वह जो मेरे हृदय को ख़ुशी से सराबोर कर देता है
यह प्रश्न अकसर पूछा जाता है कि पूर्ण सतगुरु की पहचान कैसे की जाए?
हमने संतमत के साहित्य में पढ़ा है और सत्संगों में सुना है कि कुछ ऐसे विशेष लक्षण हैं जिनसे सच्चे संत की पहचान की जा सकती है। वे जीवों की भलाई के लिए संसार में आते हैं और उन्हें शिष्यों की धन-दौलत की चाह नहीं होती, वे अपनी कमाई पर निर्वाह करते हैं और शब्द-मार्ग का उपदेश देते हैं। इन विशेष लक्षणों द्वारा हमें बौद्धिक स्तर पर विश्वास हो जाता है कि गुरु पूर्ण हैं क्योंकि किसी भी रूहानी मार्ग या सफ़र पर चलने से पहले बुद्धि का संतुष्ट होना ज़रूरी है। हालाँकि सूफ़ी फ़क़ीर मनेरी कहते हैं:
यह ठीक नहीं है कि एक नया खोजी ख़ुदा के बंदों को अपनी कमज़ोर बुद्धि के तराज़ू में तौले या अपनी सीमित दृष्टि से यह देखने की उम्मीद करे कि कौन ख़ुदा से रिश्ता जोड़कर उसके क़रीब आ गया है!
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2
फिर एक जिज्ञासु यह कैसे जान पाएगा कि उसने अपने सतगुरु को खोज लिया है?
क्योंकि सतगुरु शब्द का देहधारी रूप है और हम भी शब्द का ही अंश हैं, इसलिए जब हम सतगुरु से मिलते हैं तो उनके साथ अपनापन महसूस होता है। कभी ऐसा लगता है कि हम पहले ही सतगुरु से मिल चुके हैं और कभी ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा से ही सतगुरु को जानते हैं। वास्तव में उच्च आध्यात्मिक स्तर पर हम सतगुरु का ही रूप हैं। किसी दूसरे का हमारे साथ इतना गहरा रिश्ता या संबंध कैसे हो सकता है? सतगुरु हमारा ही असली रूप है। अंतर केवल इतना है कि देहधारी सतगुरु यह जानते हैं कि उनका असली स्वरूप शब्द है, जब कि हमें इस सच्चाई का ज्ञान नहीं है।
हउ जीवा नाम धिआए
सतगुरु या सच्चे संत वे हैं जिन्होंने अपने अंतर में परमात्मा की पहचान कर ली है। उनकी सुरत जाग्रत हो चुकी होती है और वे परमात्मा के प्रेम से भरपूर होते हैं। वे हमारे अंदर उस प्यार को जगाने के लिए आते हैं मगर हम अपने सीमित दायरे के कारण उस अथाह प्यार का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते।
एक अन्य सूफ़ी इब्न ख़फ़ीफ़ लिखते हैं कि (आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2 से उद्धरित) जिज्ञासु को ऐसे मुर्शिद की तलाश करनी चाहिए “जिसे देखकर ख़ुदा याद आ जाए, जिसका प्रभाव दिल को छू ले और जो लफ़्ज़ों के ज़रिए नहीं बल्कि अपनी करनी के ज़रिए आपको सलाह दे।”
हम नहीं जानते कि परमात्मा कैसा दिखता है और कैसा लगता है। मगर हम इतना जानते हैं कि जब हम अपने सतगुरु के साथ होते हैं तब हम कुछ ऐसा महसूस करते हैं जो इस संसार से परे होता है, कुछ ऐसा जो हमें अंदर तक छू जाता है और हमें एहसास दिलाता है कि हम निज-घर के नज़दीक हैं।
सतगुरु का उपदेश उनके निजी अनुभव पर आधारित होता है इसलिए उनमें हमें बौद्धिक तौर पर संतुष्ट करके हमारा विश्वास दृढ़ करने का सामर्थ्य होता है। इस तरह, हमें सहज ही समझ आ जाता है कि वह प्रेम की साकार मूरत हैं इसीलिए हम उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। सतगुरु हमें समझाते हैं कि हम सब शब्द का रूप हैं, हम सब परमात्मा रूपी महासागर की बूँदें हैं। लेकिन यह केवल तभी होता है जब हम सतगुरु के वुजूद में से निकलने वाली प्रेम, सुकून और मुक्ति की तरंगों को अनुभव करने लगते हैं फिर हम सचमुच परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास करना शुरू कर देते हैं। सूफ़ी शायर शिरीन मग़रिबी अपने सतगुरु के बारे में लिखते हैं:
एक दिलकश नज़र के ज़रिए,
आपकी आँखें मेरे जैसी हज़ारों थकी-हारी रूहों को
वक़्त के झमेलों से छुटकारा दिलाने का वादा करती हैं।
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2
जब हम अपने गुरु के सामने होते हैं तब हम परम आनंद के इस स्रोत से उतना ही ग्रहण कर पाते हैं जितना हम ग्रहण करने के क़ाबिल होते हैं।
सतगुरु की मौजूदगी में हर कोई एक जैसा महसूस नहीं करता; हर कोई समान कशिश के साथ सतगुरु की ओर खिंचा नहीं चला आता। लेकिन जिस आत्मा को अपने सतगुरु की पहचान हो जाती है, वह निश्चित रूप से उनकी ओर खिंची चली आती है, फिर चाहे उसमें तड़प कम हो या बहुत अधिक–कशिश और प्रेम सदा होगा। असल में, धर्मग्रंथों में यह कहा गया है कि आपको पूर्ण सतगुरु मिल गए हैं या नहीं इस बात को जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका यह है कि आपको उनकी मौजूदगी में ख़ुशी महसूस होती है या नहीं?
सतगुरु को खोजने के लिये ठोस तथ्यों और आँकड़ों या विश्वसनीय भाषणों और तर्कों की आवश्यकता नहीं है; ज़रूरी यह है कि हमें उनकी मौजूदगी में आंतरिक ख़ुशी महसूस हो।
असल में, सतगुरु ही हमारी तलाश करते हैं। हम सोचते हैं कि सतगुरु की खोज करने के लिए हमारे पास थोड़ी-बहुत समझ है, लेकिन उनकी खोज करने और उनके साथ रहने की हमारी कोशिशें उतनी ही सीमित हैं जितना हमारे लिए उन्हें समझ पाना। सतगुरु हमें स्वयं अपनी ओर खींचते हैं; उन्हीं के प्यार की वजह से हम सुरक्षित महसूस करते हैं। उनकी मौजूदगी में हम जिस आनंद का अनुभव करते हैं, वह उस आनंद को और अधिक पाने के लिए प्रयास करने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं छोड़ते – इसी आनंद को वह ‘शब्द’ कहते हैं।