सेवा का असली मक़सद
ज़रा सोचिए: हम पूरी ज़िंदगी कड़ी मेहनत करते हैं और एक खाते में पैसे जमा करते हैं ताकि रिटायर होने पर या जब सच में ज़रूरत हो तब हम उसका इस्तेमाल कर सकें। वह दिन आता है, हम बैंक जाते हैं और हमें बताया जाता है कि हमने अपना पैसा ग़लत खाते में जमा कर दिया है। हमें पता चलता है कि हमारे पास कुछ नहीं है – जो कुछ हमने जमा किया था वह अब किसी और का है।
इससे हमें बहुत बड़ा सदमा पहुँचेगा। देखा जाए तो हमारी हालत भी बिलकुल वैसी ही है। हर रोज़, दिन-प्रतिदिन, हम अपने परिवार, घर-बार, नौकरी, कर्मचारियों, मालिकों, बच्चों, माता-पिता आदि की देखभाल करने के लिए कितनी सख़्त मेहनत करते हैं। लेकिन जो कुछ हमने इतनी मेहनत से इकट्ठा किया वह हमारे साथ नहीं जा सकता और इससे हम आत्मिक सुख प्राप्त नहीं कर सकते।
दूसरी तरफ़, अगर हम अपना जीवन परमपिता परमात्मा और अपने सतगुरु को समर्पित कर दें तो हमारी पूरी ज़िंदगी सेवा बन जाती है और हर पल, हमारे द्वारा की गई छोटी से छोटी कोशिश हमारे खाते में जमा हो जाती है जो हमें रूहानी व जज़्बाती तौर पर तथा हर तरह से बेहतर बनाती है।
हमें बताया जाता है कि कहीं भी, कभी भी की गई निस्वार्थ सेवा ही असल सेवा है। सत्संग-घर या किसी ख़ास संस्थान में जाकर सेवा करना ही सेवा नहीं है। अहम यह है कि सेवा निस्स्वार्थ भाव से की जाए। जब कोई भी कार्य निस्स्वार्थ होकर, बिना किसी मेहनताने के, बिना कोई उम्मीद रखे या यहाँ तक कि प्रशंसा की चाहत के बिना किया जाता है तब वह सेवा बन जाता है। स्वेच्छा से देना हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है।
कबीर साहिब कहते हैं:
देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह।
बहुरि न देही पाइये, अब की देह सो देह॥
संत कबीर
प्रेम देने में है, लेने में नहीं; प्रेम खोने में है, पाने में नहीं। हम उम्मीद करते हैं कि सेवा द्वारा हमारा अहंकार ख़त्म हो जाए। पहले हम सोचते हैं कि सेवा के लिए हमारी ज़रूरत है लेकिन जितनी ज़्यादा सेवा हम करते हैं उतना ही हमें एहसास होता है कि सेवा की ज़रूरत हमें है। सतगुरु दुनिया-भर में इतनी सारी इमारतें बनवा कर, इतनी सारी किताबें छपवा कर, इतने सारे प्रोजेक्टों द्वारा सेवा करने का मौक़ा दे रहे हैं। ये सब तो बस एक बहाना है ताकि हम निस्स्वार्थ भाव से कुछ ऐसा कर पाएँ जिससे हमें परमात्मा की ख़ुशी प्राप्त हो सके।
सेवा दो क़िस्म की है: बाहरी सेवा जो ज़रिया है और आंतरिक सेवा जो लक्ष्य है। संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि सबसे उत्तम क़िस्म की निस्स्वार्थ सेवा भजन-सिमरन है यानी कि अपनी सुरत को तीसरे तिल पर ले जाना और उसे अंदर दिव्य प्रकाश और शब्द-धुन से जोड़ना। वही सतगुरु की सबसे ऊँची और सच्ची सेवा है। बाक़ी सभी सेवाएँ उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ज़रिया मात्र हैं।
सेवा का मक़सद मन को परमात्मा की ओर मोड़ना है। इसके लिए कायापलट करने और ख़याल को बाहर से अंदर की ओर ले जाने की ज़रूरत होती है। सेवा इस अहम यू-टर्न को लेने में मन की मदद करती है। यह धीरे-धीरे मन को परमात्मा के प्यार से सराबोर कर देती है, मन को निर्मल और पवित्र करती है और इसे दिव्य शब्द से जुड़ने के क़ाबिल बनाती है। इसीलिए कबीर साहिब कहते हैं:
भक्ति दान मोहिं दीजिये, गुरु देवन के देव।
और नहीं कछु चाहिये, निसु दिन तेरी सेव॥
संत कबीर
आर. एस. एस. बी. की वेबसाइट पर “निस्स्वार्थ सेवा” वीडियो में, कई सेवादारों से पूछा गया कि सेवा उनके लिए क्या मायने रखती है। उन सभी ने अलग-अलग तरह से एक ही बात कही: सेवा उनके जीवन का आधार है, आसरा है। सेवा उन्हें याद दिलाती है कि उनके सतगुरु हमेशा उनके अंग-संग हैं; यह उन्हें जीवन के उतार-चढ़ाव के दौरान मज़बूती से थामे रखती है। अगर हम सही नज़रिए से सेवा करते हैं तो यह हमें सतगुरु और हमारे असल स्वरूप से जोड़ती है और यह हमारे मन में ऐसा बदलाव ले आती है कि वह धीरे-धीरे भजन-सिमरन में बाधा डालना कम कर देता है।
संत-सतगुरुओं ने हमें समझाया है कि हम सब एक ही ज़ंजीर की कड़ियाँ हैं यानी कि हम सब समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। खाना बनाने की सेवा में लगा सेवादार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि कोई प्रोजेक्ट मैनेजर। कोई सेवादार बड़ा या छोटा नहीं होता, कोई सेवा बड़ी या छोटी नहीं होती। हर काम, हर व्यक्ति सेवा नामक इस इनसानी ज़ंजीर में एक ज़रूरी कड़ी है। हालाँकि इस ज़ंजीर में शामिल लोगों को बदला जा सकता है लेकिन यह ज़ंजीर स्थायी है और इसकी कड़ियाँ आपस में जुड़ी रहती हैं। कहा जाता है कि हम सेवा नहीं करते बल्कि सेवा हमसे करवाई जाती है।
इन सब से बढ़कर, सेवा – सतगुरु के लिए हमारे और हमारे लिए सतगुरु के प्यार की अभिव्यक्ति है। जब 1930 के दशक में डेरा में सत्संग-घर बनाया जा रहा था तब दिल्ली के एक जाने-माने अमीर ठेकेदार ने अर्ज़ की कि पूरी इमारत बनाने की सेवा उसे सौंप दी जाए। बड़े महाराज जी ने जवाब दिया:
मैं चाहता हूँ कि ग़रीब से ग़रीब सत्संगी को भी सेवा का मौक़ा मिले, चाहे वह सिर्फ़ एक रुपया दे या आठ आने। मैं चाहता हूँ कि हर सत्संगी, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, जवान हो या बूढ़ा, सत्संग-घर बनाने की सेवा में हाथ बँटाए; चाहे वह केवल मुट्ठी-भर मिट्टी या ईंट के कुछ टुकड़े ही उठाए। संगत द्वारा की गई छोटी से छोटी सेवा मेरे लिए क़ीमती है, उनके द्वारा बहाई गई पसीने की हर बूँद अनमोल है। यह प्रेम और भक्ति-भाव से की गई सेवा है।
अनमोल ख़ज़ाना
कहा जाता है कि एक अच्छा सेवादार वह होता है जो सबके साथ काम कर सके। सेवा सिर्फ़ मशीनी ढंग से काम करना नहीं है; यह किसी की ख़ुशी प्राप्त करने की इच्छा है, किसी को ख़ुश करना है। जब हम किसी को ख़ुश करते हैं तब हम सतगुरु को ख़ुश करते हैं और ऐसे सकारात्मक माहौल में हम शांत मन से अपना भजन-सिमरन कर सकते हैं और हम सतगुरु को अपने अंग-संग महसूस कर पाते हैं। जैसा कि दादू दयाल कहते हैं: “आगै पीछे सँगि रहै, आप उठाये भार।”