सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए चुनिंदा सवाल-जवाब
प्रश्न: अगर आपने भक्ति और भजन-सिमरन नहीं किया तो क्या फिर भी मृत्यु के समय सतगुरु आपको लेने के लिए आएँगे?
उत्तर: बहन जी, ईसा मसीह ने दो बातें कही हैं। वह फ़रमाते हैं कि जब तुम पुत्र को देखोगे और उस पर विश्वास करोगे तब मैं तुम्हें अंतिम दिन जीवित कर दूँगा। ‘पुत्र को देखने’ का अर्थ है कि तुम एक देहधारी सतगुरु की संगति में जाओ। ‘उस पर विश्वास करो’ का अर्थ है कि अगर तुम उनकी शिक्षाओं का ईमानदारी से पालन करते हो तो वह तुम्हें अंतिम दिन जीवित कर देंगे। यदि तुम उनके उपदेश का पालन नहीं करते, उनके अनुसार जीवन व्यतीत नहीं करते, तो फ़ैसला उनका है कि वह आएँ या न आएँ। लेकिन अगर हम उनके उपदेश के अनुसार जीवन बिताते हैं और उसका पालन करते हैं तो फिर हम दावा कर सकते हैं। वरना यह केवल उनकी बख़्शिश है।
लाइट ऑन सेंट जॉन
प्रश्न: महाराज जगत सिंह जी की पुस्तक ‘आत्म-ज्ञान’ में हमने पढ़ा था कि एक शिष्य द्वारा दूसरे शिष्य की निंदा करना बहुत बड़ा पाप है। जो दूसरों की निंदा करता है उसे इसका क्या परिणाम भोगना पड़ता है?
उत्तर: सभी संत हमें एक ही बात समझाते आये हैं। क्राइस्ट ने भी कहा है कि तुम्हें अपनी आँख का शहतीर तो दिखाई नहीं देता लेकिन दूसरे की आँख का तिनका भी दिखाई देता है। सरदार बहादुर महाराज जी के कहने का अभिप्राय था कि दूसरों की निंदा करने के बदले हमें अपनी निंदा करनी चाहिये कि हममें वह कौन-सी कमी है जिसके कारण हमारा किसी के साथ गुज़ारा नहीं होता। अगर कोई हमें सहयोग नहीं दे रहा तो इस बात के लिये उसकी निंदा करने के बजाय हमें ही दूसरों को सहयोग देना चाहिये। हमें परिस्थिति के अनुसार अपने आप को ढालना होगा, परिस्थिति हमारे मुताबिक़ नहीं ढल सकती। दूसरों से अच्छे व्यवहार की आशा करने के बजाय हमें ख़ुद दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये। हमारी दूसरों से हमेशा यही अपेक्षा रहती है कि वे हमारे साथ शालीनता से पेश आयें और उनका व्यवहार मित्रतापूर्ण तथा प्रेम से भरा हुआ हो। लेकिन हम यह नहीं समझते कि उस सबकी शुरुआत हमें ही करनी होगी। उनके कहने का यही अभिप्राय है कि अपने अंदर झाँके बिना और अपने दोष देखकर उन्हें सुधारने के बजाय, बेवजह किसी की निंदा करना पाप है। जीज़स क्राइस्ट का उपदेश, भाग 2, (सेंट मैथ्यू)
प्रश्न: क्या प्यार में आकर सतगुरु के पीछे-पीछे दौड़ना भी वैसे ही है जैसे कि अपने आंतरिक अनुभवों और अपनी प्रीति और भक्ति की भावनाओं को बाहर प्रकट करना?
उत्तर: देहस्वरूप सतगुरु के पीछे दौड़ने और सतगुरु से प्रेम करने में बहुत अंतर है। गुरु के पीछे-पीछे दौड़ने का मतलब यह नहीं कि आपको गुरु से प्यार है। संभव है कि आप अंदर प्यार से ख़ाली हों और फिर भी गुरु के पीछे दौड़ रहे हों। और यह भी हो सकता है कि आप सतगुरु के प्यार से भरे हुए हों और फिर भी अपने स्थान से इंच भर भी न हिलें। अगर आप अनुशासन में रहना पसंद करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपके अंदर प्रेम नहीं है। गुरु के पीछे दौड़ना कोई बहुत प्यार तो प्रकट नहीं करता।
सच्चा प्रेम हमेशा अंतर में होता है। जब आप प्यार का प्रदर्शन करने की कोशिश करते हैं तो उसकी गहराई खो देते हैं। आपको चाहिए कि उस प्रेम को अपने अंदर हज़म करें। बाहरी प्रदर्शन से उसकी गहराई ख़त्म हो जाती है।
जीवत मरिए भवजल तरिए
प्रश्न: महाराज जी, मुझे बताया गया है कि यदि कोई बहुत भारी शारीरिक परिश्रम करता है और बहुत थक जाता है तो उसके लिए शरीर से चेतना को समेटना ज़्यादा मुश्किल होता है।
उत्तर: मैं नहीं समझता कि शारीरिक कार्य या परिश्रम का और शरीर को ख़ाली करके ख़याल को ऊपर लाने का कोई आपसी संबंध है। असल में इनका कोई संबंध नहीं है। इंद्रियों के भोगों का मोह ही आँखों के पीछे एकाग्र होने में रुकावट डालता है। कठिन परिश्रम इसमें कोई अड़चन नहीं डालता, क्योंकि परिश्रम शरीर करता है, मन नहीं। क्या आपके ख़याल से ऐसे दुर्बल व्यक्ति, जो कोई शारीरिक कार्य नहीं करते, आसानी से अपने ख़याल को समेट लेते हैं?
जो लोग बहुत सख़्त मेहनत करते हैं, वे बहुत थक जाते हैं और उन्हें नींद पूरी किए बिना भजन के लिए बैठने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। शारीरिक परिश्रम करने या न करने से अंदर जाने में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
जीवत मरिए भवजल तरिए