अंतर्मुख होना
सबसे मुश्किल कामों में से एक है बुरे कर्म करने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना। हमें अपने हर विचार, शब्द और कर्म को लेकर सतर्क रहना चाहिए क्योंकि हमने निर्मल नैतिक जीवन जीने का संकल्प लिया है। लेकिन हम आसानी से डगमगा जाते हैं और सच के रास्ते पर चलते रहना मुश्किल हो जाता है, ख़ासकर तब जब हमें नेकी का सिला नेकी से नहीं मिलता या मुश्किल हालात हमारा इम्तिहान लेते हैं। फलस्वरूप, कर्म के नियम के मुताबिक़ हम अपने अच्छे और बुरे दोनों तरह के कर्मों का हिसाब देने के लिए जन्म-मरण के इस चक्र में फँसे रहते हैं। हम अकसर देखते हैं कि सजग रहने के बावजूद पुण्यों के बजाय हमारे पापों का पलड़ा अकसर भारी रहता है। अपने कर्मों का भुगतान देते हुए हम कई बार व्याकुल और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ख़ुशक़िस्मती से हमारे पास एक ऐसा सहारा है जिससे हम मदद ले सकते हैं।
अगर बच्चा ग़लती करता है, शरारत करता है, कानून को भी तोड़ता है, तब भी बाप कभी उसे पुलिस के हवाले नहीं करता। बाप कभी नहीं चाहता कि बच्चा जेल जाए, पर वह यह तो चाहता ही है कि बच्चा सुधर जाए। इसलिए चाहे वह उसे पुलिस के हवाले न भी करे, जेल न भिजवाए, पर सज़ा ज़रूर देता है। इसका यह मतलब नहीं कि अगर हम भजन-सिमरन नहीं करते, फिर भी हमें स्वीकार कर लिया जाएगा और वापस ले जाया जाएगा। हमें सज़ा तो भुगतनी पड़ती है। कई बार बाप की सज़ा पुलिस की सज़ा से भी ज़्यादा कड़ी हो सकती है, पर उसके पीछे सुधार के इरादे के साथ-साथ प्यार भी होता है, बदले की भावना नहीं होती। बाप चाहता है कि बेटा सुधर जाए और एक बेहतर इनसान बने, पर वह अपने बेटे को पुलिस या जेल के अफ़सरों के हवाले नहीं करेगा।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
देहधारी सतगुरु की शरण में जाने का अर्थ है कि हम अपने कर्मों के भुगतान की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप देते हैं। अंग्रेज़ी भाषा में छपी पुस्तक ‘जप जी’ की शब्दावली हमारे कर्मों के निपटारे में सतगुरु की भूमिका पर प्रकाश डालती है:
जिस जीवात्मा को पूर्ण सतगुरु से नामदान मिल जाता है फिर उसके कर्मों का लेखा-जोखा धर्मराय के पास नहीं रहता क्योंकि सतगुरु ख़ुद उसके कर्मों के निपटारे की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं, वह न्याय नहीं, दया-मेहर करके अपने शिष्य को बख़्श लेते हैं। धरम राए दर कागद फारे जन नानक लेखा समझा॥
गुरु रामदास जी, संत-मार्ग से उद्धरित
इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि सतगुरु हमारे कर्मों को एकदम निपटा देते हैं। वे निष्पक्षता और सूझ-बूझ के साथ हमारे कर्मों का निपटारा करते हैं और साथ ही अपनी दया-मेहर के ज़रिए हमारे सख़्त कर्मों के प्रभाव को भी कम करते हैं। हम अकसर सुनते हैं कि सतगुरु कुम्हार की तरह होते हैं। कुम्हार मिट्टी को आकार देने के लिए उसे ज़ोर से थपथपाता है। वह बाहर से चोट मारता है जबकि उसका दूसरा हाथ मिट्टी को सही आकार देने के लिए अंदर से मज़बूती से सहारा देता है।
दिलचस्प बात यह है कि ‘टेम्परिंग’ का एक और अर्थ भी है जो मिश्रित धातु (alloys) जैसे कि स्टील या लोहे पर इस्तेमाल होने वाली तपाने की तकनीक से जुड़ा है ताकि धातु के कड़ेपन को कम करके उसे ज़्यादा लचीला बनाया जा सके। तपाने की इस प्रक्रिया से मिश्रित धातु का भुरभुरापन कम हो जाता है और वह अधिक लचीली बन जाती है मगर उसकी मज़बूती में कोई कमी नहीं आती।
नामदान के बाद जब सतगुरु हमारे कर्मों के निपटारे की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं तब हमारे साथ भी यही होता है। वह निज-घर लौटने में हमारी मदद करने की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं। वह हमें अपना प्रेम, सहारा और दया-मेहर प्रदान करते हैं ताकि हम संतुलन खोए बिना साहस के साथ अपने कर्मों का भुगतान कर सकें। उनके द्वारा तपाने वाली इस प्रक्रिया (अनुशासन) से गुज़रने के लायक़ बनने के लिए, और ज़्यादा शक्ति, मज़बूती तथा साहस प्राप्त करने के लिए, अपनी सुरत को अपने अंदर गूँज रही नाम या शब्द की दिव्य ध्वनि के साथ जोड़ने के लिए ही हम भजन-सिमरन करते हैं।
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी भजन-सिमरन की शक्ति को बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
नाम की कमाई का थोड़ा-सा, ज़रा-सा अंश हमारे लाखों-करोड़ों कर्मों को भस्म कर सकता है। हम वाक़ई इन कर्मों का नाश करके इनसे ऊपर उठ जाते हैं और इस तरह नए कर्म भी जमा नहीं होते।….जब नाम और शब्द की कमाई से हमारा मन अपने ठिकाने पर पहुँच जाता है, तो ये नष्ट हो जाते हैं। छुरी पर चाहे कितना ही जंग लगा हो, जब आप उस छुरी को सान पर रगड़ते हैं तो सारा जंग उतर जाता है। वह एक नई छुरी की तरह फिर से चमकने लगती है। वह बिलकुल साफ़ हो जाती है।
संत संवाद, भाग 2
संत-महात्मा अकसर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भजन-सिमरन हमें अपना संतुलन खोए बिना प्रारब्ध का भुगतान करने की ताक़त देता है। जीवन में जैसी भी परिस्थितियाँ आती हैं भजन-सिमरन हमें उन्हें स्वीकार करना सिखाता है। जीवन में बहुत-से ऐसे सवाल और बहुत-सी ऐसी समस्याएँ हैं जिनका कोई समाधान नजर नहीं आता लेकिन भजन-सिमरन की मदद से हम उनसे ऊपर उठ सकते हैं।
हम भजन-सिमरन द्वारा अपने ध्यान को अंतर्मुख करके अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं। हम अपने आप को बिना किसी शर्त सतगुरु के हवाले कर देते हैं और वह जिस प्रकार भी हमारे कर्मों का निपटारा करते हैं हम ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेते हैं। तब हमें इस बात की तसल्ली होती है कि हमारा निज-घर वापसी का सफ़र उनकी योजना के अनुसार और उनके हिसाब से तय हो रहा है। इसके अलावा, हम इस बात के लिए शुक्रगुज़ार होते हैं कि उन्होंने हमें जैसे हम हैं, वैसे ही स्वीकार कर लिया है और हम पर नामदान की बख़्शिश कर दी है।
हे प्रभु, यदि आप सहारा न बनें तो कोई निर्मल नहीं हो सकता। यदि आप मार्गदर्शन न करें तो बुद्धि काम नहीं कर सकती। यदि आप रक्षा करना बंद कर दें तो हमारे अंदर कोई हिम्मत क़ायम नहीं रह सकती। यदि आप हमें बुराई से न बचाएँ तो हम निर्मल नहीं बन सकते। हमारी अपनी कोई भी सावधानी हमें बचा नहीं सकती, जब तक कि आप हमारी रक्षा नहीं करते; क्योंकि यदि आप हमें छोड़ दें, तो हम डूब जाएँगे और तबाह हो जाएँगे। लेकिन यदि आप हमारे अंग-संग रहें तो हम फिर से उठकर खड़े हो जाएँगे और एक बार फिर से जी उठेंगे।
थॉमस ए केम्पिस, द इमिटेशन ऑफ़ क्राइस्ट