सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए कुछ चुनिंदा सवाल-जवाब
प्रश्न: क्या आप अपने शिष्यों को निजी तौर से जानते हैं या औपचारिक रूप से? उदाहरण के लिए, जब आप मुझे देखते हैं तो क्या आप मेरे बारे में सब कुछ जान लेते हैं, मेरे दु:ख, मेरे शक, मेरा अतीत, मेरा भविष्य आदि? मैं यह सब इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि जब लोग ऐसा कहते हैं कि सतगुरु सब कुछ जानते हैं तो मुझे शक होता है। मैं यह समझ नहीं पाता कि इसे कैसे स्वीकार करूँ? क्या कृपया आप इस बारे में समझाएँगे?
उत्तर: सतगुरु आत्मा और परमात्मा के बीच एक ज़रिया हैं। सतगुरु का संबंध आत्मा से है, उसकी तरक़्क़ी में सहायता करना और उसे परमात्मा के स्तर तक पहुँचाना। आत्मा देह के बंधन और मन की ग़ुलाम होने के कारण कर्मों के जाल में फँसी हुई है। इसीलिए इसे कुछ ख़ास कर्मों को भुगतना पड़ता है, नहीं तो कोई भी देह में न रहता। इसे ही भाग्य या प्रारब्ध कहते हैं।
सतगुरु चाहे जानते हों या न जानते हों, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन यह निश्चित है कि सतगुरु आत्मा की रूहानी तरक़्क़ी में सहायता करते हैं, न कि दुनियावी पदार्थों को पाने में। हमने दया-मेहर और सहायता को भौतिक पदार्थों से जोड़ा हुआ है यानी कि हमारी सांसारिक कामनाओं, सांसारिक क़ामयाबियों और सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से। लेकिन सतगुरु का मक़सद यह नहीं होता। वह सब तो पहले से ही तय है, हमें अपने प्रारब्ध को तो भोगना ही होता है।
सतगुरु का मक़सद बस यही होता है कि आत्मा का रूहानी विकास कैसे करना है। वे आत्मा को अंतर में रूहानी विकास करने के लिए हिम्मत बख़्श देते हैं ताकि यह परमात्मा के स्तर तक ऊपर उठ जाए और मन के पंजे से आज़ाद होकर जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाए। यह उनकी ज़िम्मेदारी है। हमारा असली गुरु शब्द है, जो हम सबके अंदर है और ऐसा कुछ भी नहीं है, जो शब्द से छिपा हो। अगर वह सिरजनहार है तो वह सर्वव्यापक और सर्वज्ञाता भी है।
वह शब्द जिसने सारी सृष्टि की रचना की है, वही हमारा असल गुरु है और वह हम सब के अंदर है। इसलिये वही रचयिता है, वह सब कुछ जानता है और सर्वव्यापक है, उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। सतगुरु ने देह में रहते हुए अंतर में उस शब्द को प्रकट कर लिया है और हम उनके ज़रिए शब्द से जुड़े होते हैं।
संत संवाद, भाग 1
प्रश्न: महाराज जी, यदि भजन करते हुए हमें कोई उन्नति होती दिखाई न दे, लेकिन ऐसा महसूस हो कि ज़िंदगी में कोई दिव्य ताक़त हमारी सहायता कर रही है, तो क्या उस ताक़त का सहारा लेना चाहिए या उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहिए?
उत्तर: हमें पता लगे या न लगे पर सतगुरु की रहमत का हाथ हर हालत में हमारे सिर पर होता है। भजन करते हुए भी हमें अंतर में चाहे कोई रूहानी तरक़्क़ी महसूस हो या न हो, फिर भी हम अपने जीवन में उसका प्रभाव अवश्य महसूस करेंगे। चाहे अंदर तरक़्क़ी होती दिखाई दे या न दे पर अपने स्वभाव में, लोगों के साथ अपने व्यवहार में हम भजन का असर ज़रूर महसूस करेंगे, एक तरह से जीवन के प्रति हमारा पूरा रुख़, हमारा संपूर्ण दृष्टिकोण ही बदल जाएगा। हमें तरक़्क़ी की ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि तरक़्क़ी तो हो ही रही है। भजन का प्रभाव तो पड़ेगा ही, वह हमेशा रहेगा। उसका असर होना तो लाज़िमी है।
जीवत मरिए भवजल तरिए
प्रश्न: महाराज जगत सिंह जी की पुस्तक आत्म-ज्ञान (Science of the Soul) में हमने पढ़ा था कि एक शिष्य द्वारा दूसरे शिष्य की निंदा करना बहुत बड़ा पाप है। जो दूसरों की निंदा करता है उसे इसका क्या परिणाम भोगना पड़ता है?
उत्तर: सभी संत हमें एक ही बात समझाते आए हैं। क्राइदस्ट ने भी कहा है कि तुम्हें अपनी आँख का शहतीर तो दिखाई नहीं देता लेकिन दूसरे की आँख का तिनका भी दिखाई देता है। सरदार बहादुर महाराज जी के कहने का अभिप्राय था कि दूसरों की निंदा करने के बदले हमें अपनी निंदा करनी चाहिए कि हममें वह कौन-सी कमी है जिसके कारण हमारा किसी के साथ गुज़ारा नहीं होता। अगर कोई हमें सहयोग नहीं दे रहा तो इस बात के लिए उसकी निंदा करने के बजाय हमें ही उसे सहयोग देना चाहिए। हमें परिस्थिति के अनुसार अपने आप को ढालना होगा, परिस्थिति हमारे मुताबिक़ नहीं ढल सकती। दूसरों से अच्छे व्यवहार की आशा करने के बजाय हमें ख़ुद दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये। हमारी दूसरों से हमेशा यही अपेक्षा रहती है कि वे हमारे साथ शालीनता से पेश आएँ और उनका व्यवहार अच्छा और प्रेमपूर्ण हो। लेकिन हम यह नहीं समझते कि उस सबकी शुरुआत हमें ही करनी होगी। उनके कहने का यही अभिप्राय है कि अपने अंदर झाँके बिना और अपने दोष देखकर उन्हें सुधारने के बजाय, बेवजह किसी की निंदा करना पाप है।
जीज़स क्राइस्ट का उपदेश: सेंट मैथ्यू, भाग 2