स्मार्टफोन: उदासी का कारण?
राधास्वामी मत के संस्थापक स्वामी जी महाराज अपने सतगुरु के आगे विनती करते हैं:
मैं आतुर तुम्हें पुकारूं। चित में कोइ और न धारूं॥
मेरा जीवन मूर अधारा।
सारबचन संग्रह
स्वामी जी महाराज भी वही समझा रहे हैं जो सभी संत-महात्मा समझाते आए हैं। हमारे अंदर परमात्मा से मिलाप के लिए तीव्र इच्छा और तड़प होनी चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि हमारा रखवाला कौन है, हमारा मार्गदर्शक कौन है, हमारा सच्चा साथी कौन है।
कोई भी रिश्ता सतगुरु के साथ हमारे रिश्ते से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई भी कार्य इतना अहम नहीं है कि भजन-सिमरन करने के बजाय उसे पहल दी जाए क्योंकि वह समय हम अपने सतगुरु के लिए निकालते हैं। और जो चार वायदे हमने नामदान के समय किए थे उनसे ज़्यादा दृढ़ और जीवनदायक अन्य कोई वायदा नहीं है। हमें उम्मीद है कि किसी दिन हम भी कह पाएँगे, “चित में कोइ और न धारूं॥”
लेकिन वर्तमान समय में एक अहम सवाल यह है, “अगर हमारा मन अंदर रूहानी सत्य पर पूरी तरह से एकाग्र न हुआ तो क्या होगा?” उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि हमारा बहुत ज़्यादा ध्यान हमारे स्मार्टफोन पर है? पत्रकार क्रिस हेस ने अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब द सायरन्स कॉल में दु:ख प्रकट करते हुए विस्तार से बताया है कि डिजिटल स्क्रीन हमारे मानसिक स्वास्थ्य और हमारी आत्मिक सुख-शांति दोनों के लिए कितना घातक बन गया है। किताब का उपशीर्षक है: हाउ अटेंशन बिकेम द वर्ल्ड्स मोस्ट एंडेंजर्ड रिसोर्स।
सच तो यह है कि ध्यान हमेशा से हमारी सबसे क़ीमती संपदा रहा है। 19वीं सदी के दार्शनिक विलियम जेम्स जो कि स्वामी जी महाराज के समकालीन थे, ने ध्यान को इस तरह परिभाषित किया है, “मन का … एक ही समय में एक साथ संभव कई वस्तुओं या विचारों की शृंखला में से किसी एक पर टिक जाना।” उन्होंने लिखा कि ध्यान का अर्थ असल में चेतना की एकाग्रता है, जिसका अर्थ है “कुछ चीज़ों को अच्छी तरह से करने के लिए दूसरी चीज़ों से पीछे हट जाना।”
हमारे भजन-सिमरन के अभ्यास के लिए भी यह परिभाषा काफ़ी उपयुक्त है। हम (सिमरन के ज़रिए) अपनी सुरत को केंद्रित करने और एकाग्र करने की कोशिश करते हैं। हम इस दुनिया में फैले हुए अपने ख़याल को इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं ताकि अपने भीतर कुछ श्रेष्ठ और अद्भुत अनुभव प्राप्त कर सकें।
हमारे ध्यान के भटकने का क्या कारण है? बहुत-सी चीज़ें हैं। मगर आजकल ये हमारे सेल फोन हो सकते हैं जिन्हें कॉमेडियन हसन मिन्हाज ने “रेक्टेंगल्स ऑफ़ सैडनेस” कहा है। उदासी के ही क्यों? क्योंकि स्मार्टफोन को लत लगा देने के लिए बनाया गया है ताकि हमें दूसरों से अलग-थलग किया जा सके; ताकि हम में परस्पर प्रेम और मधुर संबंध क़ायम न हो पाएँ और हमारे मन की बेचैनी और चंचलता को बढ़ाया जा सके। हेस हमें बताते हैं कि ये फोन फास्ट फूड के समान हैं जो सिर्फ़ कैलोरी देते हैं लेकिन असल में पोषण नहीं देते।
हेस बताते हैं कि किस तरह हमारे डिजिटल उपकरणों का लगातार विकास हो रहा है और उन्हें बेहतर बनाया जा रहा है। “दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियाँ, सबसे तेज़ दिमाग़ और सबसे शक्तिशाली संस्थाएँ बहुत सारा रुपया-पैसा ख़र्च करती हैं ताकि हमें वह सब देखने और सुनने के लिए मजबूर किया जा सके जो वे हमें दिखाना या सुनाना चाहती हैं।”
लेखक स्मार्टफोन को “हमारी जेब में पड़ी छोटी स्लॉट मशीनें1…” कहता है। ये मशीनें दिन में 24 घंटे उपलब्ध रहती हैं। ये ताज़ा ख़बरों और मनोरंजन करने के लिए बेशुमार स्क्रॉल का मौक़ा देती हैं। ये हमें बहुत अधिक चौकन्ना रखती हैं और मनोरंजन के लिए कई तरह के विकल्प देकर हमारे ध्यान को लगातार भटकाए रखती हैं। लेकिन हेस लिखते हैं, “हमारे लिए जितना ज़्यादा मनोरंजन उपलब्ध रहता है, हम उतना ही ज़्यादा मनोरंजन चाहते हैं।” और इससे भी बदतर यह है कि हमारे फोन हमें उत्तेजित करने और लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए “लाइक”, तुरंत जबाव और प्रशंसा पाने के लिए उकसाते हैं। मोबाइल हमारे अहंकार को बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं करते।
हेस अपनी किताब का समापन करते हुए कहते हैं कि हमें इस बात पर सोच-विचार करना चाहिए कि हम कहते क्या हैं, चाहते क्या हैं और करते क्या हैं? सतगुरु भी हमसे यही सवाल पूछते हैं। क्या हमारा ध्यान अंतर में सिमरन और भजन की ओर है या दुनियावी शक्लों-पदार्थों में लगातार बाहर भटक रहा है? सेलफोन सिर्फ़ सबसे नया साधन है जिसके ज़रिए मन हमें परम सत्य से दूर ले जाने के लिए बहकाता है।
स्वामी जी महाराज के ऊपर दिए गए शब्द की अगली पंक्तियाँ हमारी दुविधा पर प्रकाश डालती हैं। 19वीं सदी के अंत में स्वामी जी महाराज द्वारा लिखा गया यह शब्द तब भी सच था और आज भी सच है:
भौसागर वार न पारा। डूबे सब उसकी धारा॥
है मिथ्या झूठ पसारा। धोखे को सच सा धारा॥
सारबचन संग्रह
और फिर आप इस समस्या का समाधान बताते हैं:
सतगुरु बिन धोख न जाई। बिन शब्द सुरत भरमाई॥
या ते तुम सरना ताकूँ।
सारबचन संग्रह
अपना हाले-दिल तुझे सुनाने की
आरज़ू है मुझे,
अपने खोए हुए दिल का हाल फिर सुनने की
आरज़ू है मुझे।
मेरी फ़ुज़ूल की चाहत तो देख
कि जिस क़िस्से का पर्दाफ़ाश हो चुका,
उसे रक़ीबों2 से छुपाने की
आरज़ू है मुझे।
वह शब-ए-क़द्र3 की बेशक़ीमती
और अज़ीज़ रात
सुबह तक तेरे साथ गुज़ारने की
आरज़ू है मुझे।
वाह कि ऐसा नाज़ुक
मोती का दाना
रात की सियाही में पिरो लेने की
आरज़ू है मुझे।
ऐ सबा, आज की रात
मुझ पर मदद फ़रमा
कि सुबह होने से पहले खिल उठने की
आरज़ू है मुझे।…
हाफ़िज़, बुलबुल-ए शिराज़, ग़ज़ल 42
- सिक्के डालकर चलनेवाली मशीनें जो आमतौर पर कसीनो, गेमिंग ज़ोन और क्लबों में पाई जाती हैं।
- दावेदारों।
- इस्लाम में इस रात की इबादत का बड़ा पुण्य माना जाता है।