जटिल भ्रम से सरल सत्य की ओर
इस मायामय जगत में हम युगों-युगों से और अनगिनत जन्मों से रह रहे हैं। हालाँकि हम जानते हैं कि हमारे आसपास का माहौल हमें बहुत प्रभावित करता है और हमारी सोच को निर्धारित करता है, फिर भी हम में अपनी इच्छाओं के अनुसार धारणाएँ बनाने की अद्भुत क्षमता है। इस मायामय जगत का हिस्सा होने के कारण हम अकसर ख़ुद ही अपने लिए भ्रम के जाल बुन लेते हैं।
भर्म का बाँधा ई जगत्, येहि बिधि आवे जाय।
मानुष जीवन पाय के, नर काहे जहँड़ाय॥
कबीर साहिब
बदक़िस्मती से, यह हमारे रूहानी जीवन को भी प्रभावित करता है जिससे हमारे लिए संतमत के सरल-से उपदेश को समझना मुश्किल हो जाता है तथा हम माया के जाल में और ज़्यादा उलझ जाते हैं।
सत्य सरल है, भ्रम इसे अत्यंत जटिल बना देता है।
मेहर बाबा, कॉन्सेप्ट्स एण्ड इल्यूजन्स: ए पर्सपेक्टिव
किताब-ए-मीरदाद में एक कहानी है। उस कहानी में एक महात्मा ने प्रवचन समाप्त करने के बाद अपने शिष्यों की ओर देखा ताकि अगर किसी को कोई सवाल पूछना हो या कोई शंका दूर करनी हो तो वह कर सके। तभी उनमें से एक शिष्य उठकर खड़ा हुआ और हिम्मत जुटाते हुए बोला, “गुरु जी, आप जो कुछ भी कहते हैं, वह हमें हमेशा उलझन में डाल देता है क्योंकि आप हमें ऐसी बातें समझाते हैं जो कभी किसी व्यक्ति ने नहीं की या किसी किताब में नहीं लिखी गईं।” दूसरे शिष्यों ने आगे से कहा, “आप जो भी समझाते हैं, हमें कम से कम उसका कोई सबूत तो दीजिए ताकि हम उस पर आसानी से भरोसा कर सकें और उसे अमल में ला सकें।”
इसके जवाब में उस महात्मा ने बड़े प्यार से कहा, “तुमने बिलकुल ठीक कहा। दरअसल, तुम्हारे पास बहुत-से कान हैं, इसलिए तुम सुन नहीं पाते। अगर तुम्हारे पास सुनने और समझने के लिए सिर्फ़ एक कान होता तो तुम्हें किसी सबूत की ज़रूरत न पड़ती।”
कन्फ़्यूशियस का कथन है:
जीवन असल में बहुत सरल है लेकिन हम इसे जटिल बनाने में लगे रहते हैं।
लाइफ़’ज़ टू शॉर्ट टू फोल्ड फिटेड शीट्स’ पुस्तक में से उद्धृत
अगर जीवन सरल है तो क्या रूहानी जीवन के रहस्य को समझना भी सरल नहीं होना चाहिए?
रूहानियत परम सत्य का मार्ग है जिसके सिद्धांत इस प्रकार हैं:
- परमात्मा की दया-मेहर, जिससे सतगुरु से मिलाप होता है;
- सतगुरु, जो हमें नाम से जोड़ते हैं;
- नाम, जो परमात्मा या ‘शब्द’ है।
सचै सबद सची पति होई॥ बिन नावै मुकति न पावै कोई॥
बिन सतिगुर को नाउ न पाए प्रभ ऐसी बणत बणाई हे॥
गुरु अमर दास जी, आदि ग्रंथ
पूर्ण सतगुरु ही नाम के इस रहस्य को समझने में हमारी मदद करते हैं। वह हमें इस भ्रमपूर्ण दुनिया से मुक्ति के दरवाज़े तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं और उसे खोलने की सरल युक्ति भी समझाते हैं।
नउ दर ठाके धावत रहाए॥ दसवै निज घर वासा पाए॥
ओथै अनहद सबद वजहि दिन राती गुरमती सबद सुणावणिआ॥
गुरु अमर दास जी, आदि ग्रंथ
संत-सतगुरु हमें समझाते हैं कि सत्य और असल आनंद दसवें दरवाज़े यानी तीसरे तिल में जाकर ही प्राप्त होता है। जब तक हम अपने ध्यान को अंदर तीसरे तिल पर केंद्रित करके वहाँ मौजूद दिव्य ध्वनि और प्रकाश से नहीं जुड़ जाते तब तक हमें सदा का सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ध्यान के एकाग्र होने पर आत्मा को शब्द की वह दिव्य-धुन सुनाई देने लगती है जिसे आत्मा अपनी सुनने की शक्ति ‘सुरत’ द्वारा सुनती हुई वापस निज-घर पहुँच जाती है। धीरे-धीरे आत्मा अपनी देखने की शक्ति ‘निरत’ द्वारा उस प्रकाश को देखने लगती है जो आत्मा के मार्ग को और ज़्यादा प्रकाशवान करता है। जब आत्मा अपनी मंज़िल पर पहुँचकर परमात्मा में अभेद हो जाती है तब वह अकथनीय शांति और परम आनंद के लोक में पहुँच जाती है। फिर वहाँ से इसे मायामय संसार में वापस नहीं लौटना पड़ता क्योंकि फिर यह मृत्यु और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाती है। नीचे दिया कथन बड़े सुंदर ढंग से गुरु नानक देव जी के उपदेश का सार व्यक्त करता है:
बिन नावै को संग न साथी मुकते नाम धिआवणिआ॥
आदि ग्रंथ
संत-सतगुरु हमें बार-बार नियमित रूप से भजन-सिमरन करने की नसीहत देते हैं जबकि हमें लगता है कि उनके मार्गदर्शन से हमें तुरंत आत्म-ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। लेकिन जब ऐसा नहीं होता तब हम यह मान लेते हैं कि हम भजन-सिमरन में असफल हो गए हैं।
एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्य को एक बहुत बड़े पत्थर को धकेलने के लिए कहा। समर्पित शिष्य होने के कारण उसने तुरंत यह काम शुरू कर दिया। उसने पत्थर को धकेलने की बहुत कोशिश की लेकिन वह हिला तक नहीं। उसने कई घंटों तक उस पत्थर को हिलाने के लिए पूरी कोशिश की – मगर वह उस पत्थर को इंच-भर भी न हिला सका।
वह निराश होकर अपने गुरु के पास वापस आया और उसने उन्हें अपनी असफलता के बारे में बताया। पर वह महात्मा अपने शिष्य की लगन और मेहनत से बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने कहा, “मेरे बच्चे! मैंने तुम्हें पत्थर हिलाने के लिए नहीं, बस धकेलने के लिए कहा था!”
संत-सतगुरु हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस मार्ग पर कोई असफल नहीं होता लेकिन परमात्मा से मिलाप के लिए यह ज़रूरी है कि हम सतगुरु द्वारा दी गई हिदायतों का पालन करें और रूहानी अभ्यास द्वारा मन को निर्मल करें। वे समझाते हैं कि भजन-सिमरन हमारे रूहानी सफ़र में बहुत अहम है। हमें नियमित रूप से बस अपने भजन-सिमरन के लिए बैठना है और अपने मन रूपी बर्तन को साफ़ रखना है। हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कोशिश करना है और इस सफ़र में हम जिस भी मुक़ाम पर हैं उसके लिए शुक्रगुज़ार होना है यानी कि हमें परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहना है।
सतगुरु हमें यक़ीन दिलाते हैं कि प्रेम और श्रद्धा-भाव से किये गए नियमित अभ्यास से परमात्मा की दया-मेहर सहज रूप से प्राप्त होती है जो हमें हमारी अंतिम मंज़िल पर पहुँचा देती है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी हमेशा इन शब्दों द्वारा हमें पहला क़दम उठाने के लिए प्रेरित करते थे:
हमारी जड़ें यहाँ इतनी गहरी हो गई हैं कि उन्हें उखाड़ना इतना आसान नहीं है। इसलिए हमारा एक क़दम बढ़ाना भी बहुत बड़ी बात है … उसकी ओर बढ़ाया हमारा एक क़दम भी काफ़ी है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
रूहानी मार्ग सिर्फ़ बातों का नहीं बल्कि करनी का मार्ग है। एक चीनी कहावत इसे बहुत सटीक और संक्षिप्त रूप में पेश करती है: “मैं सुनता हूँ और भूल जाता हूँ, मैं देखता हूँ और याद रखता हूँ, मैं करता हूँ और समझ जाता हूँ।”
सत्य की पहचान तभी हो सकती है जब हम पूरे विश्वास और प्रेम द्वारा अज्ञानता और भ्रम की दीवारों को गिरा देते हैं। सच्ची लगन और भजन-सिमरन के लिए की गई निरंतर कोशिश आख़िरकार हमें जटिल भ्रम से सरल सत्य की ओर ले जाती है जैसा कि पुस्तक कॉन्सेप्ट्स एण्ड इल्यूजन्स: ए पर्सपेक्टिव में दर्ज इस ज़ेन कहानी में बताया गया है। किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा: “क्या यह सच नहीं कि इनसान के सफ़र की आख़िरी मंज़िल परमात्मा से मिलाप है?” गुरु ने जवाब दिया: “इनसान के सफ़र की आख़िरी मंज़िल परमात्मा से मिलाप नहीं है क्योंकि जुदाई तो कभी थी ही नहीं। हमारे पास सिर्फ़ अंतर्दृष्टि होनी चाहिए ताकि हम इसका अनुभव कर सकें।”