आज्ञाकारी होना
आधुनिक समय में ‘आज्ञाकारी होना’ एक चुनौती बन गया है। मुख्य तौर पर युवावस्था के शुरुआती वर्षों में बच्चों के लिए इसकी बड़ी अहमियत है। एक बार जब उनमें सोचने-समझने की शक्ति विकसित हो जाती है और वे समझदार हो जाते हैं तब हर सभ्यता और समाज के युवा अपने फ़ैसले ख़ुद लेना चाहते हैं और अपने विचारों को बिना झिझक व्यक्त करना चाहते हैं। हर व्यक्ति अपनी ‘मैं’ को सबसे अहम समझता है, भले ही यह हमारे आदर्शों के मुताबिक़ न हो।
आज के इस दौर में अपनी हौमैं को बढ़ावा देने के प्रचलन के बावजूद, जिन लोगों का झुकाव रूहानियत की ओर है उनके लिए आज्ञाकारी होना और समर्पण करना आज भी बहुत अहम हैं। सभी रूहानी मार्ग परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और ऐसा मार्ग दिखाते हैं जिसमें हौमैं को महत्त्व नहीं दिया जाता। असल में हम रूहानी तौर पर जाग्रत होकर निर्मल ही तब होते हैं जब हम अपनी हौमैं को छोड़कर परमात्मा की रज़ा में रहते हुए सतगुरु के उपदेश का पालन करते हैं।
संतमत में आज्ञा यानी हुक्म का पालन करना बेहद अहम गुण है क्योंकि यह हमारे ग़रूर और अहंकार को नियंत्रित करने और दिव्य प्रेम के अर्थ को समझने की कुंजी है।
हुक्म मानना आत्मसमर्पण करने का दूसरा नाम है और आत्मसमर्पण हौमैं को बाहर निकालने का दूसरा नाम है। जब हमारे अंदर घमंड होता है, हौमैं होती है, तब हम किसी के आगे समर्पण करना नहीं चाहते, किसी का हुक्म मानने के लिए तैयार नहीं होते। दूसरे शब्दों में, हुक्म मानने का मतलब है अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा में लीन कर देना। अपनी ख़ुदी को अपने अंदर से निकाल देना, अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा में लीन कर देना ही हुक्म मानना है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
रूहानी मार्ग दिव्य प्रेम की खोज और पहचान का मार्ग है, इसकी झलक हमारे दैनिक जीवन में दिखाई देनी चाहिए। सभी रूहानी मार्ग हमें इसी दिव्य प्रेम के बारे में समझाते हैं जो हमें परमात्मा की ओर ले जाता है। यह रूहानी खोज का सफ़र है जबकि हममें से ज़्यादातर लोग इसे दुनियावी प्रेम जैसा ही समझते हैं क्योंकि हम सिर्फ़ इसी से परिचित हैं।
सतगुरु से मिलाप हो जाने पर, संतमत के उपदेश को स्वीकार कर लेने और शर्तों तथा जीवनशैली को अपनाने पर हमें उस दिव्य प्रेम का एहसास होता है। हमें अपने अंदर ऐसी कशिश महसूस होती है जिससे हम सतगुरु की ओर खिंचे चले जाते हैं और वह हमारे प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं। अंतत: हम उनके हुक्म का पालन करने लगते हैं और अपने आप को उनके अनुसार ढालने लगते हैं।
जब परमात्मा चाहेगा कि आप उससे प्यार करें तो वह आपके मन में प्रेम जाग्रत कर देगा। लेकिन यह प्रेम देहधारी सतगुरु के उपदेश के अनुसार भजन-सिमरन करने से ही आता है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
भजन-सिमरन द्वारा ही असल बदलाव आता है। स्थिर बैठकर पाँच नाम का सिमरन करने से मन एकाग्र होने लगता है और बाहर भटकना बंद कर देता है। भजन-सिमरन द्वारा आत्मा के रुख़ को अंदर और ऊपर की ओर मोड़ने में मदद मिलती है। इससे मन वश में आ जाता है और हमारा ध्यान दुनिया के बजाय सतगुरु की तरफ़ होने लगता है। जब हमारा ध्यान सतगुरु पर ही केंद्रित रहता है तो यह धीरे-धीरे प्रेम में बदलने लगता है। यही प्रेम आख़िरकार हमें हौमैं – ख़ुद के प्रति हमारे प्रेम – से बेलाग कर देता है और हमें सबसे निर्मल और मीठे से मीठे प्रेम का अनुभव होने लगता है।
जब हमारे अंदर सतगुरु और परमात्मा के लिए प्यार पैदा हो जाता है तो दूसरे सब गुण भी अपने आप हमारे अंदर जाग्रत हो जाते हैं।…
जब वह प्यार हमारे अंदर आ जाता है तो बाक़ी सब चीज़ें अपने आप ही बाहर निकल जाती हैं। फिर आज्ञापालन, समर्पण, समझदारी, ये सब अच्छे गुण अपने आप ही जाग्रत हो जाते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
असल में, जब वह प्रेम प्रफुल्लित होने लगता है तो हम पहले से बेहतर इनसान बन जाते हैं और हम अपना जीवन संतमत के उपदेश के मुताबिक़ जीने लगते हैं, जहाँ तक हो सके हम सतगुरु के हुक्म के अनुसार सब कुछ करने लगते हैं। हमारे अंदर संतोष आ जाता है और हम हुक्म को मानने लग जाते हैं फिर चाहे हालात अच्छे हों या बुरे, हम ख़ुश रहने लगते हैं। इसी प्रेम के द्वारा हम दुनियावी चुनौतियों का धैर्य और सहज-भाव से सामना करते हैं, इस विश्वास के साथ कि जो कुछ भी हमारे साथ होता है उसी में हमारी भलाई है। आख़िरकार हुक्म का पालन परमात्मा के प्रति हमारे प्रेम की पहचान बन जाता है।