डर से विश्वास तक
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी अनमोल ख़ज़ाना पुस्तक में फ़रमाते हैं, “प्रेम की गहराई को जानने के लिए प्रियतम का वियोग आवश्यक है।” सूफ़ी कामिल दरवेश शम्स तब्रीज़ी ने भी अपने मुरीद रूमी को इबादत में पुख़्ता करने के लिए ख़ुद को अलग करना ज़रूरी समझा था।
जब यह घोषणा हुई कि बाबा जी ने हुज़ूर जसदीप सिंह जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया है तब हम सब डर गए कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है; हममें से बहुत-से लोगों पर यह डर हावी हो गया, भले ही घोषणा में स्पष्ट तौर पर यह कहा गया था कि बाबा जी “पूरी तरह से स्वस्थ हैं।” लेकिन क्या हमने इस पर विश्वास किया? हमने अपने डर को अपने विश्वास पर हावी होने दिया। हममें से कईं लोग मौक़ा मिलते ही भारत पहुँच गए क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाए, हमें बाबा जी के दर्शन करने थे! बहुत-से लोग जो नहीं जा सके, उन्हें इस बात का खेद था, वे चिंतित और बेबस महसूस कर रहे थे। जब तक कि बाबा जी के अगली गर्मियों में होने वाले सत्संग कार्यक्रम की घोषणा नहीं हुई तब तक, हमें भी विश्वास नहीं हुआ कि बाबा जी वाकई स्वस्थ हैं, कम से कम अभी तक तो।
दरियादिल और दयालु बाबा जी ने हम पर तीन तरह से बख़्शिश की जिससे हम सब की चिंता दूर हो गई। सबसे पहले उन्होंने हमें वक़्त दिया ताकि हम उनके देहस्वरूप की जुदाई जोकि अटल सच है, को स्वीकार कर पाएँ और इस दु:ख को विरह में बदलने की और ज़्यादा कोशिश करें जब तक कि वह देहस्वरूप में हमारे साथ हैं। दूसरी बख़्शिश थी दर्शन: वह बहुत सारी जगहों पर गए ताकि हम उनके दर्शन कर सकें।
बाबा जी की तीसरी बख़्शिश थी कि उन्होंने हमें भविष्य के लिए तैयार होने का मौक़ा दिया जिसे टाला नहीं जा सकता। उन्होंने हमें नए सतगुरु के रूप में एक और सहारा दिया जिससे हम नाता जोड़ सकें और धीरे-धीरे उनके लिए अपना प्रेम बढ़ा सकें।
इस समय हमारा अपने सतगुरु के साथ कैसा नाता है? ख़ुशी और सफलता मिलने पर हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं चाहे वे हुज़ूर महाराज जी हों, बाबा जी हों या हुज़ूर जी। मुसीबत और दु:ख की घड़ी में, हम मदद के लिए उन्हें ही पुकारते हैं। चाहे हमारे सतगुरु चोला छोड़ गए हों या वह हमसे मीलों दूर दुनिया के किसी दूसरे कोने में हों, हम मन ही मन उनसे बातें करने लगते हैं और हमें विश्वास होता है कि वह हमारी बात सुन रहे हैं। एक बार जब हुज़ूर जी डेरा में विदेशी सत्संगियों के साथ शाम के समय होनेवाली मीटिंग में अकेले आए तब किसी ने उनसे पूछा कि बाबा जी क्यों नहीं आए। हुज़ूर जी ने बड़ी दृढ़ता से कहा कि बाबा जी उनके साथ हैं। और हुज़ूर महाराज जी तो अकसर सत्संगियों को मज़ाकिया अंदाज़ में कहा करते थे कि वह उनके साथ तब भी होते हैं जब वह देहस्वरूप में मौजूद नहीं होते।
सतगुरु हमारे साथ हैं – भले ही हम उन्हें देख न पाएँ या महसूस न कर पाएँ। हम जहाँ भी हैं, वह वहीं हैं क्योंकि वह शब्द स्वरूप में हमारे अंदर मौजूद हैं। सतगुरु सदा हमारे साथ रहेंगे, चाहे कुछ भी हो, चाहे पहले हमारी मृत्यु हो जाए या वह चोला त्याग दें। उनके साथ हमारा अंदरूनी रिश्ता हमेशा बना रहेगा। हमें इसी रिश्ते पर ध्यान देना है और इसे ही मज़बूत बनाना है। जैसा कि हुज़ूर महाराज जी ने फ़रमाया है:
सतगुरु शिष्य का साथ कभी नहीं छोड़ते। शिष्य के लिये सतगुरु हमेशा जीवित रहते हैं क्योंकि शरीर गुरु नहीं है। गुरु वह दिव्य धुन है जो हम सबके अंदर है। शिष्य भी शरीर नहीं है। आत्मा शिष्य है और शब्द गुरु है। एक बार जब जीव की सुरत को शब्द के साथ जोड़ दिया जाता है तो शब्द आत्मा को कभी नहीं छोड़ता।…
जब सतगुरु हमें नामदान देते हैं तो उनकी ज़िम्मेदारी तब तक पूरी नहीं होती, जब तक वे हमें वापस परमात्मा के पास न पहुँचा दें। चाहे वे अगले दिन ही अपना शरीर त्याग दें, पर हमें वापस परमपिता परमात्मा के पास ले जाने में हमारा मार्गदर्शन करने के लिये वे अंतर में हमेशा हमारे साथ होते हैं। हमने मार्गदर्शन के लिये केवल अपने सतगुरु की ओर ही देखना है और अंतर में हमें हमेशा अपने सतगुरु ही मिलेंगे।
संत संवाद, भाग 3
हमें जुदाई के डर को इस विश्वास में बदलना होगा कि जिस सतगुरु ने हमें नामदान बख़्शा है वह अपने नूरी स्वरूप में हमेशा हमारे साथ रहेंगे। लेकिन अगर हम सतगुरु के नूरी स्वरूप के दर्शन न कर पाए तो? संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि सतगुरु का नूरी स्वरूप असल में निराकार है। अंदर केवल प्रकाश और आवाज़ है। मगर क्योंकि हमने सतगुरु की पहचान उनके देहस्वरूप से जोड़ी हुई है इसलिए अंतर में शब्द उसी रूप में प्रकट होता है। लेकिन आख़िर में वह स्वरूप आवाज़ और प्रकाश में समा जाता है। हम उसकी ओर खिंचे चले जाते हैं, उसे पहचान लेते हैं, उससे हमें सुकून मिलता है और हमें महसूस होता है कि यही मेरे सतगुरु हैं।
सतगुरु निराकार स्वरूप में दुनियावी और रूहानी सभी पड़ावों पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। तब भी जब वह इस दुनिया में हमारे बीच नहीं होते। हमारे रूहानी सफ़र के दौरान भी वह हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इस बात को अनुभव करने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि हम डर से विश्वास तक का सफ़र तय करें।
हमें इस बात का एहसास कैसे हो सकता है कि हम हमेशा सतगुरु की छत्रछाया में हैं? यह सिर्फ़ सतगुरु के नूरी स्वरूप से जुड़कर ही हो सकता है जो असल में शब्द ही है। अपनी सुरत को शब्द से जोड़कर, हम अपने सतगुरु की शरण ले सकते हैं। तुलसी साहब समझाते हैं:
जगत गुरू नहिं संत पुकारा। सतगुरु भेद जगत से न्यारा॥
जो कोइ चढ़ै गगन को धावै। सो सतगुरु के सरनै आवै॥
तुलसी साहिब: हाथरस के परम सन्त
सतगुरु के देहस्वरूप के दर्शन कर लेने से हम उनके असल स्वरूप को नहीं समझ सकते। अंतर में सतगुरु के साथ रिश्ते को मज़बूत करने के लिए हमें सतगुरु से किए गए वायदों को निभाना होगा। हमें शाकाहारी भोजन को अपनाते हुए, मादक पदार्थों से परहेज़ करते हुए नैतिक जीवन जीना है और भजन-सिमरन का अभ्यास करना है जैसा कि हमें नामदान के समय बताया गया था।
शरीर नश्वर है। भजन-सिमरन हमें मृत्यु के डर से उबरने और अपने सच्चे स्वरूप जोकि अमर-अविनाशी है, से जुड़ने में मदद करता है। भजन-सिमरन तनाव-मुक्त और संतुष्ट जीवन जीने में मदद करता है। यह हमें शब्द-गुरु से मिला देता है और शब्द की रचनात्मक शक्ति में अभेद कर देता है। भजन-सिमरन करना हमेशा लाभदायक होता है चाहे हम इस बात पर विश्वास करें या न करें। भजन-सिमरन द्वारा हम आंतरिक रूहानी मंडलों में दाख़िल होते हैं और अपने निज-घर की ओर बढ़ते हैं। हमें शब्द-गुरु तक पहुँचने के लिए भजन-सिमरन का सबसे सशक्त साधन दिया गया है। अब उस ज्ञान को करनी में लाने की ज़रूरत है।
हमारे सतगुरु ने हमें नाम का अथाह भंडार दे दिया है। हमें इसी जीवन में इस ख़ज़ाने का लाभ उठाकर नाम के रंग में रँग जाना है। स्वामी जी महाराज सारबचन संग्रह पुस्तक में आनेवाले कल की अनिश्चितता की याद दिलाते हुए हमें चेतावनी देते हैं: “मौत से डरत रहो दिन रात।”
स्वामी जी महाराज ज़ोर देकर समझाते हैं कि हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि यह शरीर नश्वर है और इसे खोने के डर पर क़ाबू पाने के लिए हम जो कर सकते हैं हमें वह करना चाहिए। सिर्फ़ भजन-सिमरन के ज़रिए ही सतगुरु के प्रति हमारा भरोसा बढ़ सकता है इसी से हम अपने डर पर क़ाबू पा सकते हैं और हमारा भरोसा क़ायम रह सकता है। संत-महात्मा याद दिलाते हैं कि यह भरोसा बाहरी ज्ञान से नहीं बल्कि भजन-सिमरन करने से आता है जिसके फलस्वरूप हमें अनुभव प्राप्त होता है। यह निजी अनुभव ही हमारे विश्वास का आधार बनता है। इसकी शुरुआत भजन-सिमरन से होती है।
सिमरन ही मुक्ति के द्वार की कुंजी है जो हमें परमात्मा से मिलाती है। सिमरन ही वह एकमात्र भाषा है जिससे हम निरंतर अपने सतगुरु से जुड़े रह सकते हैं। हर रोज़ सिर्फ़ ढाई-घंटे भजन-सिमरन करने से नहीं बल्कि चौबीस घंटे उनके साथ जुड़े रहने से हमें उनके सर्वव्यापक होने का एहसास होता है ।
हमारे इस संघर्ष-भरे सफ़र के दौरान हमारा सच्चा दोस्त हमसे कभी दूर नहीं होता, कभी जुदा नहीं होता। सिमरन हमारी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन जाता है। संतजन समझाते हैं कि लगातार सिमरन करने से धीरे-धीरे यह हमारा स्वभाव बन जाता है फिर चाहे हम इस बारे में सचेत न भी हों यह अपने आप ही चलता रहता है। निरंतर सिमरन हमें शब्द से जोड़ देता है तथा हमारी निरत और सुरत जागृत हो जाती है।
हमसे कहा जाता है कि भजन-सिमरन के दौरान हमें बस बैठना है और सिमरन शुरू कर देना है बाक़ी सब सतगुरु करेंगे। हम ही हैं जो उन पर नहीं छोड़ते। न तो हमें ख़ुद पर भरोसा है कि हम इन मुश्किलों को पार कर सकते हैं और न ही हमें अपने सतगुरु के वचनों पर विश्वास है जब वह कहते हैं कि हम यह कर सकते हैं।
हमने कई बार सुना है कि संतमत में कोई असफल नहीं होता। जब हम अपनी पूरी कोशिश करते हैं तब परमात्मा से मिलाप होना निश्चित है। जब सतगुरु ने हमें नामदान बख़्शा था तब उन्होंने हमसे वायदा किया था कि परमात्मा से मिलाप करवाने में वह हमारी मदद करेंगे। हम किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं? पैग़ंबर मोहम्मद ने परमात्मा के वायदे के बारे में फ़रमाया था:
मैं (अल्लाह) अपने बंदे के साथ हूँ जब वह मेरे बारे में सोचता है। मैं उसके साथ हूँ जब वह मुझे याद करता है। अगर वह मुझे ख़ुद में याद करता है तो मैं उसे अपने आप में याद करूँगा। अगर वह मुझे लोगों के बीच में याद करता है तो मैं उसे उससे बेहतर लोगों के बीच में याद करूँगा। अगर वह एक क़दम भी मेरे क़रीब आता है तो मैं सौ गुना उसके क़रीब आऊँगा। और जब वह चलकर मेरे पास आता है तब मैं दौड़कर उसके पास आऊँगा।
राबिया: द वुमन हू मस्ट बी हर्ड
हमारे सतगुरु अब भी हमारे साथ हैं और वह तब तक हमारे साथ रहेंगे जब तक वह हमें परमात्मा के पास नहीं पहुँचा देते। हम उन्हें सदा याद करते रहेंगे तब भी, जब वह देहस्वरूप में हमारे साथ नहीं होंगे और तब भी, जब वह हमारी आँखों के बिलकुल सामने होंगे। उनकी जुदाई की यह पीड़ा तब तक हमारे साथ रहेगी जब तक हम अंतर में उनमें अभेद नहीं हो जाते और आख़िरकार हमें मुक्ति नहीं मिल जाती। जैसा कि शेख़ फ़ख़रुद्दीन इराक़ी ‘द फेस इन एवरी रोज़’ में लिखते हैं: “ख़ुश है वह दिल जो तुम्हारी जुदाई की पीड़ा के ज़रिए मुक्ति पा लेता है।”