दिल से दिल की बात
एक बार स्वामी जी महाराज ने दो-तीन दिन के लिए अपनी कोठरी में एकांत में बैठकर भजन करने का निश्चय किया। आपने हुक्म दिया कि जब तक मैं ख़ुद दरवाज़ा न खोलूँ तब तक कोई भी मेरे पास न आए। आपने द्वार अंदर से बंद कर लिए और भजन में बैठ गए। अगले दिन बाबा जैमल सिंह जी तीन दिन की छुट्टी पर दर्शन के लिए आगरा पहुँचे। उनका नियम था कि वह जब भी आगरा आते तो स्वामी जी महाराज के दर्शन किए बिना, उन्हें माथा टेके बिना कोई भी कार्य नहीं किया करते थे। पन्नी गली पहुँचने पर सेवादारों से स्वामी जी महाराज के हुक्म का पता चला। बाबा जी बग़ैर कुछ कहे और बिना खाए-पीए दो दिन भजन-सिमरन में बैठे रहे। तीसरे दिन कुछ सत्संगियों ने बाबा जी से कहा कि आओ, सीढ़ी लगाकर रोशनदान से दर्शन कर लो। बाबा जी की छुट्टी उस दिन ख़त्म होनेवाली थी। लेकिन बाबा जी ने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि गुरु के हुक्म से कभी बाहर नहीं जाना चाहिए। थोड़ी देर बाद स्वामी जी महाराज कोठरी से बाहर आए और बाबा जैमल सिंह जी की गुरुमुखता तथा गुरु-भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया। फिर सतगुरु दीनदयाल ने बाबा जी को प्रसाद दिया और उन्हें समय पर विदा कर दिया ताकि वह झांसी जानेवाली गाड़ी पकड़ सकें।
धरती पर स्वर्ग
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एक बार महाराज जी ने बताया कि जब डेरे में सत्संग-घर बनाया जा रहा था, तब दिल्ली के एक बहुत अमीर और मशहूर ठेकेदार सरदार नारायण सिंह ने, जो बड़े महाराज जी के प्रेमी सत्संगी थे, विनती की कि पूरा सत्संग-घर बनाने की सेवा उन्हें दी जाए। पर बड़े महाराज जी ने इस प्रार्थना को अस्वीकार करते हुए जवाब दिया, “मैं चाहता हूँ कि ग़रीब से ग़रीब सत्संगी को भी सत्संग-घर की सेवा का मौक़ा मिले, चाहे वह सिर्फ़ एक रुपया डाले या आठ आने। मैं चाहता हूँ कि हर सत्संगी, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, जवान हो या बूढ़ा, सत्संग-घर के निर्माण की सेवा में हाथ बँटाए; चाहे वह केवल मुट्ठी-भर मिट्टी या ईंट के कुछ टुकड़े ही उठाए। संगत की छोटी से छोटी सेवा मेरे लिए क़ीमती है, सेवा में बही उनके पसीने की हर बूँद अनमोल है क्योंकि यह प्रेम की सेवा है, भक्ति और समर्पण की सेवा है।”
अनमोल ख़ज़ाना