क्या आप जानते हैं?
इनसान को यह शक्ति प्राप्त है कि वह शरीर और मन दोनों के मोह से अलग हो सके, इसलिए उसका यह कर्तव्य है कि वह उस शक्ति को विकसित करे और शरीर और मन के दु:खों से आज़ाद हो जाए। इसका सबसे आसान तरीक़ा यह है कि हम उससे प्रेम करें जो मन और शरीर के दायरे के पार का हो और वह शब्द-धुन है। धुन के साथ जितना गहरा प्रेम होगा, मन और शरीर से उतना ही ज़्यादा मोह टूटता जाएगा।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
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आम तौर पर जब मन चिंतित और परेशान हो तो एकाग्रता प्राप्त कर सकना कठिन होता है क्योंकि ऐसे समय में ध्यान ऊपर तीसरे तिल की ओर उठने के बजाय हृदय चक्र में अटका रहता है। कठिनाइयों का सामना करने के लिए उचित उपाय करने चाहिएँ और फिर चिंता नहीं करनी चाहिए। शेष सब सतगुरु की मौज पर छोड़ देना चाहिए; वे जो ठीक समझें, करें।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
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संतों के सत्संगी को मरते वक़्त तकलीफ़ नहीं होती, बल्कि और शूरता आ जाती है, क्योंकि वह पहले से मौत को याद रखता है और संसार में कारज मात्र बरतता है। उसकी संसार की जड़ पहले से कटी हुई है। जैसे कटे हुए दरख़्त की हरियाली चंद रोज़ की है, इस तरह संतों के सत्संगी का संसारी व्यवहार समझना चाहिए।
स्वामी जी महाराज, सारबचन राधास्वामी वार्तिक