प्यार सहित आपका
आपका कहना है कि आपको नाम लिए आठ हफ़्ते हो गए, लेकिन आपने कुछ भी तरक़्की नहीं की है। संतमत समय की अवधि निश्चित नहीं करता। हमें ज़रा अपनी हालत को समझना चाहिए। अपने जन्म के वक़्त से, जब से हमने तीसरे तिल को छोड़ा है और बाहर आकर इस दुनिया से संबंध जोड़ लिया है तब से, हम तीसरे तिल के अंदर वापस नहीं गए हैं। कभी-कभी जब हमें किसी कठिन समस्या को सुलझाना पड़ता है, तब हम अपनी आँखों को बंद करके अपने पूरे ख़याल को आँखों के पीछे लाकर सोचने की कोशिश करते हैं। ऐसा हम कुछ वक़्त के लिए करते हैं, लेकिन फिर बाहर भाग जाते हैं क्योंकि हमें तीसरे तिल से बाहर भटकने की बुरी आदत पड़ी हुई है।
कवि, चित्रकार और गायक इसी केंद्र से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। सभी महान् विचारक अपने विचारों की स्पष्टता के लिए इसी केंद्र से मदद पाते हैं। दुनिया में जो भी वैज्ञानिक उन्नति हुई है, तीसरा तिल ही उसका केंद्र है। आँखों के पीछे का यह केंद्र सभी प्रेरणाओं का स्रोत है जिससे संसार के सब श्रेष्ठ ग्रंथ उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में भी हम जो उन्नति करेंगे, उसके लिए भी ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत यही बिंदु रहेगा। आध्यात्मिक संघर्ष में लगे हुए मनुष्य से मिलने के लिए परमात्मा की किरण ऊपर के मंडलों से उतरकर इसी केंद्र में आती है।
कौन-सी चीज़ हमें तीसरे तिल से बाहर रखती है? क्यों नहीं दुनिया का हर इनसान अपनी पूरी कोशिश और शक्ति के साथ इस प्रेरणा और ज्ञान के चमत्कारपूर्ण भंडार में प्रवेश करने की कोशिश करता? क्योंकि हमारा ख़याल हमेशा से हमारे शरीर, नज़दीकी रिश्तेदारों, घर, देश और दुनियावी सुखों और कभी-कभी दु:खों और मुसीबतों में लगा रहा है और अभी भी लगा हुआ है और हमने अपने आपको इन चीज़ों में इतना उलझा लिया है कि अपनी पहचान खो बैठे हैं। जब तक हम अपने को इस बाहरी जंजाल से अलग करने की कोशिश नहीं करेंगे और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ ख़याल को ऊपर ले जाने और नीचे उतारने का अभ्यास पक्का नहीं कर लेंगे तब तक हम इस मार्ग पर तरक़्क़ी नहीं कर सकेंगे।
हमें अपनी सोई हुई रूहानियत को फिर से जगाना होगा ताकि हम मन और शरीर पर अधिकार प्राप्त कर लें। जब हम मन से काम लेना चाहें, तभी मन को काम करना चाहिए और जब हम इसे स्थिर करना चाहें, तब इसे स्थिर होकर बैठ जाना चाहिए। जब हम इस दुनिया में काम करना चाहें, तो हमारे ख़याल को इस शरीर में लौट आना चाहिए और जब हम ऊपरी मंडल में काम करना चाहें तो इसको इस शरीर से सिमटकर ऊपर उठ जाना चाहिए। यह ख़याल ही है जो अंदर जाएगा और वहाँ देखेगा और जब तक यह बाहर दौड़ रहा है, तब तक अंदर कौन देखेगा? अगर एक मकान का मालिक अपने घर के बाहर जाकर बैठा रहे और शिकायत करे कि अंदर क्या-क्या हो रहा है, इसका उसे पता नहीं है कि तो उसकी यह शिकायत सही नहीं है।
दुनिया से ख़याल का संबंध तोड़ने का काम धीरे-धीरे होता है। पुरानी आदतें हमारा स्वभाव बन जाती हैं। नई आदत डालने में वक़्त लगता है। लेकिन धीरे-धीरे लगातार कोशिश से जीत हासिल होती है और अभ्यास से पूर्णता प्राप्त होती है। आप अपने मन की एक पल के लिए चौकीदारी कीजिए और देखिए कि कौन-सी वस्तु इसे केंद्र से दूर रखती है। जो वस्तु हमें तीसरे तिल से बाहर रखे, उससे दूर रहना चाहिए और जो वस्तु हमें अंदर ले जाए, उसका स्वागत करना चाहिए। सन्तों का साधन – जो मैं पहले ही बता चुका हूँ – बहुत लंबे अनुभव पर आधारित है।
अगर हम निश्चित रूप से जानते हैं कि हम सही मार्ग पर चल रहे हैं, तब अगर हम हर रोज़ सिर्फ़ एक क़दम भी चलेंगे तो भी मंज़िले-मक़सूद के नज़दीक होते जाएँगे और एक दिन वहाँ ज़रूर पहुँच जाएँगे चाहे वह मंज़िल कितनी भी दूर क्यों न हो। आप शायद कहेंगे, “मैं किस तरह इस बात को जानूँ कि मैं ठीक मार्ग पर हूँ।” मैं आपको इसे ख़ुद जाँचने का साधन बताता हूँ। जब तक आपने ख़ुद किसी चीज़ की जाँच नहीं की है, तब तक आपको सिर्फ़ विश्वास के आधार पर काम करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे हम यह विश्वास रखकर पुल बनाते हैं कि हम उसे पार कर जाएँगे।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
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भले ही ऐसा लगे कि सफलता नहीं मिल रही है, फिर भी विश्वास और लगन के साथ अभ्यास करते रहना चाहिए। मन अनगिनत युगों से बाहर भटकने का आदी हो चुका है और हर बार यह अधिक फैलता गया है। हमारा उद्देश्य मन को समेटकर तीसरे तिल पर लाकर शब्द से जोड़ना और निज-घर की ओर यात्रा शुरू करना है। तीसरे तिल तक आना पहला क़दम है; यही सबसे कठिन है। यहाँ तक पहुँचने में कितना समय लगता है, यह हमारे पिछले कर्मों के फल और दृढ़ता, सच्चाई तथा लगन के साथ सतगुरु के हुक्म के अनुसार अभ्यास करने पर निर्भर करता है। करनी और दया-मेहर साथ-साथ चलते हैं। जितना अधिक हम प्रयत्न और मेहनत करते हैं, उतनी ही अधिक दया-मेहर हमें तब तक प्राप्त होती रहती है जब तक हम अपनी मंज़िल पर नहीं पहुँच जाते।
महाराज चरन सिंह जी, सन्तमत दर्शन