संतुलन की युक्ति
सबसे पहले तुम प्रभु के साम्राज्य में पहुँचने का यत्न करो, फिर तुम्हें सब कुछ अपने आप प्राप्त हो जाएगा।
बाइबल, सेंट मैथ्यू
हम अकसर अपने बड़े-बुज़ुर्गों को यह कहते हुए सुनते हैं, “हमें संतुलित जीवन जीना चाहिए।” संतुलन क्या है? सरल शब्दों में कहें तो संतुलन का मतलब है किसी चीज़ को इस तरह से टिकाना कि वह गिरे नहीं। हममें से बहुत-से लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में चीज़ों का संतुलन बनाना जानते हैं जैसे कि ट्रे पर पानी का गिलास रखकर ले जाना या साइकिल चलाते हुए अपने शरीर का संतुलन क़ायम रखना। भले ही ये बातें सुनने में सरल लगती हों लेकिन शुरुआत में यह सब मुश्किल हो सकता है पर अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे ऐसा करना आसान हो जाता है।
संतुलित जीवन के बारे में हर किसी की अपनी राय है। हम दुनिया और इसके शक्लों-पदार्थों के लिए भटकते हुए अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है और साल बीतते जाते हैं, हम दुनियावी मसलों में और अधिक उलझकर ग़लत चीज़ों को प्राथमिकता देने लग जाते हैं। संपूर्ण रूप से देखें तो जीवन में संतुलन बनाए रखने का मतलब है दुनियावी और परमार्थी दोनों लक्ष्यों को हासिल करना।
संत-सतगुरु ने हमें हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करने की रूहानी युक्ति बता दी है। यह हमें हमारे असल वुजूद के प्रति जागृत करता है। लेकिन फिर वही बात, यह कहने में जितना सरल लगता है, करने में उतना आसान है नहीं। सवाल-जवाब के हर सत्र के दौरान हमने अकसर शिष्यों को सतगुरु से यही कहते सुना है कि हम ढाई घंटे भजन-सिमरन के लिए नहीं बैठ पाते। सवाल भी अकसर यही होता है और जवाब भी हमेशा वही होता है।
आइए एक पतंग का उदाहरण लेते हैं जो एक डोर से बंधी हुई है जिसे हमने अपने हाथ में मज़बूती से थामा हुआ है। अब यदि हम इस डोर को थोड़ा-सा ढीला छोड़ दें तो पतंग थोड़ा ऊपर उठने लगेगी। जितना ज़्यादा हम डोर को ढीला छोड़ते जाएँगे, पतंग उतनी ही ऊपर उड़ती जाएगी। आत्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही है; हम जितना अधिक अपने लक्ष्य पर ध्यान देंगे और भजन-सिमरन करेंगे, हमारी आत्मा धीरे-धीरे उतना ही ऊपर उठकर परमात्मा की ओर बढ़ने लगेगी। संत-सतगुरु अकसर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हमें छोड़ना सीखना चाहिए; जितना ज़्यादा हम अपनी डोर को दुनिया से बाँधे रखेंगे, उतनी ही हमारी आत्मा यहाँ फँसी रहेगी। आत्मा बड़ी मज़बूती से परमात्मा से बँधी हुई है; हमें भजन-सिमरन द्वारा आत्मा को धीरे-धीरे परमात्मा की ओर जाने देना है।
शिष्य और गुरु का रिश्ता बिलकुल माँ और बच्चे जैसा होता है। एक माँ का फ़र्ज़ अपने बच्चे को तब तक गोद में उठाना होता है जब तक कि वह चलना नहीं सीख लेता। फिर बच्चा छोटे-छोटे क़दमों से चलना शुरू करता है और धीरे-धीरे ठीक से चलना और आगे बढ़ना सीख लेता है। ठीक इसी प्रकार, शिष्य भी सतगुरु के मार्गदर्शन में अभ्यास द्वारा अपने ध्यान को एकाग्र करना सीख लेता है। शिष्य जितना अधिक समय उस अभ्यास में लगाता है, वह दुनियावी और परमार्थी जीवन के बीच उतनी ज़्यादा मज़बूती से संतुलन क़ायम कर पाता है।
हमारा सकारात्मक नज़रिया जीवन में संतुलन क़ायम करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जैसा कि इस सुप्रसिद्ध कहानी में दर्शाया गया है:
एक कारोबारी पहाड़ों पर छुट्टियाँ बिताने के लिए गया। वह वहाँ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहा था। उसने वहाँ एक किसान को घोड़ा गाड़ी लेकर पहाड़ी से नीचे उतरते देखा। उसने ताज़ी सब्ज़ियों से भरी गाड़ी को देखकर किसान की तारीफ़ की और पूछा कि इतनी सारी फसल की कटाई में उसे कितना समय लगा। किसान ने जवाब दिया, “ज़्यादा नहीं।” कारोबारी ने पूछा, “तो फिर तुमने ज़्यादा देर तक कटाई क्यों नहीं की?” किसान ने उसे इसका कारण समझाते हुए कहा, “क्योंकि मेरे और मेरे परिवार के लिए यह काफ़ी है।” कारोबारी ने पूछा, “तो फिर तुम अपने बाक़ी समय में क्या करते हो?” किसान ने कहा, “मैं काफ़ी देर तक सोता हूँ, कुछ समय खेत में हल चलाता हूँ, फिर मैं अपने बच्चों के साथ खेलता हूँ, बंदगी करता हूँ और पत्नी के साथ समय बिताता हूँ। शाम को मैं गाँव में दोस्तों से मिलने चला जाता हूँ, अच्छा खाना खाता हूँ और संगीत बजाता हूँ। मैं जीवन का भरपूर आनंद ले रहा हूँ।” यह सुनकर कारोबारी हैरान रह गया। उसने कहा, “मेरे पास एम. बी. ए. की डिग्री है और मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। तुम्हें खेती-बाड़ी में अधिक समय बिताना चाहिए, फिर तुम अतिरिक्त फ़सल बेच सकते हो, अधिक पैसा कमा सकते हो और एक बड़ा खेत ख़रीद सकते हो।” “और उसके बाद?” किसान ने पूछा।
“बड़े खेत से मिलने वाले अतिरिक्त पैसे से, तुम और खेत ख़रीद सकते हो और अंतत: उन्हें सँभालने के लिए और लोगों को काम पर रख सकते हो। अपनी फ़सल को बिचौलियों को बेचने के बजाय, तुम सीधे सुपरमार्केट के साथ सौदा कर सकते हो। कुछ समय बाद तुम ख़ुद का फ्लैगशिप स्टोर खोलने के क़ाबिल हो जाओगे। फिर तुम इस गाँव को छोड़कर शहर जा सकते हो और अंतत: पूरी कंपनी को चला सकते हो।” “इस सबमें कितना समय लगेगा?” किसान ने पूछा।
“बीस से पच्चीस साल।” “और उसके बाद?” “मेरे दोस्त, असली मज़ा तो तभी शुरू होता है। जब कारोबार वास्तव में बड़ा हो जाता है, तुम अपनी कंपनी को शेयर बाज़ार में दर्ज करवाकर लाखों रुपये कमा सकते हो!”
“वाह, लाखों-करोड़ों! उसके बाद क्या होगा?” किसान ने पूछा। “उसके बाद तुम किसी गाँव में एक आरामदायक रिटायर्ड जीवन बिता सकते हो, हर दिन देर तक सो सकते हो, थोड़ी खेती कर सकते हो, अपने पोते-पोतियों के साथ खेल सकते हो, बंदगी को समय दे सकते हो और पत्नी के साथ वक़्त गुज़ार सकते हो। शाम को तुम बाहर खाने पर जा सकते हो और अपने दोस्तों के साथ गीत गा सकते हो।” इस पर किसान ने उत्तर दिया, “यह तो बिलकुल मेरी मौजूदा ज़िंदगी जैसा ही है!” और वह वहाँ से चला गया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि इनसान की मानसिक स्थिति और जीवन के प्रति उसका नज़रिया उसके द्वारा कमाए धन और उसे मिली सफलता से ज़्यादा मायने रखता है। परमात्मा ने हमें मनुष्य-जन्म का उपहार दिया है। यक़ीनन, हमें इस अनमोल उपहार के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए। इसके अलावा, संतुलित जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने हमें दिन में पर्याप्त समय दिया है जिसमें हम न सिर्फ़ अपने निजी कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकते हैं बल्कि परमात्मा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भी निभा सकते हैं यानी कि अपना भजन-सिमरन कर सकते हैं।
जिसे यह एहसास हो जाता है कि जो कुछ उसे मिला है, पर्याप्त है, उसे कभी कमी महसूस नहीं होती।
ताओ ते चिंग, लिविंग मेडिटेशन से उद्धरित
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दुनिया में संतुलन बनाए रखने के लिए आपको चाहिए कि अपना ध्यान तीसरे तिल पर टिकाए रखें। अगर आप ऐसा करेंगे और अंतर में नाम से जुड़े रहेंगे, तो आप दुनिया में अपना संतुलन बनाए रखने के क़ाबिल बन सकेंगे। आप अपने दुनियावी फ़र्ज़ भी निभाते रहेंगे और अपने उस मक़सद को भी पूरा कर सकेंगे जिसके लिए आपको यह मनुष्य-जन्म बख़्शा गया है। संतुलन बनाए रखने का यही मतलब है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3