प्यार का निमंत्रण
शब्द “धुनात्मक प्रकाश” है, आवाज़ और प्रकाश का संगम है। यह रूहानी शक्ति की धारा है जोकि सतगुरु का असल स्वरूप है। पूर्ण सतगुरु का सबसे अहम कर्तव्य आत्माओं को शब्द से जोड़कर उनका मार्गदर्शन करके उन्हें उनके निज-घर परमात्मा के पास वापस ले जाना है। इस संसार में संत-सतगुरुओं का होना ही इस बात का सबूत है कि परमात्मा का अस्तित्व है। संत सच्ची विनम्रता, प्रेम और दया-मेहर की साकार मूरत होते हैं। हमें इस दुनिया के स्वप्न से जगाने के लिए परमात्मा उन्हें इस सृष्टि में भेजता है। तभी आत्मा मुक्ति प्राप्त कर सकती है और अपने असल मक़सद को पूरा कर सकती है।
सतगुरु के साथ हमारा रिश्ता हमारी भजन-बंदगी का मरकज़ है। चाहे हमें समझाया जाता है कि हमारा सच्चा गुरु शब्द है लेकिन यह रिश्ता सतगुरु के देहस्वरूप से शुरू होता है। हम सिर्फ़ उसी से प्यार कर सकते हैं जो हमारे स्तर पर देहस्वरूप में मौजूद हो। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी बहुत स्पष्ट लफ़्ज़ों में फ़रमाते हैं:
अगर हम सीधे परमात्मा की भक्ति कर सकते तो हमें सतगुरु की बिलकुल ज़रूरत न होती। लेकिन अगर हमने उसे देखा ही नहीं है तो हम सीधे परमात्मा की भक्ति नहीं कर सकते। इसलिये हमें किसी गुरु या संत-महात्मा की ज़रूरत होती है जो हमारे स्तर पर हो, हमारे जैसा हो, जो अपने प्रेम और भक्ति से हम पर प्रभाव डाल सके, जो हमें वह रास्ता दिखा सके जो परमात्मा की ओर वापस ले जाता है।
संत संवाद, भाग 1
हर जगह और हर समय में हुए संत-महात्माओं ने हमारे ध्यान को हमेशा शब्द गुरु की ओर मोड़ने की कोशिश की है। सतगुरु हमें बार-बार समझाते हैं कि जिस सुख की हमें तलाश है, वह इस अस्थायी, परिवर्तनशील संसार में कभी नहीं मिल सकता। संत-महात्मा हमें सदा अंदर की ओर रुख़ करने के लिए प्रेरित करते हैं। सतगुरु और शिष्य के बीच प्यार का रिश्ता होता है, ऐसा प्यार जो देहस्वरूप से शुरू होकर सभी बाधाओं को पार करते हुए रूहानी प्यार में तब्दील होकर पूर्ण होता है। बड़े महाराज जी ने इसे बहुत ही ख़ूबसूरती से पेश किया है:
सतगुरु हमें भवसागर से पार ले जानेवाले पुल के समान हैं। सच्चे सतगुरु के प्रेम द्वारा हमारे अंदर उस निराकार और अकथ प्रभु का प्रेम पैदा हो जाता है।
प्रेम की विरासत
देहधारी सतगुरु के पास वह युक्ति है जिससे हम अंदर परमात्मा और शब्द से जुड़ सकते हैं। हमारी आत्मा के घर वापसी के सफ़र के लिए देहधारी सतगुरु का होना बहुत ज़रूरी है। हमें किसी ऐसे गुरु की आवश्यकता है जिसे हम देख सकें और सुन सकें, कोई ऐसा जिस पर हम भरोसा कर सकें; जिससे हम प्यार और भक्ति सीख सकें जो आख़िरकार हमें शब्द से जोड़कर वापस परमपिता परमात्मा के पास ले जाएगी। हम अपनी बात देहस्वरूप सतगुरु की चर्चा से शुरू करते हैं और हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब शब्द के बारे में बात करने लग जाते हैं।
अपने अंतर में शब्द के लिए प्यार और भक्ति पैदा करना हमें शायद अपने बस से बाहर की बात लगे। लेकिन सतगुरु हमें भजन-सिमरन के अभ्यास की युक्ति सिखाते हैं, साथ ही शाकाहारी भोजन अपनाने – जिसमें दूध और दूध से बने पदार्थ भी शामिल हैं; शराब और मादक पदार्थों से परहेज़ करने और उच्च नैतिक जीवन जीने की हिदायत देते हैं और यह सब रोज़ाना भजन-सिमरन करने के हमारे चौथे वायदे को पूरा करने में मदद करते हैं। सबसे अहम बात यह है कि उनकी दया-मेहर से हम भजन-सिमरन द्वारा परमात्मा से मिलाप के मक़सद को पूरा करने के लिए लगातार कोशिश करते हैं। यही उनका सबसे बड़ा चमत्कार है।
सतगुरु से पूछे जाने वाले अधिकतर सवालों के जवाब, चाहे वे सवाल परमार्थी हों या दुनियावी, भजन-सिमरन पर आकर ही ख़त्म होते हैं। ऐसा लगता है कि भजन-सिमरन करते रहने से किसी भी तरह के हालात का सामना बेहतर ढंग से किया जा सकता है चाहे वे हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों। चूँकि बहुत-से सत्संगियों को भजन-सिमरन के दौरान बहुत संघर्ष करना पड़ता है, संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि हमारा अड़ियल मन आसानी से वश में आने के लिए तैयार नहीं है। इस मन से जूझते हुए अपने फैले हुए ख़याल को तीसरे तिल पर एकाग्र करने का एकमात्र तरीक़ा भजन-सिमरन है। इस संघर्ष के बावजूद, सतगुरु हमें भजन-सिमरन करते रहने की नसीहत देते हैं। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी प्रेम की विरासत पुस्तक में, भजन-सिमरन करने के महत्त्व के बारे समझाते हुए फ़रमाते हैं, “सतगुरु को भेंट किया जानेवाला सर्वश्रेष्ठ उपहार भजन-सिमरन है, दूसरी किसी वस्तु का कोई महत्त्व नहीं।”
भजन-सिमरन के ज़रिए, सतगुरु हमें निरंतर बरस रही दया-मेहर का एहसास करवाते हैं, वह हम पर अपनी मेहर-भरी दृष्टि बनाए रखते हैं तथा हमें दया-मेहर को सँभालने के लायक़ बना देते हैं। हम उनकी अनंत और अपार दया-मेहर को देखकर दंग रह जाते हैं। सतगुरु ही शिष्य के हृदय में प्रेम का बीज बोते हैं। फिर वह ख़ुद ही प्रेम के इस बीज का पोषण करते हैं जिससे शिष्य के हृदय में परमात्मा से मिलाप की इच्छा और लगन पैदा होती है। भजन-सिमरन ही उनकी सहायता और दया-मेहर को प्राप्त करने का एकमात्र ज़रिया है इसलिए भजन-सिमरन करना बहुत ज़रूरी है।
परमात्मा की दया-मेहर से प्राप्त होने वाले अनेक उपहारों में से एक उपहार ‘प्रेम’ है जो रूहानियत का सार है। बड़े महाराज जी पुस्तक डॉन ऑफ़ लाइट में फ़रमाते हैं: > उस सच्चे प्रियतम के लिये प्रेम पैदा करना रूहानी तरक़्क़ी के लिये सबसे अधिक ज़रूरी है।…प्रेम की किरणें सारे वातावरण को प्रसन्नता से भर देती हैं। प्रेम में परमात्मा का नूर झलकता है। प्रभु-प्राप्ति का मार्ग, प्रेम का ही मार्ग है।…प्रेम आत्मा को अकल्पनीय उत्साह से भर देता है जिससे वह उड़ कर अपने प्रियतम के पास पहुँच जाती है। इसीलिये प्रेम को सच्ची रूहानियत में सर्वोपरि माना गया है।…
> प्रेम कैसे पैदा किया जा सकता है? सच्चे सतगुरु प्रेम का साकार रूप होते हैं। रूहानी प्रेम उनकी दात है, वह जिसे चाहे दे सकते हैं। यह दात क्यों, कहाँ, कब और कैसे देनी है, यह सतगुरु की मौज पर निर्भर है।
> प्रेम पैदा करने का दूसरा तरीक़ा है सतगुरु द्वारा समझाए गए सिमरन, ध्यान और भजन का अभ्यास करना। जितनी श्रद्धा और भक्ति के साथ हम भजन-सिमरन करेंगे, उतने ही शब्द या नाम के समीप आते जायेंगे जोकि प्रेम का ही दूसरा नाम है।
सतगुरु के पास ऐसी ख़ास रूहानी शक्ति है कि वह जब चाहें, जिसे चाहें, प्रेम की यह दात बख़्श सकते हैं। उनकी दया-मेहर अनंत-अपार है और सात समन्दर पार भी पहुँच सकती है। प्रेम पैदा करने का दूसरा तरीक़ा – उनके कहे अनुसार भजन-सिमरन करना – भी उन्हीं की दात और दया-मेहर है। यह निमंत्रण हमेशा के लिए है फिर चाहे हम कहीं से भी शुरुआत क्यों न करें। यह सफ़र उनके प्रेम से शुरू होता है और उनका प्रेम ही इस सफ़र की मंज़िल है।
सतगुरु के लिए अपने प्रेम और भक्ति को ज़ाहिर करने का सबसे उत्तम तरीक़ा भजन-सिमरन है। जन्म और मृत्यु के इस बहुत बड़े बंदीखाने से निकलने का एकमात्र रास्ता भजन-सिमरन है। भजन-सिमरन ही आत्मा के अपने घर लौटने का एकमात्र ज़रिया है। भजन-सिमरन ही वह एकमात्र ज़रिया है जिससे हम शब्द से जुड़ सकते हैं जोकि इस जीवन का एकमात्र मक़सद है। जैसा कि हुज़ूर महाराज जी हमें समझाते हैं:
हमारा असली गुरु शब्द है, वह ‘होली घोस्ट’, वह स्पिरिट, वह लॉगॉस या शब्द जो हम सबके अंदर समाया हुआ है।…वही हमारा असली गुरु है।
संत संवाद, भाग 1