प्यार की भावना
अनमोल ख़ज़ाना में से एक अंश
सेवा और उसके फल के संबंध में शाम की मीटिंग में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए महाराज जी ने कहा, “प्रेमी कभी माँगता नहीं, प्रेमी कभी हिसाब-किताब नहीं करता।”
पुरानी बातें याद करते हुए महाराज जी ने कहा, “मुझे डेरे आए पैंतीस वर्ष से ज़्यादा हो गए हैं और इस दौरान मुझे कई अनुभव हुए हैं। संगत की भावनाएँ, संगत के प्रेम का वर्णन मैं कर ही नहीं सकता।” महाराज जी की आवाज़ प्रेम और सराहना की भावना से ओत-प्रोत थी।
“सन् 1955 में लंगर-घर बहुत छोटा था। उसका सिर्फ़ एक छोटा-सा दरवाज़ा था और बड़े महाराज जी के जन्मदिन के भंडारे पर दो लाख के क़रीब सत्संगी आ जाते थे। इतने लोगों को खाना खिलाने में रात के दो बज जाते थे। यह देखकर रात को मैं अपने सोने के कमरे में बेचैन रहता और सोचता कि बड़े महाराज जी की याद में आई हुई संगत की बराबर देखभाल करने के लिए क्या किया जाए।”
“इस समस्या पर ट्रस्ट की वार्षिक सभा में चर्चा हुई और श्री आहलूवालिया ने जो उस समय सेक्रेटरी थे, सुझाव रखा कि सारे भंडारों को बंद कर दिया जाए ताकि एक समय में इतनी भीड़ इकट्ठी ही न हो। श्री आहलूवालिया ने कहा, ‘संगत जब आना चाहे तब आए; इससे समस्या हल हो जाएगी, क्योंकि तब भंडारे के समय जैसी भीड़ होगी ही नहीं।’” महाराज जी ने बताया कि इस चर्चा के दौरान वह ख़ामोश रहे।
आप ने बाद में फ़रमाया, “सेक्रेटरी के भंडारे बंद करने के प्रस्ताव की ख़बर संगत को लग गई। अगले दिन सत्संगियों ने श्री आहलूवालिया को उनके घर के पास घेर लिया और कहा, ‘क्या हमने कभी किसी बात की शिकायत की है? क्या हमने कभी भी शिकायत की है कि हमें खाना समय पर नहीं मिला? सोने के लिए जगह न मिलने के बारे में कभी कुछ कहा है? हम तो बहुत ख़ुश हैं। जब हमें कोई शिकायत नहीं तो आप क्यों भंडारे बंद करने का सुझाव दे रहे हैं? आप हमें दर्शन और सत्संग से क्यों वंचित करना चाहते हैं?’
“अगले दिन श्री आहलूवालिया मेरे पास आए और बोले, ‘मुझे अफ़सोस है कि मैंने भंडारे बंद करने का प्रस्ताव मीटिंग में रखा, मैं वह प्रस्ताव वापस लेता हूँ।’
“मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘मुझे ख़ुशी है कि आपको इस बात का एहसास हो गया है।’”
कुछ समय ख़ामोश रहने के बाद महाराज जी बोले, “संगत को किसी असुविधा से फ़र्क़ नहीं पड़ता। लोग कच्चे फ़र्श पर सो जाएँगे, बारिश में खुले में सो जाएँगे, पर यहाँ आना कभी बंद नहीं करेंगे। बाबा जी ने इस डेरे की नींव प्रेम और सेवा पर रखी है। मैंने इस प्रेम को लगातार बढ़ते देखा है और अब भी यह बढ़ता ही जा रहा है।
“मंड (जहाँ नदी बहा करती थी) को ही देखो। यह जगह जंगली झाड़ियों, ठूँठों और लंबी घास से भरी हुई थी और यहाँ केवल दलदल था, ऊँची-नीची ज़मीन थी। संगत उन ठूँठों और लंबी घास को लंगर में ईंधन के लिए काटती थी। आज संगत ने इस जगह को समतल भूमि में बदल दिया है और अब यहाँ खेत, सड़कें और पेड़ हैं।
“आज जहाँ लंगर-घर है वहाँ किसी समय गहरे खड्ड थे। संगत ने उन्हें भरकर बराबर कर दिया है। आज जहाँ लंगर का बड़ा शैड है और मैदान है जहाँ बड़े-बड़े पेड़ लगे हुए हैं, वहाँ एक बड़ा गहरा नाला था और जहाँ आज बड़ा मल्टी-परपज़ शैड है, वहाँ भी किसी समय नाला बहता था। संगत ने इन सबको पाँच-छ: फुट मिट्टी से भरकर समतल कर दिया है। यह है सेवा। उस समय आपने डेरा देखा होता तो आप यह सब समझ पाते।…
“संगत यह सारी सेवा किसी पुरस्कार या फल की उम्मीद से नहीं करती। वह तो प्रेम से प्रेरित होकर करती है। सेवा प्रेम है; संगत बदले में कभी कुछ नहीं माँगती और उसे चाहे जो असुविधा हो, वह कभी कोई शिकायत नहीं करती। वह हमेशा संतुष्ट रहती है, हमेशा सेवा करने में ख़ुशी महसूस करती है।”
यह प्रेम की वह शक्ति है जिसके बीज स्वयं सतगुरु बोते हैं और जिसका पोषण संगत करती है। विश्व में इस प्रेम के तुल्य और कोई शक्ति नहीं है।
***
जो वह वचन करें, उसको चित्त में रख लो, उसी पर चलो। चाहे घास खोदने का वचन करें तो वही परम पद है जी। उसे दिल में मीठा मानो। अपने मन की ऐसी परख करो, फिर काम पूरा है।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1