सिमरन के ज़रिए मुक्ति
क़ैद दो तरह की होती है: एक वह जब हमें पता होता है कि हम क़ैद में हैं; दूसरी वह जब हमें यह पता ही नहीं होता। किस तरह की क़ैद ज़्यादा बंधनकारी और निराशाजनक है? ज़ाहिर है, दूसरी तरह की, क्योंकि अगर हमें यह पता ही नहीं कि हम क़ैदी हैं तो हम आज़ाद होने के बारे में सोचेंगे ही नहीं। लेकिन जब हम यह जान जाते हैं कि हम क़ैद में हैं तब हम आज़ाद होना चाहते हैं या इस क़ैद से आज़ाद होने के हर संभव मौक़े की तलाश में रहते हैं।
कल्पना करें कि कोई क़ैदियों को आज़ाद करवाने के लिए आता है। कौन से क़ैदी उसके आह्वान को सुनते ही उसके पास दौड़े चले आते हैं? क्या वे जो जानते हैं कि वे क़ैदी हैं और आज़ाद होने के लिए तरस रहे हैं या वे जिन्हें पता ही नहीं है कि वे क़ैदी हैं? ज़ाहिर है, पहले वाले क़ैदी। दूसरी तरह के क़ैदियों की तो समझ में ही नहीं आता कि आज़ाद करवानेवाला किस बारे में बात कर रहा है।
इस अजीब-सी जेल में कुछ लोग जानते हैं कि वे क़ैदी हैं और कुछ को तो पता ही नहीं कि यह हमारी जेल है जिसे हमने ख़ुद अपनी भ्रमित और बेक़ाबू सोच से बनाया है।
बाबा जी के साथ हाल ही में हुए सवाल-जवाब के दौरान किसी ने शिकायत की कि वह सिमरन के दौरान अपने ध्यान को बिलकुल भी एकाग्र नहीं कर पाता। लेकिन संत-महात्मा सदियों से हमें यही बात समझाते आ रहे हैं कि हमारा अपने मन पर कोई क़ाबू नहीं है क्योंकि हमने इसे बिगाड़ दिया है। मन आसान से आसान रास्ता ढूँढ़ता है और हम इसे मनमानी करने की खुली छूट दे देते हैं। मन सिमरन न करने की हर संभव कोशिश करता है। इसलिए बजाय इसके कि आत्मा की मुक्ति के लिए हम मन को भजन-सिमरन द्वारा एकाग्र करने की कोशिश करें, हम इसे मनमानी करने देते हैं। बाबा जी का इशारा इस बात की ओर था कि हमने अपनी आज़ादी खो दी है और अपने जीवन की बागडोर धोखेबाज़ मन के हाथों में सौंप दी है। आपके कहने का भाव है कि सिमरन ही हमारी मुक्ति का एकमात्र ज़रिया है। बाक़ी सब कुछ जैसे सतगुरु के नूरी स्वरूप के दर्शन होना और शब्द धुन को सुनना, उनकी दया मेहर से होता है। इसलिए सिमरन ही हमारे आत्मिक जीवन का आधार है क्योंकि जब तक आत्मा मन के साथ बँधी हुई है तब तक इसका जीवन अर्थहीन है। क़ैद होने की वजह से आत्मा भी उन्हीं उतार-चढ़ाव का अनुभव करती है जिनका अनुभव मन इस संसार में कर्मों का भुगतान देते हुए करता है।
सिमरन करने की कोशिश मात्र से ही हमें और ज़्यादा एहसास होने लगता है कि हम यहाँ क़ैदी हैं। हम अपने आस-पास की दीवारों के बारे में ज़्यादा सचेत होने लग जाते हैं और इनसे मुक्त होने के मौक़े ढूँढ़ने के लिए ज़्यादा सजग होने लगते हैं। हम मुक्ति के ऐसे मौक़े को कभी भी हाथ से नहीं जाने देते क्योंकि हम बहुत देर से उस मौक़े का इंतज़ार कर रहे हैं। सिमरन में नाक़ाम होने पर हमें इस बात का निजी अनुभव होता है कि हम अपने उन विचारों, जज़्बातों और कर्मों पर क़ाबू पाने में कितने लाचार हैं जो हमें इस क़ैद में फँसाकर रखते हैं। हर बार सिमरन करने की कोशिश करना और उसमें नाक़ाम होना जेल की दीवारों पर अपना सिर पटकने के सामान है; फिर हमें एहसास होता है कि हम मन की ताक़त के आगे कितने लाचार हैं और बिना मदद के हम इसके चंगुल से आज़ाद नहीं हो सकते।
दोनों तरह के क़ैदी बिना मदद के अपनी क़ैद से छूट नहीं सकते। वे दोनों फँसे हुए हैं। पहली क़िस्म के क़ैदी की कोशिशें और जेल की दीवारों पर सिर पटकना शायद दूसरी क़िस्म के क़ैदी को बेतुका और मूर्खतापूर्ण लगता है जो यह नहीं समझ पाता कि इतनी बेचैनी और वेदना की क्या वजह है। जेल की दीवारों का एहसास न होना आसान है। जेल में कई कोने हैं जहाँ बहुत सारी लज़्ज़तें और प्रलोभन होते हैं। तो क्यों न वहीं रहें और उनका आनंद लें?
जुनून की हद तक जेल से भागने की चाहत रखने वाले क़ैदी असल में पागल नहीं होते। इसके उलट, उन्हें अपनी मुक्ति प्यारी होती है। यह परमात्मा की बख़्शिश है क्योंकि उनकी व्यथा और तीव्र इच्छा उनके इस एहसास को गहरा कर देती है। वही आज़ाद होने के लिए दिए आह्वान को सुन सकेंगे, भले ही उस आह्वान की आवाज़ उन्हें स्पष्ट सुनाई न दे रही हो। हर आत्मा को कभी न कभी अपने क़ैद होने का एहसास होता है। यूनानी कवि कॉन्स्टेंटाइन पी. कवाफ़ी एक ऐसे व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिसे इस बात का एहसास हो गया है कि वह अपनी ही बनाई क़ैद में बंदी है, बाहर की आज़ाद दुनिया से कटा हुआ है:
बिना किसी सहानुभूति, बिना किसी दया, बिना किसी शर्म के,
उन्होंने मेरे चारों तरफ़ मोटी और ऊँची दीवारें बना दी हैं।
और अब मैं यहाँ निराश बैठा हूँ।
मैं और कुछ नहीं सोच सकता: मेरा नसीब मेरे मन को दु:खी कर रहा है –
क्योंकि बाहर मेरे पास करने के लिए बहुत कुछ था।
जब वे दीवारें बना रहे थे तब किस तरह मेरा ध्यान इस ओर नहीं गया!
लेकिन मैंने कभी भी इन्हें बनाने वालों की आवाज़ नहीं सुनी, ज़रा-सी भी नहीं।
धीरे-धीरे उन्होंने मुझे बाहरी दुनिया से अलग कर दिया है।
इस कविता में हम रूहानियत के जिज्ञासु की दयनीय स्थिति को महसूस कर सकते हैं, ख़ासकर अगर हम “बाहर” शब्द को “अंदर” शब्द से बदल दें क्योंकि हम जानते हैं कि मुक्ति का मार्ग अंदर है। परमात्मा के प्रेमी को महसूस होने लगता है कि वह बाहरी दुनिया में बुरी तरह से फँसा हुआ है। वह अंदर जा नहीं पा रहा जबकि अंदर देखने और अनुभव करने के लिए बहुत कुछ है। उसे महसूस होता है जैसे किसी ने अदृश्य रूप से उसे आंतरिक दुनिया से, सच्ची मुक्ति से दूर कर दिया हो। दीवारें बनाने वाले जब चुपचाप काम कर रहे थे, तब उसे क्यों नहीं सुनाई दिया? क्योंकि वे उसके अपने विचार ही थे। ईंट-दर-ईंट, उसके बेक़ाबू मन ने उसे उस मुक्ति से वंचित कर दिया जो निष्कपटता और अंदर जाने की इच्छाशक्ति से मिलती है।
वह अब क्या कर सकता है? वह ख़ुद की बनाई हुई इस क़ैद के आगे बेबस है। अब उसके पास और कोई रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि वह किसी ऐसे अनुभवी मार्गदर्शक के पास जाए जो इस बात को जानता है कि आत्मा को क्या दु:ख है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी पुस्तक स्पिरिचुअल पर्स्पेक्टिव्स, वॉल्यूम I में फ़रमाते हैं:
संत-महात्मा हमें मुक्त करवाने के लिए आते हैं। हम सब यहाँ क़ैदी हैं। संत-महात्मा इस जेल का दरवाज़ा खोलकर हमें आज़ाद करवाना चाहते हैं। यही उनका असली मक़सद और उद्देश्य होता है और वे हमें यही उपदेश देते हैं।
हम अपनी निष्कपट, निर्मल आंतरिक दुनिया से दूर हो गए हैं और चाबी हमसे कहीं खो गई है। सतगुरु हमें सिर्फ़ जगाने ही नहीं आते; वह हमें हमारी खोई हुई मासूमियत और मुक्ति को फिर से पाने की चाबी देने के लिए भी आते हैं। वह चाबी है सिमरन। यह चाबी दूसरी चाबियों की तरह काम नहीं करती; इसे इस्तेमाल करना उतना आसान नहीं है जितना कि चाबी घुमाकर दरवाज़ा खोलना।
सिमरन की चाबी प्राचीन चीज़ों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ (archeologist) के कुदाल और ब्रश की तरह काम करती है जो मलबे की परतों को हटाकर उसके नीचे दबे खज़ाने को बाहर ले आता है जो हमेशा से वहीं था लेकिन पहले उस पर किसी का ध्यान नहीं गया। हमारे पूर्व जन्मों के विचार और संस्कार हमारी आत्मा पर छपे हुए हैं। इन संस्कारों ने हमें क़ैद किया हुआ है लेकिन सिमरन के ज़रिए हम इन संस्कारों और विचारों की परतों को हटाने और मिटाने में लग जाते हैं जो हमारे बंधन का कारण हैं। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी परमार्थी पत्र, भाग 2 में फ़रमाते हैं कि संचित संस्कार हमें किस तरह क़ैद कर लेते हैं: “जब तक सभी संस्कार (जो तब से इकट्ठे हो रहे हैं जब से आत्मा मन और शरीर के देश में आयी है) मिट नहीं जाते, आत्मा आज़ाद नहीं होगी और तब तक कर्मों के अधीन रहेगी।”
इसी तरह, प्राचीन दार्शनिकों ने – जिन्हें ‘नीओप्लैटॉनिस्ट्स’ कहा जाता है जिन्होंने बाद में नॉस्टिसिज़्म, यहूदी कब्बाला, गूढ़ पश्चिमी परंपराओं और स्पिनोज़ा व कांत जैसे दार्शनिकों पर गहरा प्रभाव डाला – इन संचित संस्कारों को ‘आत्मा का वाहन’ कहा है। यह स्पष्ट रूप में वही दर्शाता है जो महाराज सावन सिंह जी ने भी फ़रमाया है: संस्कार ही आत्मा को निरंतर एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे एक वाहन हमें एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाता है। महाराज सावन सिंह जी इसी पत्र में आगे लिखते हैं: “जो संस्कार हम अपने साथ इस जीवन में लाए हैं, वे हमारे भाग्य-कर्म हैं और हमें उन्हें भोगना ही होगा।” आप फ़रमाते हैं कि अगर इन संस्कारों को ख़त्म कर दिया जाए तो तुरंत मौत आ जाएगी। हालाँकि, इस वर्तमान जीवन में हम उन नए संस्कारों को इकट्ठा करने से बच सकते हैं जो भविष्य के जन्मों का कारण बनते हैं। दो तरह से ऐसा किया जा सकता है: पहला, नए कर्म करके “मन की मर्ज़ी से कर्म न करें, बल्कि ख़ुद को गुरु का कारिन्दा या एजेंट समझते हुए कर्म करें। वफ़ादार कारिन्दा अमानत में ख़यानत नहीं करता और न ही ताक़त का नाजायज़ फ़ायदा उठाता है।” दूसरा, “संतजन हमें शब्द-धुन से जोड़ देते हैं। इस तरह वे हमें नए संस्कारों से आज़ाद कर देते हैं और साथ लाए गए संस्कार इस जीवन काल में ही भुगत लिए जाते हैं।”
एजेंट बनने, सिमरन करने और शब्द-धुन से जुड़ने के लिए ध्यान को निरंतर एकाग्र करना ज़रूरी है। दार्शनिकों का एक और समूह, जिन्हें ‘स्टोइक्स’ कहा जाता है, ग़लत संस्कारों को मिटाने के लिए ऐसा अभ्यास किया करता था जिसमें वह इन संस्कारों की ओर कोई ख़ास ध्यान नहीं देता था, इन्हें नकार देता था। इस समूह के लोग सजग होकर अपने ध्यान को पक्का करते थे, इस बात को भली-भाँति जानते हुए कि हमारी जेल की दीवारें ख़ामोशी में खड़ी होती हैं। इसलिए, वे अपने मन को ध्यान भटकानेवाले विचारों की ओर नहीं जाने देते थे और न ही उन पर मनन करने देते थे जो धुएँ के पर्दे की तरह हमारी नज़र को धुँधला करते हैं और हमें इस मायामय जगत में ही फँसाए रखते हैं। यही हमारी जेल की दीवारें हैं चाहे हमें उनका एहसास हो या न हो। महाराज सावन सिंह जी परमार्थी पत्र, भाग 2 में फ़रमाते हैं कि जब आत्मा शब्द-धुन को छोड़कर मन का साथ लेती है तो यह अपने ही किए हुए कर्मों में क़ैद होती जाती है।
भ्रम और झूठ की दीवारों ने हमें बहुत लंबे समय से बंदी बनाकर रखा हुआ है। अब हम अपने इन संस्कारों से हमेशा के लिए छुटकारा पा सकते हैं ताकि अब ये हमें हमारे द्वारा बनाई दीवारों के अंदर बंदी न बनाए रखें जो असल लगती हैं मगर हैं नहीं। आओ हम अभी से ही अपनी मुक्ति के एकमात्र साधन – सिमरन – से जुड़ जाएँ।
सिमरन मुक्ति के मार्ग पर आत्मा के सफ़र की शुरुआत है। जब हम ध्यान को पूरी तरह से अंदर एकाग्र करके सिमरन करते हैं तब हम तीसरे तिल पर पहुँच जाते हैं जहाँ शब्द-धुन हमारे कर्मों को नष्ट करके बंदीख़ाने की दीवारों को तोड़ देती है और हमारा मन अपने निज-घर – त्रिकुटी – लौटने के लिए आज़ाद हो जाता है। सुरत-शब्द मार्ग पर चलते हुए, सतगुरु की दया-मेहर और प्रेम की बदौलत मन के पंजे से आज़ाद हुई आत्मा उनके नूरी स्वरूप के साथ वापस अपने मूल स्रोत परमात्मा में समाकर मुक्ति के आनंद को अनुभव करती है। फिर हमें कभी भी इस बात के लिए पछताना नहीं पड़ता जिसे कि कवि कैवाफी ने बहुत ख़ूबसूरती से बयान किया था: “जब वे दीवारें बना रहे थे तब किस तरह मेरा ध्यान इस ओर नहीं गया!”