अनुशासन
भजन-सिमरन करना खाइयाँ खोदने, अँगूरों के बाग़ में काम करने और किसी तालाब में से पानी निकालने जैसा धीमा और अनुशासन के साथ किया जाने वाला कार्य है। इसके लिए हर पल और जीवन-भर मेहनत करनी पड़ती है।
जॉन कबात-ज़िन, व्हेयरएवर यू गो, देयर यू आर
किसी भी ऊँचे लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे कार्य को करने के लिए प्रशिक्षण लेने से बहुत अधिक फ़ायदा होता है। यह उन ऊँचे लक्ष्यों को प्राप्त करने में हमारी मदद करता है।
ऐसे कार्य नीरस, उबाऊ और यहाँ तक कि कष्टदायी भी लग सकते हैं लेकिन लगातार अभ्यास करते रहने से वे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर उन्हें करना हमें उतना मुश्किल नहीं लगता। इसी प्रशिक्षण को अनुशासन कहा जाता है। यही अनुशासन हमारे छिपे हुए सर्वश्रेष्ठ गुणों को बाहर लाने, कुछ नया सीखने के इस सफ़र का आनंद लेने और अपनी मंज़िल तक पहुँचने का एकमात्र तरीक़ा है।
हम सभी जानते हैं कि यदि हम अपने खान-पान, पढ़ाई और काम करने की आदतों में अनुशासित होते तो हमारा वज़न कम होता, हम अधिक बुद्धिमान तथा शायद अधिक समृद्ध भी होते। हालाँकि, अनुशासन में रहना इतना आसान नहीं होता क्योंकि इसके लिए हमें ध्यान को भटकानेवाली चीज़ों और प्रलोभनों का डट कर सामना करना पड़ता है और अपने ‘कंफर्ट जोन’ को छोड़ना पड़ता है। इन सबसे बढ़कर, हमें इसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
हमारे व्यक्तित्व के दो पहलू होते हैं: एक, वह जो हम अभी हैं और दूसरा, वह जो हम बनना चाहते हैं। जब तक हम, जो हम बनना चाहते हैं उस दिशा में काम नहीं करते और निरंतर उस लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ते तब तक हम हमेशा निराश रहेंगे।
हममें से ज़्यादातर लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यदि हम नियमपूर्वक अपना भजन-सिमरन करते और इसी के अनुरूप जीवन-शैली को अपनाते तो हम इस मार्ग पर ज़्यादा ख़ुश रहते और ज़्यादा तरक़्क़ी करते। ऐसा नहीं है कि हम कभी अनुशासन में नहीं रहे; यक़ीनन हमने उस समय का भी आनंद लिया है जब हमने हिदायतों का पूरे अनुशासन के साथ पालन किया था – जब हमने हल्का-फुल्का भोजन किया, हम जल्दी सो गए, जल्दी उठ गए, हमने नियम से भजन-सिमरन किया, काम-काज पर गए यहाँ तक कि व्यायाम, परिवार और सेवा – हमने एक ही दिन में हर चीज़ को समय दिया था।
क्या हमें याद है कि हमने तब ख़ुद को कितना सशक्त महसूस किया जब हमने आलस्य और लापरवाही छोड़कर भजन-सिमरन किया था और “मेरा मन नहीं है” वाले रवैये के आगे घुटने न टेककर सतगुरु के साथ किए वायदे को पूरा किया था?
एक बार जब हम रोज़मर्रा के जीवन में अनुशासन का पालन करना छोड़ देते हैं तो फिर से शुरुआत करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन इस बात को याद रखने से मदद मिल सकती है कि जब हम एक बार फिर से वह पहला मुश्किल क़दम उठा लेते हैं तब बाक़ी सब आसानी से होने लग जाता है।
अनुशासन एक ऐसा गुण है जिसकी आदत डाली जा सकती है। जब हम कसरत करना शुरू करते हैं तब हमारी मांसपेशियों में दर्द होता है परंतु धीरे-धीरे वे मज़बूत हो जाती हैं और फिर सब आसान हो जाता है। यदि हम कुछ समय के लिए कसरत करना छोड़ दें तो यक़ीनन हमारी मांसपेशियाँ थोड़ी कमज़ोर हो जाती हैं लेकिन यदि हम फिर से कसरत करने लगें तो हमें नए सिरे से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी; अगली बार हम आसानी से वहीं से आगे बढ़ सकेंगे जहाँ हमने उसे छोड़ा था।
इस मार्ग पर चलनेवाले हर साधक के लिए अनुशासन एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गुण है। हमारी अंतरात्मा हमें लगातार उस कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है जो हमें करना चाहिए: खाद्य-पदार्थों के लेबल पर सामग्री-सूची को ध्यान से पढ़ना, गपशप में समय बर्बाद न करना, जल्दी सो जाना, भजन-सिमरन के लिए बैठना। अनुशासन का अर्थ है अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना और उस पर अमल करना। जैसे-जैसे हम इसकी नसीहत को मानते हैं और जो करना चाहिए, उसे करने में जुट जाते हैं, हमारा सफ़र न केवल आसान बल्कि आनंदमय भी होने लगता है।
संत-सतगुरु हमेशा समझाते हैं कि भजन-सिमरन छोड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, बात सिर्फ़ इतनी-सी है कि हमें हार नहीं माननी है। हमें कोशिश करते रहना है; हमें ख़ुद को अनुशासित करना है ताकि हम अपने असल सामर्थ्य को जान सकें और आख़िरकार एक दिन अपने हर प्रकार के संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त कर सकें।