सदा का सुख
मिस्र के प्रसिद्ध स्फिंक्स का सिर मनुष्य का और शरीर शेर का है। कहा जाता है कि दुनिया-भर से बहुत-से लोग इसके पास अपनी मन्नतें लेकर आते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि स्फिंक्स मनोकामनाएँ पूरी कर सकता है। स्फिंक्स की दिलचस्प बात यह है कि उसके चेहरे पर तराशी गई व्यंग्य-भरी मुस्कान मानो उन लोगों का उपहास कर रही हो जो उसके पास अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। मगर बहुत-से लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जाता क्योंकि उनकी इच्छाओं ने उन्हें अँधा कर रखा है।
एक व्यक्ति स्फिंक्स के पास आता है और एक सुंदर स्त्री से विवाह के लिए मन्नत माँगता है। उसकी मन्नत पूरी हो जाती है और उसका विवाह एक बहुत ख़ूबसूरत स्त्री से हो जाता है लेकिन वह बहुत घमंडी और स्वार्थी होती है। उसका चेहरा तो सुंदर होता है पर वह ज़िद्दी होती है और उसके दिल में किसी के लिए दया-भाव नहीं होता। धीरे-धीरे अपनी पत्नी के लिए उस व्यक्ति का प्यार कम होने लगता है। तब उसे एहसास होता है कि स्फिंक्स के चेहरे की वह मुस्कान मानो उसे पहले ही बता रही थी कि सिर्फ़ काया के सुंदर होने से सुख नहीं मिल सकता।
एक अन्य व्यक्ति स्फिंक्स के पास धन की कामना लेकर आता है और स्फिंक्स उसकी इच्छा पूरी कर देता है। वह व्यक्ति धनवान बन जाता है लेकिन धीरे-धीरे उसका हृदय पत्थर की तरह कठोर बन जाता है। सोना-चाँदी और हीरे-जवाहरात के रूप में वह जितनी दौलत इकट्ठी करता है, उसके अंदर से दया-भाव उतना ही कम होता जाता है और वह अपने व्यवहार के कारण अपने वफ़ादार मित्रों को खो देता है। उसका हृदय चिंताओं के बोझ और इस भय से ग्रस्त हो जाता है कि कहीं उसका धन चोरी न हो जाए या खो न जाए। तब उसे समझ आता है कि जब वह धन-दौलत माँग रहा था तब स्फिंक्स ने उसे ऐसी नज़रों से क्यों देखा मानो वह कह रहा हो – “जो माँग रहे हो, पहले उस पर फिर से विचार करो।”
तीसरा व्यक्ति स्फिंक्स के पास महान् और प्रसिद्ध बनने की मन्नत लेकर जाता है। किसी तरह उसका ध्यान स्फिंक्स के चेहरे पर उभरे व्यंग्यपूर्ण भाव की ओर जाता है लेकिन वह उसे नज़रअंदाज़ कर देता है। क़िस्मत से वह सच में एक प्रसिद्ध व्यक्ति बन जाता है लेकिन उस प्रतिष्ठा के कारण उसके पास अपने परिवार के लिए बहुत कम समय बचता है। वह अपनी पत्नी और बच्चों की ओर ध्यान नहीं दे पाता, आख़िरकार वे उसे छोड़कर चले जाते हैं। जब वह बिलकुल अकेला हो जाता है तब उसे एहसास होता है कि प्रसिद्धि में भी सुख नहीं है।
ख़ुशी अंदर से आती है। यह इंद्रियों के भोगों से या बाहर से नहीं मिलती। आप बाहर से कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकते। चाहे आपको अपने काम से कितनी ही संतुष्टि क्यों न मिले, चाहे आप कितनी ही समाज सेवा क्यों न करें, आप किसी भी पेशे में हों, आपको इन सब से कभी स्थायी सुख नहीं मिलेगा, क्योंकि आत्मा हमेशा अपने स्रोत के लिए तड़पती है। जब तक आत्मा अपने स्रोत में समा नहीं जाती, यह कभी सुखी नहीं होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
हम अकसर सुख, आराम और चिंतामुक्त जीवन को ही सच्ची ख़ुशी समझ बैठते हैं। पर असल में परियों की कहानियों के नायक और नायिकाओं के सिवाय इस मायामय दुनिया में कोई भी सदा सुखी नहीं रहता। कुछ लोगों को यह बात जल्दी समझ आ जाती है, कुछ लोगों को इसे समझने में देर लगती है। माया का मतलब है भ्रम यानी कि जो चीज़ आती है और चली जाती है।
मैं सच उसे कहता हूँ जो कभी नहीं बदलता। जो सच है, सिर्फ़ वही असल है। बाक़ी सब भ्रम है। केवल परमात्मा सच है। आत्मा सच है। बाक़ी सब कुछ बदलता रहता है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
ऐसा समय भी आता है जब दुनिया से प्राप्त होनेवाले सुखों को लेकर हम सवाल करने लगते हैं। दुनिया एक हाथ से देती है और दूसरे हाथ से छीन लेती है। देर-सवेर हमें एहसास होता है कि इच्छाओं की पूर्ति से मिलने वाली ख़ुशी भी समय पाकर बोझ बन जाती है। हुज़ूर महाराज जी अपने सत्संगों में फ़रमाया करते थे कि जिस चीज़ को हासिल करने के लिए हम पाँच साल प्रार्थना करते हैं, फिर उसी से छुटकारा पाने के लिए अगले दस साल प्रार्थना करते रहते हैं।
एक सवाल जो अकसर हमें दु:खी करता है जिसका जवाब हम सब जानते हैं, फिर भी आशा करते रहते हैं कि शायद यह सच न हो। असल में हमारा अपना है क्या, जो सदा हमारे साथ रहेगा?
वास्तव में इस संसार की कोई भी वस्तु नहीं!
हुज़ूर महाराज जी एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया करते थे कि एक बच्चा अपने पिता की अँगुली पकड़कर मेले में जाता है। वह मेले की चमक-दमक – झूलों, रंग-बिरंगी टिमटिमाती रोशनियों, रोमांच से भर देनेवाली सवारियों और मिठाइयों तथा खिलौनों से सजी दुकानों को देखकर मोहित हो जाता है। लेकिन जब उसके हाथ से अपने पिता की अँगुली छूट जाती है और वह मेले में खो जाता है तब वह रोने लगता है। फिर वह उस मेले की उन आकर्षक चीज़ों को देखना भी गवारा नहीं करता; तब उसे सिर्फ़ अपना पिता चाहिए। उस वक़्त उसे एहसास होता है कि मेले से उसे ख़ुशी तब तक ही मिल रही थी जब तक उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा हुआ था।
यही वह पल है जब माया का भ्रम टूटता है और हमें सत्य का बोध होता है।
जब हम परमात्मा का हाथ थाम लेते हैं, जब हमारा ध्यान उसकी तरफ़ होता है, तब हम संतुलन खोए बिना ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं। अगर हम उसे बिलकुल भूल जाते हैं तो हम इस दुनिया में दु:खी ही रहते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी आत्मा क्या चाहती है? आत्मा अपनी ख़ुराक चाहती है। जब मन स्थिर होता है तभी आत्मा अपने भीतर मौजूद शब्द, उस दिव्य शक्ति के आनंद का अनुभव कर सकती है।
असल में, हम सब जाने-अनजाने इसी दिव्य शक्ति की खोज कर रहे हैं मगर बजाय इसके हम दुनियावी सुखों के पीछे भागते रहते हैं जोकि आरज़ी हैं।
संत-महात्मा हमें बार-बार समझाते हैं कि सच्चा सुख अंदर है और यह दुनिया हमारा असल घर नहीं है। यहाँ सिर्फ़ आरज़ी सुख प्राप्त हो सकते हैं। आख़िर वह जगह सुख का स्थान कैसे हो सकती है जहाँ बड़े जीव ज़िंदा रहने के लिए छोटे जीवों को खाते हैं; जहाँ तूफ़ान, भूकंप और आपदाएँ पल-भर में हमारे घर-परिवार उजाड़ देती हैं; जहाँ बीमारी और मृत्यु का ख़तरा सदा बना रहता है?
इसलिये संत कहते हैं कि यह दुनिया आपके रहने लायक़ नहीं है, इसमें हासिल करने लायक़ ख़ास कुछ नहीं है, इस रचना को छोड़कर हमें अपने पिता के पास वापस जाना चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
इस रूहानी मार्ग पर चलते हुए हम यह भूल गए हैं कि हमारी आत्मा हमारे चंचल मन से कहीं अधिक शक्तिशाली है। सतगुरु ने नामदान देकर हर रोज़ भजन-सिमरन के ज़रिए हमें स्वयं को सशक्त बनाने की युक्ति समझा दी है।
अपनी आत्मा की भलाई के लिए हमें ऐसे कर्म करने चाहिएँ जो हमें परमात्मा की ओर ले जाएँ। हमें शरीर की देखभाल भी करनी चाहिए पर इस ढंग से कि वह हमारी आत्मा की सेवा बन जाए। तभी हम असल में सदा के लिए सुखी हो सकते हैं।
हम तभी सुखी हो सकते हैं जब हमारा मनुष्य-शरीर में आने का मक़सद पूरा हो जाता है। और यह मक़सद तभी पूरा हो सकता है, जब हम अपने ख़याल को अंदर की तरफ़ मोड़कर वहीं परमात्मा की तलाश करने की कोशिश करें। जब तक हमारा उससे मिलाप नहीं हो जाता, हम सच्चा सुख, सच्चा आनंद प्राप्त नहीं कर सकते और न ही जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पा सकते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1