सरल रखना
एक चीनी लोककथा है जिसमें एक अधिकारी ने अपने कर्मचारियों को पेय से भरी एक सुराही दी। लेकिन उसमें मौजूद पेय केवल एक ही व्यक्ति के लिए पर्याप्त था, इसलिए कर्मचारियों ने उस पेय के लिए एक प्रतियोगिता करने का फ़ैसला लिया जिसके लिए सब सहमत हो गए। प्रतियोगिता यह थी कि जो व्यक्ति सबसे कम समय में साँप का चित्र बना लेगा, वही विजेता होगा।
प्रतियोगिता शुरू हुई और कुछ ही सेकंड में एक आदमी ने चित्र बना लिया। यह देखकर कि अन्य लोग अभी भी चित्र बना रहे हैं, उस समय अपनी जीत की घोषणा करने के बजाय उसने अपने चित्र को और ज़्यादा सुंदर बनाने का फ़ैसला किया।
जब उसने दोबारा नज़र उठाकर देखा तब उसे पता चला कि किसी और ने पहले ही अपना चित्र पूरा करके दे दिया है और उसे विजेता घोषित कर दिया गया है। उसी समय, उसका एक अन्य साथी कर्मचारी ज़ोर से हँस पड़ा और उसके बनाए चित्र को ऊपर उठाकर कहने लगा, “ज़रा देखो तो सही! पैरों वाला साँप!”
हमें इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कई बार सिर्फ़ उतना ही करना काफ़ी होता है, जितना किसी कार्य के लिए ज़रूरी है। दूसरे शब्दों में, चीज़ों को सरल रखना चाहिए। उस व्यक्ति को सिर्फ़ एक साँप का चित्र बनाना था और पेय से भरी उस सुराही को जीतना था। लेकिन शायद वह भटक गया था या ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास और उत्सुकता के कारण उसने सोचा कि वह इसे बेहतर बना सकता है इसलिए वह चित्र पर थोड़ी और कलाकारी करने लग गया। अंतत: उसने पैरों वाला साँप बना दिया। इसलिए वह पेय को जीत न सका और हँसी का पात्र बन गया।
कार्यों को सरल रखना हमारी सोच से कहीं अधिक मुश्किल है। पानी पीने जैसे एक सरल-से काम में इस वजह से देरी हो सकती है क्योंकि हम अपने पसंदीदा गिलास, बोतल या जग को ढूँढ़ने लगते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी कार्य को बेहतर ढंग से करने के लिए अधिक ध्यान देने, सोच-विचार करने या मेहनत की ज़रूरत ही नहीं होती। बात बस इतनी-सी है कि हमें हर काम को करने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा सोचने और विश्लेषण करने की इतनी आदत पड़ गई है कि हम छोटे-छोटे, सरल-से कार्यों को भी ज़रूरत से ज़्यादा जटिल बना देते हैं। इसी तरह, कंप्यूटर पर काम करते हुए हम संदेशों और सूचनाओं को देखने के लिए बार-बार अपना फ़ोन उठाते रहते हैं। हमें पता ही नहीं चलता कि कब ये आदतें हमें हमारे असल काम से भटका देती हैं।
संतमत में सतगुरु ने हमें सिमरन करने का सरल-सा कार्य सौंपा है – बस परमात्मा के पाँच नाम को सच्चे दिल से निरंतर दोहराते रहना। महाराष्ट्र के संत चोखामेला इस बारे में समझाते हैं:
शांतचित्त हो तन-मन से, मैं ध्यान करूँगा तेरा।
सत नाम का जाप सार है, सब कर्मों का नाश करे।
पल-पल हरि नाम का जाप, यही मुक्ति का साधन एक।
इस मंत्र का जाप सहज ही, पल में तारे पार उतारे।
चोखा कहे
हैं गुरु के वचन यह, सदा करो प्रभु नाम का जाप।
स्वर अनेक, गीत एक
हालाँकि, जब हम सिमरन करते हैं तब भी हमारे मन में तरह-तरह के विचार उठते रहते हैं, हमारी आँखें फड़कती हैं, हमारी नाक में खुजली होती है, हमारे पैरों में झुनझुनी होने लगती है और हमारी सुनने की शक्ति इतनी तेज़ हो जाती है कि हमें गली से आने वाली छोटी से छोटी आवाज़ भी सुनाई देने लगती है। सिर्फ़ इतना ही नहीं तीसरे तिल पर अपने ख़याल को एकाग्र करने के लिए बहुत ज़्यादा यत्न करने के बावजूद जब हमें अंदर प्रकाश या ध्वनि का अनुभव नहीं होता तब हम निराश हो जाते हैं। यही वह समय होता है जब हम ध्यान के भटकने या ज़रूरत से ज़्यादा सोचने के कारण चीनी लोककथा के उस व्यक्ति की तरह ‘साँप के पैर’ बनाने लगते हैं। हम अपने भजन-सिमरन का समय और स्थान बदलते रहते हैं, अपना आसन बदलते रहते हैं, ऐसे तरीक़े खोजते रहते हैं जिनसे सिमरन में मदद मिल सके और हमें हर समय इस बात की चिंता लगी रहती है कि हमने कितनी रूहानी तरक़्की कर ली है।
हमारा सरल-सा कर्तव्य है – अपनी आँखें बंद करके प्रेमपूर्वक अपना सिमरन करते जाना। ‘लिविंग मेडिटेशन’ पुस्तक के लेखक हेक्टर एस्पॉण्डा डबिन लिखते हैं: “सिमरन करने में ही आनंद है। सिमरन द्वारा प्राप्त हुई एकाग्रता सहज आनंद देती है। हमें पहले मन को सिमरन में स्थिर करना चाहिए और कृतज्ञता तथा दीनता के साथ अभ्यास का आनंद लेते हुए इसे सिमरन में लगाए रखना चाहिए।” बाक़ी सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।
आइए, हम इसे बिलकुल सरल रखें। संत चोखामेला की वाणी से प्रेरणा लेकर सिर्फ़ एक कार्य करें – अपने ध्यान को सिमरन द्वारा एकाग्र करके परमात्मा और सतगुरु को अंग-संग महसूस करते हुए चुपचाप दृढ़ता से पाँच नाम का सिमरन करते रहें। हुक्म मानने का यह सरल-सा कार्य अपने आप में ही एक रूहानी प्राप्ति है।