ख़ुश रहें
जीवन के उतार-चढ़ाव के बावजूद ख़ुश रहना एक आदर्श रूहानी जीवन की पहचान है।
संतमत में हमारा मिलाप ऐसे सतगुरु से होता है जो हमें रूहानियत के सच्चे पहलुओं के बारे में बताते हैं। हमें शब्द-धुन या नाम के बारे में पता चलता है जिसे हम भजन-सिमरन द्वारा अनुभव कर सकते हैं। हमारे असल स्वरूप की खोज हमारे रहन-सहन में बदलाव से शुरू होती है जिसमें नामदान के समय दिए गए वचनों का पालन करना – शाकाहारी भोजन खाना, शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थों से परहेज़ करना और नैतिक जीवन जीना – शामिल है। जब नामदान की बख़्शिश होने पर हमें सतगुरु द्वारा सिखाई गई युक्ति के मुताबिक़ भजन-बंदगी करने का मौक़ा मिलता है तब वह इस रूहानी सफ़र में हमारे रहनुमा बनते हैं।
सतगुरु हमारा साथ कभी नहीं छोड़ते। हम जानते हैं कि वक़्त चाहे अच्छा हो या बुरा, सतगुरु हमेशा हमारे अंग-संग हैं और वह इस मार्ग पर हर क़दम पर हमारी मदद कर रहे हैं। हमें उनकी दी हुई दातों और नाम की बख़्शिश के लिए हरदम शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि निस्संदेह यह अनमोल ख़ज़ाना है।
मालिक हमें जैसे भी, जिन हालात में भी रखता है, हमें ख़ुश रहने की कोशिश करनी चाहिये। जो कुछ भी वह दे, हमें उसकी दया-मेहर समझकर ग्रहण करना चाहिये। इसी लिये हज़रत ईसा ने कहा था: तुम छोटे बच्चे की तरह बनो। आप उसे खेलने के लिये एक पत्थर भी देते हो तो भी वह ख़ुश हो जाता है और अगर आप उसे खेलने के लिये हीरा देते हो तो भी वह ख़ुश रहता है। वह पत्थर और हीरे में फ़र्क़ नहीं करता। इसलिये चाहे सर्द हवा चल रही हो या गरम, हमें भी ज़िंदगी की घटनाओं में फ़र्क़ नहीं करना चाहिये। जिस हाल में मालिक रखे हमें उसी में ख़ुश रहना चाहिये।
हमारा ऐसा नज़रिया तभी बन सकता है, जब हम नियमपूर्वक भजन-सिमरन करते हैं। केवल भजन-सिमरन के द्वारा ही हम अपने अंदर वह शांति क़ायम कर सकते हैं और फिर दूसरों के साथ भी वह सुख-शांति बाँट सकते हैं। आप किसी दु:खी इनसान के पास जाते हैं, तो वह आपको दो मिनट में दु:खी कर देगा। लेकिन अगर आप किसी ख़ुशमिज़ाज इनसान के पास जाते हैं, तो चाहे आप कितने भी दु:खी क्यों न हों, आप उसके पास से हँसते-मुस्कराते हुए वापस आयेंगे, क्योंकि हम दूसरों को वही देते हैं जो हमारे पास है, हम वही बाँटते हैं जो हमारे पास है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
हर बार जब हम भजन-बंदगी में बैठते हैं तब हमें दिव्य अमृत का आनंद लेने का मौक़ा मिलता है और यही वह शक्तिशाली साधन है जिसके ज़रिए हमारे अंदर बदलाव आता है और हम निर्मल होते हैं। हम पहले से कहीं बेहतर इनसान बन जाते हैं क्योंकि भजन-सिमरन से हमें अपने विकारों पर क़ाबू पाने की ताक़त मिलती है और जीवन के प्रति हमारा नज़रिया बदल जाता है। हम सचमुच ख़ुश रहने लगते हैं चाहे हमारे हालात कैसे भी क्यों न हों। इसके अलावा, महाराज चरन सिंह जी हमें याद दिलाते हैं कि यह दुनिया सिर्फ़ एक रंगमंच है जहाँ हम अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं:
अपने पार्ट को अच्छी तरह निभाकर हम ज़िंदगी की स्टेज पर अच्छे कलाकार बन सकते हैं। हमारे भाग्य में जो कुछ भी लिखा है उसे मालिक की मौज समझकर ख़ुशी-ख़ुशी मंजूर कर लेना चाहिये और आप यह तभी कर सकते हैं, जब आप नियमपूर्वक भजन-सिमरन करते हैं। कोई दूसरा तरीक़ा नहीं है। लेकिन हम अपने आप को उस रोल से जोड़ लेते हैं और इसे ही सच समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम केवल अपना रोल निभा रहे हैं। इसलिये हमें हमेशा यह बात याद रखनी चाहिये कि यह केवल ऐक्टिंग है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। हमें इस बात का एहसास ज़रूर होना चाहिये और यह केवल भजन-सिमरन से ही हो सकता है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है। नहीं तो हम नाटक के दूसरे पात्रों में उलझकर रह जाते हैं।
संत संवाद, भाग 3
यह दुनिया सिर्फ़ एक रंगमंच है जहाँ हम सब अपने प्रारब्ध के अनुसार मिली हुई भूमिका को निभा रहे हैं। यह सब एक भ्रम है इसलिए हमें अपनी भूमिकाओं में बहुत ज़्यादा नहीं खो जाना चाहिए क्योंकि इनमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर हम इस बात को ज़हन में रखें तो फिर हम चाहे कोई भी भूमिका निभाएँ, हम हमेशा उसमें ख़ुश रहते हैं। आख़िरकार, यह बस एक भूमिका ही तो है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। फिर हमें जो भी मिलता है, हम उसी में संतुष्ट रहते हैं। हमें अपनी और अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हमारे लिए मुश्किलें और समस्याएँ बढ़ जाती हैं जैसा कि नीचे दी गई कहानी में बताया गया है।
जंगल में एक कौआ रहता था और अपनी ज़िंदगी से पूरी तरह संतुष्ट था। लेकिन एक दिन उसने एक हंस को देखा। उसने सोचा, “यह हंस तो बहुत सफ़ेद है और मैं कितना काला हूँ। यह हंस दुनिया का सबसे ख़ुश पक्षी होगा।”
उसने जब हंस को अपने इस विचार के बारे में बताया। हंस ने जवाब दिया, “असल में, मुझे लग रहा था कि मैं सबसे ख़ुश पक्षी हूँ जब तक मैंने तोते को नहीं देखा था, जिसके दो रंग हैं। अब मुझे लगता है कि तोता ही इस संसार में सबसे ख़ुश पक्षी है।” फिर कौआ तोते के पास गया। तोते ने बताया, “मैं बहुत ख़ुशी-ख़ुशी जीवन जी रहा था, जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था। मैं तो सिर्फ़ दो रंग का हूँ लेकिन मोर के पास तो बहुत-से रंग हैं।”
फिर कौआ चिड़ियाघर में एक मोर के पास गया और उसने देखा कि मोर को देखने के लिए सैकड़ों लोग जमा थे। जब लोग चले गए तब कौआ मोर के पास आया।
कौए ने कहा, “प्रिय मोर, तुम कितने सुंदर हो। तुम्हें देखने के लिए हर रोज़ हज़ारों लोग आते हैं। जब लोग मुझे देखते हैं तब मुझे तुरंत भगा देते हैं। मुझे लगता है कि तुम दुनिया के सबसे ख़ुश पक्षी हो।”
मोर ने जवाब दिया, “मैं हमेशा सोचता था कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और ख़ुश पक्षी हूँ। लेकिन मेरी सुंदरता की वजह से मुझे इस चिड़ियाघर में बंद कर दिया गया है। मैंने चिड़ियाघर को बड़े ग़ौर से देखा है और मैंने पाया है कि कौआ ही एकमात्र ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में नहीं रखा गया है। इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं यह सोच रहा हूँ कि अगर मैं एक कौआ होता तो मैं ख़ुशी से हर जगह घूम सकता था।”
जब हम दूसरों के साथ बेवजह तुलना करने लगते हैं तब हम ख़ुद ही अपने दु:ख का कारण बन जाते हैं और परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया है, हम उसकी क़द्र नहीं कर पाते। इसी कारण दु:खों का कभी न समाप्त होनेवाला सिलसिला शुरू हो जाता है।
उन चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय, जो हमारे पास नहीं हैं, हम उन चीज़ों के साथ भी ख़ुश रह सकते हैं जो हमारे पास हैं। इस दुनिया में हमेशा कोई न कोई ऐसा ज़रूर होगा जिसके पास हमसे ज़्यादा या हमसे कम होगा।
दुनिया में जो व्यक्ति संतुष्ट रहता है, वही सबसे अधिक सुखी है। हमें इस जीवन में और रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए प्रसन्नचित्त और ख़ुश रहना चाहिए। हमें अपने असली मक़सद को कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमें इसी जन्म में वापस अपने रूहानी स्रोत में समाना है जैसे बूँद सागर में समा जाती है।
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संतोष क्या है? अपने प्रारब्ध को ख़ुशी-ख़ुशी भोगना, कोई इच्छा न रखना और परमात्मा के आगे किसी दुनियावी पदार्थ के लिये प्रार्थना न करना। हमें चाहिये कि वह जो भी दे उसी में ख़ुश रहें, जीवन में हमेशा संतुष्ट रहें, इस रचना में अपने जीवनरूपी नाटक को एक दर्शक की तरह देखते रहें यानी वह हमें जो कुछ भी दे, उसी में संतुष्ट रहें, दूसरे शब्दों में हम परमात्मा की रज़ा में रहें, यह भी संतोष है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3