विचार करने योग्य
सत्संगी को चाहिए कि वह सब परिस्थितियों का विश्वास और साहस के साथ सामना करे, हिम्मत न हारे और भजन-सिमरन में तो कभी भी लापरवाही न करे। अगर लापरवाही हो जाए तो उसे जितनी जल्दी दूर किया जा सके उतना ही अच्छा है। भजन-सिमरन में नियमित रहने से ऐसा विश्वास और बल मिलता है जिसे और किसी भी तरह से प्राप्त करना कठिन है। भजन से ही आपको यह भी पता चलेगा कि सतगुरु किस प्रकार हमारी सहायता और सँभाल कर रहे हैं।
महाराज चरन सिंह जी, सन्तमत दर्शन
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आपको ख़ुद मालिक ने दया-मेहर करके अपने निज-धाम का रास्ता दिया है और अनामी राधास्वामी का धाम, जो सबसे परे है, वह मिला है, इसलिए उसकी कमाई करो और प्रेम-प्यार पक्का रखो, भरोसा पक्का रखो कि एक दिन इसी देह में निज धाम पहुँचा देंगे। निज मन की लाग, सुरत और निरत लगाकर प्रेम-प्रीत से शब्द-धुन की आवाज़ को सुनो। पिंडी मन (स्थूल मन) की वासना को छोड़कर यह अभ्यास रोज़-रोज़ करो, चाहे थोड़ा ही करो। सबको यह ताकीद है कि भजन और सिमरन रोज़-रोज़ करना।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1
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दूसरों की मदद करना और निस्स्वार्थ होना निश्चित रूप से अच्छी बात है लेकिन ऐसे कार्यों को बँधन नहीं बना लेना चाहिए। हमें निर्लेप होकर दूसरों की मदद इस हद तक करनी चाहिए कि यह हमारे मन पर बोझ न बने। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ तथा अन्य कर्तव्य पूरे करते रहें, परंतु अंतर में जाने के अपने असल कार्य को न भूलें। दूसरे लफ़्ज़ों में, दुनियावी बंधनों में न फँसें। ऐसे मामलों में किसी भी काम की परख ख़ुद से यह सवाल पूछकर करनी चाहिए कि क्या यह काम मेरे भजन-सिमरन में बाधा तो नहीं बन रहा? यदि कोई काम भजन-सिमरन में बाधा डाले तो निस्संकोच उसे त्याग देना चाहिए।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, द साइंस ऑफ़ द सोल