एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
सरदार बहादुर जगत सिंह जी के हाथ से लिखे पत्रों में से कुछ अंश नीचे दिए गए हैं।
वैज्ञानिक सोच तर्क पर आधारित होती है। यह किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले सबूत इकट्ठा करती है और इसमें विश्लेषण, ग़लतियों और तर्क पर आधारित नए अनुमानों की संभावना होती है। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति किसी समस्या के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता है तब वह ध्यान से उसका अध्ययन करता है, उस ज्ञान को अमल में लाता है और सुनी-सुनाई बातों या आम मान्यताओं के बजाय नतीजों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है।
सरदार बहादुर जी ने कृषि से जुड़ी एक ख़ास समस्या के बारे में बात करते हुए वैज्ञानिक सोच को अपनाने के बारे में एक उपयोगी सलाह दी। आप ने समझाया:
फिलहाल, मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि इस समस्या का समाधान या नतीजा प्राप्त करने के लिए पूरी तरह से वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ…इसका अर्थ यह है कि अन्य समस्याओं की तरह ही, इस विषय पर उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करें और इस विषय के प्रोफ़ेसरों से संपर्क करें ताकि उनसे वह ज्ञान बटोरा और सीखा जा सके जिसे वे पहले से ही हासिल कर चुके हैं। समस्या को अलग-अलग भागों में बाँट लें, एक-एक करके हरेक भाग के बारे में कोई तार्किक अनुमान लगाएँ और अंत में उस अनुमान को तथ्य में बदलने के लिए प्रयोग करें, यदि प्रयोग द्वारा वह अनुमान सही साबित न हो तो एक नया अनुमान लगाएँ और फिर से प्रयोग द्वारा उसकी जाँच करें।
मुझे लगता है कि इसे ही लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं। इसी तरह से गन्ने की नई फ़सलें उगाई जाती हैं। अगर सच कहूँ तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चिंता एक साथ नहीं चल सकते। जब मन चिंतित होता है तो इसका मतलब है कि समस्या का समाधान वैज्ञानिक तरीक़े से नहीं किया जा रहा है।
ज़िंदगी की समस्याओं या शंकाओं से निपटते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने से हमें विधिपूर्वक सही समाधान ढूँढ़ने में मदद मिलती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस तरह हमारे पास चिंता करने के लिए न तो समय बचता है और न ही ऊर्जा।
यहाँ तक कि जीवन के सबसे बड़े सवालों पर भी जैसे ‘मैं कौन हूँ?’, ‘इस दुनिया में मेरा क्या मक़सद है?’ या ‘आगे क्या होने वाला है?’ – अपनी समझ को सिद्धांतों से धुंधला करने के बजाय क्यों न वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाते हुए अनुभव द्वारा ही किसी नतीजे पर पहुँचा जाए?
हक़ीक़त के बहुत से स्तर हैं, जिनमें से ज़्यादातर के बारे में हम पूरी तरह से अनजान हैं और वैज्ञानिक प्रयोगों के ज़रिए हम परत-दर-परत उन्हें जान सकते हैं, बिना उन सब बाधाओं के जो हमने अपनी पहले से बनी धारणाओं और बेकार की चिंताओं की वजह से ख़ुद खड़ी की हुई हैं।
सरदार बहादुर जी ने आगे फ़रमाया:
सत्य और असत्य (भ्रम) या नित्यता और बदलाव..साथ-साथ चलते हैं; जहाँ भी असत्य या बदलाव होता है…, वहाँ सत्य या नित्यता भी मौजूद होती है। शून्य में बदलाव नहीं होता। बदलाव किसी चीज़ में होता है। यदि बदलाव के कारण भौतिक संसार भ्रम है तो अणुओं से बना संपूर्ण संसार इसलिए सत्य है क्योंकि मनुष्य अणुओं से बना है। यदि अणुओं से बना संसार इसलिए भ्रम है क्योंकि अणु टूट जाते हैं तो परमाणुओं से बना संसार असल है क्योंकि परमाणु ही अणुओं को बनाते हैं। यदि परमाणु जगत भ्रम है क्योंकि परमाणु बदलते हैं तो इलेक्ट्रॉनिक दुनिया सत्य है क्योंकि परमाणु इलेक्ट्रॉनों से बने होते हैं।
अत: जहाँ कहीं भी बदलाव होता है, उसके पीछे कोई सच होता है जिसमें वह बदलाव हो रहा होता है। यदि बर्फ़ के रूप में पानी का अस्तित्व न रहे तो वह तरल अवस्था में आ जाता है और यदि वह तरल अवस्था में भी न रहे तो वह गैसीय अवस्था में आ जाता है। अत: यदि संसार असत्य है तो हमारा शरीर भी सत्य नहीं है। जब तक हम इस शरीर में हैं तब तक हमारे लिए इस संसार का अस्तित्व है। यदि हम अपने आप को इस स्थूल शरीर से अलग करके अपने सूक्ष्म स्वरूप को पहचान लें तो हम स्वयं ही भौतिक जगत से सूक्ष्म जगत में चले जाते हैं। और यदि फिर से हम स्वयं को सूक्ष्म शरीर से अलग करके अपने उससे भी अधिक सूक्ष्म स्वरूप को पहचान लें तो हम अपने आप ही उस सूक्ष्म जगत से भी ज़्यादा सूक्ष्म जगत में चले जाते हैं – धीरे-धीरे हम परिवर्तनशील और अवास्तविक जगत से अपरिवर्तनशील और वास्तविक जगत की ओर बढ़ते हैं। सत्य हमारे भीतर है; सत्य ही हमारे अस्तित्व का आधार है।
हमारा शरीर वह प्रयोगशाला है जिसमें हमें यह खोज करनी है और इस सत्य तक पहुँचना है। कृपया वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ जिसका अर्थ है हमें चिंता करना छोड़कर अपने आप को प्रयोग के लिए तैयार करना है।