निराशा
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या
पता करने पर मुझे मालूम हुआ कि आप बहुत मायूसी का अनुभव कर रहे हैं। इस मायूसी की वजह एकाग्रता की कमी और दु:ख है। आप जानते हैं कि हम सत्संगी इसलिए बनते हैं कि हम परमार्थ की दौलत पाकर दुनिया और इसके पदार्थों को महत्त्व न दें, सिर्फ़ अपनी ज़रूरत के अनुसार इनका इस्तेमाल करें। हमें संतोष और कृतज्ञता के साथ सभी दुनियावी चोटों, दु:खों, ख़ुशियों, तंदुरुस्ती, बीमारियों और कष्टों और जो कुछ भी हमारी राह में आए, उसको सहन करना चाहिए। बल्कि अभ्यासी का बर्ताव तो ऐसा होना चाहिए कि अगर उसे सारी दुनिया का राज मिल जाए, तो भी बहुत ख़ुश न हो और उस राज के वापस ले लिए जाने पर ज़रा भी उदास न हो।
अभ्यासी को इस दुनिया के सागर में दु:ख और सुख, आदर और निरादर, ख़ुशी और ग़म के भँवरों में से होकर निकलना होगा। अगर अभ्यासी डरपोक और कमज़ोर है तो वह सफल नहीं होगा। उसे रूहानी अभ्यास द्वारा अपने दिल को मज़बूत करना चाहिए और साहस और धैर्य के साथ ज़िंदगी के हालात का मुक़ाबला करना चाहिए। यह समझते हुए कि सभी कार्यों के पीछे मालिक का हाथ है, उसे मालिक की मौज में ख़ुश रहना चाहिए। इसलिए मायूस न होइए। दिल में धैर्य और संतोष रखिए और अपने दुनियावी फ़र्ज़ अदा करते जाएँ। सभी चिंताओं को भूल जाएँ और अपने रोज़ के काम करते जाएँ।
मालिक की ओर से जो कुछ भी हमारी ज़िंदगी में आता है, वह हमारे पिछले कर्मों का नतीजा होता है और उनका भुगतान सिर्फ़ हमारे फ़ायदे के लिए ही कराया जाता है। कई बार उसे सहन करना ज़रा मुश्किल हो जाता है, फिर भी मालिक की मौज में रहने की कोशिश करनी चाहिए। अगर अभ्यासी दुनियावी घटनाओं से विचलित हो जाता है और अपनी एकाग्रता खो देता है और सुख-दु:ख का अनुभव करता है, तो इससे यह साफ़ ज़ाहिर है कि सत्संग का अभी उस पर असर नहीं हुआ है। हिम्म्त रखिए, मन को मज़बूत कीजिए और ऊँचा उठाइए तथा अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक करते जाएँ।
परमार्थी पत्र, भाग 2