
शेख़ फ़ख़रुद्दीन इराक़ी लिखते हैं कि वह तब तक अपने प्रियतम को बाहर खोजते रहे जब तक कि उन्होंने अपनी चेतना को अंदर ले जाना नहीं सीख लिया:
मैं पानी की तलाश क्यों करता रहता हूँ
जबकि मैं जीवन देनेवाले पानी पर तैरता हूँ?जब मेरा प्रियतम हमेशा मेरे साथ है
तो मैं इधर-उधर क्यों भागता हूँ?मैंने अंदर देखा और सिर्फ़ तुम्हें पाया –
ऐसा ही होता है
जब कोई भीतर देखना सीख जाता है।
द फेस इन एवरी रोज़
हम परमात्मा के साथ जो रिश्ता क़ायम करते हैं वह हमारी आत्मा के लिए नया नहीं है। हम फिर से उस एक से नाता जोड़ रहे हैं जो हमेशा से हमारे साथ है जो हमारा सबसे नज़दीकी साथी और दोस्त रहा है और जिसने हमें सब कुछ दिया है। अपने खोए हुए प्यार को पाने और इस दुनिया की भूलभुलैया से निकलने की चाबी उस रचनात्मक शक्ति ‘शब्द’ को सुनना है।
14वीं सदी के ईसाई धर्म के संत माइस्टर एकहार्ट, शब्द को “वायु” कहते हैं। आप समझाते हैं कि अज्ञानता की वर्तमान अवस्था में हम रूहानी जगत की ख़ूबसूरती और अद्भुत नज़ारों पर विश्वास करने से इनकार कर सकते हैं। लेकिन एक दिन ‘शब्द’ हमारी अज्ञानता के इस अंधकार को मिटा देगा और हम परमात्मा के साक्षात दर्शन कर पाएँगे।
जन्म से अंधा इनसान बड़ी आसानी से
एक विशाल भू-दृश्य के शानदार नज़ारे को सच मानने से इनकार कर सकता है।
वह उन सभी अजूबों को आसानी से नकार सकता है
जिन्हें वह छू, सूंघ, चख या सुन नहीं सकता।लेकिन एक दिन हवा मेहरबान होगी
और तुम्हारी आँखों को ढकने वाले
उन छोटे-छोटे पैबंदों को हटा देगी।
और तुम्हें परमात्मा इतना स्पष्ट दिखाई देगा
जितना कि तुमने कभी ख़ुद को भी नहीं देखा होगा।
लव पोइम्स फ्रॉम गॉड
वह दिन नज़दीक ही है जब ‘शब्द’ की दिव्य धुन अज्ञानता के पर्दे को हटा देगी और हमारी सत्य की खोज पूर्ण हो जाएगी। भजन-सिमरन के लिए की गई हमारी सभी कोशिशों और संघर्षों का परिणाम हमारी कल्पना से कहीं अधिक होगा। आंतरिक प्रकाश में से सतगुरु का नूरी स्वरूप प्रकट हो जाएगा। हमारे सामने वह होगा जिससे मिलाप के लिए हमारी आत्मा उस दिन से तड़प रही है जब से वह उससे बिछुड़ी है। ‘शब्द’ हमें प्यार से सराबोर करके, हमारे सीमित, तन्हा वुजूद से ऊपर उठाकर रचयिता में फिर से अभेद कर देगा। तब हमारे जीवन का मक़सद पूरा हो जाएगा।