फिर से शुरुआत करना
हम सब को जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर वीडियो गेम खेलना याद होगा। किसी एक गेम को चुनना, किसी लक्ष्य को लेकर शुरुआत करना और उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हड़बड़ी में कंट्रोलर पर बटन दबाते रहना। लेकिन जब हमसे गलती हो जाती थी या कोई ऐसी रुकावट आ जाती थी जिसे पार करना नामुमकिन लगने लगता था तब हम क्या करते थे? हम अकसर ‘रिसेट’ बटन दबाकर गेम को फिर से शुरू कर देते थे और कभी-कभी हमें महसूस होता था कि दूसरी या तीसरी बार में उस गेम को खेलना आसान हो गया है।
हमारा जीवन भी एक वीडियो गेम की तरह ही है जिसमें बहुत-से खिलाड़ी एक साथ खेलते हैं। हम खेल शुरू करते हैं और हमारा एक अंतिम लक्ष्य होता है। इस खेल के दौरान जो लोग, चीज़ें और परिस्थितियाँ हमें हमारे लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, वे हमारी शक्ति को बढ़ाते हैं। साथ ही इस खेल में हमें ऐसे लोगों, चीज़ों और परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ता है जो हमारे खेल में अड़चनें पैदा करके हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं। वीडियो गेम की तरह ही हमारे जीवन में भी एक रिसेट बटन है। यह रिसेट बटन भले ही जो कुछ घट चुका है उसे बदल न सके, लेकिन यह हमें फिर से शुरुआत करने का मौक़ा देता है। तो जीवन में इस रिसेट बटन को कैसे दबाया जाए?
फिर से शुरुआत करने का पहला क़दम अपने जीवन के मक़सद की पहचान करना है। दुनिया की रोज़मर्रा की भागदौड़ में हम बड़ी आसानी से अपने असल मक़सद को भूल जाते हैं।
ज़िंदगी का असली मक़सद परमात्मा से मिलाप करना है। परमात्मा ने सिर्फ़ इनसान को ही यह हक़ दिया है। यह मनुष्य-शरीर सृष्टिरूपी सीढ़ी का सबसे ऊपरी डंडा है। यहाँ से या तो हम फिसलकर निचली योनियों में जा सकते हैं या फिर इससे ऊपर उठकर परमात्मा से मिलाप करके जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पा सकते हैं। हम इस दुनिया में चाहे दूसरी योनियों में भी आए हों, बाक़ी सब चीज़ें तो हमें वहाँ भी मिलती रही हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
अगला क़दम रूहानी अभ्यास को समय देना है। जो कुछ हमने सीखा है, उस पर अमल करना है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारा रूहानी अभ्यास दिन के कुछ घंटों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि हम जो कुछ भी करते हैं उसमें से इसकी झलक दिखाई देनी चाहिए।
जब हम दिन में अपने दुनियावी काम शुरू करते हैं तो हमें भजन-सिमरन को भूल नहीं जाना चाहिए। इसका प्रभाव हमारे साथ बना रहना चाहिए। भजन-सिमरन हमारे अंदर नेक विचार, अच्छी सोच और अच्छे उसूल क़ायम करता है और हमें अपने रोज़मर्रा के कामकाज के दौरान इन सबको नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। हमारे जीवन के सभी कार्यों में हमारे भजन-सिमरन की झलक दिखायी देनी चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
तीसरा क़दम अपनी कोशिशों को जारी रखना है। रूहानी तरक़्क़ी की कोशिश के बावजूद जब हमें रूहानी तरक़्क़ी होती दिखाई नहीं देती तब हम निराश हो सकते हैं। फिर भी इस वजह से हमें कोशिश करना छोड़ नहीं देना चाहिए। आख़िरकार, लगातार कोशिश करते रहने से यह हमारी आदत बन जाता है। महाराज चरन सिंह जी एक शिष्य के सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाते हैं:
आदतें आसानी से पड़ जाती हैं और जल्दी ही हमारी रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं और फिर अगर हम रोज़ की आदत के मुताबिक़ कोई काम न करें, तो ऐसा लगता है कि कुछ ऐसा है जो हम नहीं कर रहे। इसी तरह हर रोज़ एक ही समय पर बैठने से भजन-सिमरन हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। मिसाल के तौर पर, हमें चाहे भूख लगी हो या न लगी हो, हम दोपहर को एक बजे खाने की मेज़ पर जा बैठते हैं; या फिर जैसे ही घड़ी में सुबह के ग्यारह बजते हैं, आप कॉफ़ी पीने बैठ जाते हैं। ये बातें आदत बनकर हमारी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाती हैं। इसी तरह भजन-सिमरन भी हमारी आदत और दिनचर्या का हिस्सा बन जाना चाहिये। अगर आप भजन-सिमरन को ज़िंदगी के बाक़ी कामों से कम अहमियत देंगे और सोचेंगे कि चलो, जब वक़्त मिलेगा भजन कर लेंगे, या जब दिल चाहेगा तब भजन में बैठेंगे, तो आप कभी भजन-सिमरन कर ही नहीं सकेंगे। इसलिए आपको इसे अपनी ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा बना लेना चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
इसके बाद हमें अपनी नकारात्मकता को ख़त्म करने की ज़रूरत है। ज़िंदगी सदा हमारे सामने चुनौतियाँ खड़ी करती है और अकसर उस समय जब हमें इनकी बिलकुल उम्मीद नहीं होती। ऐसी स्थिति में या तो हम बिलकुल निराश हो सकते हैं क्योंकि चीज़ें हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं हो रहीं या फिर हम हिम्मत जुटाकर आशावादी दृष्टिकोण अपना सकते हैं। अपने सीमित नज़रिए की वजह से शायद हमें अपनी तरक़्क़ी दिखाई नहीं देती, लेकिन सतगुरु हमें यक़ीन दिलाते हैं कि यदि हम हमेशा अपनी तरफ़ से पूरी ईमानदारी से कोशिश करते रहें तो हम हमेशा तरक़्क़ी करते हैं, भले ही वह थोड़ी-सी ही क्यों न हो।
अगर हम अभी तक संघर्ष कर रहे हैं तो भी हमें कोशिश करते रहना चाहिए। हमें हर पल, हर दिन नई शुरुआत करने का मौक़ा मिलता है। पिछली कमियों और कमज़ोरियों को पकड़कर बैठे रहना तो आसान है लेकिन हमें उन चीज़ों को छोड़ देना चाहिए जिन्हें हम बदल नहीं सकते या जिन पर हमारा कोई वश नहीं चलता। हमें कोशिश करते रहना चाहिए – हमसे बस यही उम्मीद की जाती है।
तो चलिए, ज़िंदगी की नई शुरुआत करने के लिए थोड़ा-सा समय निकालें – अपने मक़सद को पहचानें, भजन-सिमरन करें, उसे करते जाएँ, नकारात्मकता को ख़त्म करें और फिर से कोशिश करें।