सजग रहकर कर्त्तव्य निभाना
सिर्फ़ इसलिए कि हम बिना गैजेट्स, किताबों या कागज़ात के किसी कोने में चुपचाप बैठे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि भजन-बंदगी पूरे दिन की योजना बनाने, समस्याओं का हल खोजने, दिन में सपने देखने या फिर दिन-भर के कार्यों का जायज़ा लेने का समय है।
भजन-सिमरन के दौरान ऐसा महसूस हो सकता है कि हम कुछ ख़ास नहीं कर रहे लेकिन असल में हम अपने अंतर में सबसे गहन, महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी कार्य कर रहे होते हैं। दरअसल, यह कहा जा सकता है कि हम जितने भी काम करते हैं उनमें से यह सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है क्योंकि यह हमारे असल वुजूद – हमारी आत्मा – की बेहतरी के लिए है।
इसलिए इस कार्य को करने के लिए हमें दूसरे महत्त्वपूर्ण सांसारिक कार्यों की तुलना में बहुत अधिक सजग रहने और ध्यान देने की ज़रूरत पड़ती है। क्या हम अपनी भजन-बंदगी उतने ही ध्यान से करते हैं जितने ध्यान से हम चेक भरते हैं, दवाई खाते हैं, योजना बनाते हैं, किसी के बाल काटते हैं या खाना बनाते हैं?
क्या भजन-बंदगी में बैठने से पहले, हम ख़ुद को मानसिक रूप से उस कार्य के लिए तैयार करते हैं जो हम करनेवाले हैं या फिर हम पहले जिस काम में तल्लीनता से लगे थे उसे एकदम से छोड़कर बस एक कोने में बैठ जाते हैं? चूँकि भजन-बंदगी की विधि सरल है मगर इसका यह मतलब नहीं है कि यह वाकई आसान है। दिन के सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य को करने से पहले हमें ख़ुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए।
हमारा मन अकसर तरह-तरह के ख़यालों की वजह से भटक जाता है और भजन-बंदगी अपने ख़याल को बार-बार तीसरे तिल पर वापस लाने का अभ्यास है। मन ऑटो पायलट मोड पर काम करता है और जहाँ चाहता है, हमें ले जाता है। रूहानी अभ्यास के ज़रिए इस ऑटो पायलट मोड को बंद किया जा सकता है और मन की लग़ाम को अपने हाथों में लिया जा सकता है।
तिब्बती गुरु जमयांग ख्येंत्से द्वारा अपने शिष्य अपा पंत को दी गई निम्नलिखित हिदायत इस बात को स्पष्ट करती है:
“देखो, यह कुछ इस तरह है: जब पिछला विचार ख़त्म हो जाए और अगला विचार अभी तक उठा न हो तब क्या बीच में अंतराल नहीं आता?”
“जी” अपा पंत ने कहा।
“तो, उसे बढ़ाओ। वही भजन-बंदगी है।”
द टिबेटन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग
मन ने तो भटकना ही है और जब यह भटके तो बिना किसी आक्रोश के, हमें सिर्फ़ इतना समझ लेना चाहिए कि वह भटक गया है और उसे आराम से उसके ठिकाने पर वापस ले आना चाहिए। भजन-सिमरन के दौरान भले ही हमारा शरीर आरामदायक आसन में हो लेकिन हमारा मन पूरी तरह से सजग रहना चाहिए; इसे तीसरे तिल पर स्थिर करके निरंतर पाँच नाम का सिमरन करते रहना चाहिए।
अपने भजन-सिमरन को पूरी निष्ठा से करने के लिए हमें उस पल में पूरी तरह से मौजूद रहना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हम अपना सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं और इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं। जब हम भजन-सिमरन करते हैं तब हम अपना कर्त्तव्य सजग रहकर निभा रहे होते हैं – जैसे फ़ौजी सीमा पर तैनात रहते हुए चौकस, शस्त्रों से लैस और हमला करने के लिए तैयार रहते हैं। हम यक़ीनन रिज़र्व ड्यूटी पर नहीं होते जो किसी कार्य के लिए बुलाए जाने का इंतज़ार करते रहें या इस इंतज़ार में रहें कि हमारा ध्यान अपने आप केंद्रित हो जाए।
यह मन के साथ एक बहुत बड़ी लड़ाई है।…हमारा दुश्मन हम सब के अंदर ही है।…हम यह भी नहीं जानते कि वह कब हमें धोखा दे दे, कब हमारे साथ छल-कपट करके रास्ते से भटका दे।…इस तरह यह मन के साथ हमारा लगातार चलनेवाला संघर्ष है। हमें हमेशा चौकस रहना है और हर रोज़, हर पल इसकी गतिविधियों पर निगरानी रखनी है।…अगर हम संघर्ष करते रहेंगे, इसे जारी रखेंगे तो आख़िरकार जीत हमारी ही होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
भजन-सिमरन के दौरान, पूरी तरह से सजग रहकर हम अपने ध्यान को केंद्रित करने की क़ुदरती क़ाबिलीयत को विकसित कर रहे होते हैं। इस सजगता से हम इस लायक़ बन जाएँगे कि हमें अपने जीवन में सतगुरु की मौजूदगी का एहसास होगा; इससे हम अपनी कमियों और उन चीज़ों के प्रति सजग होंगे जिन पर ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सजगता जीवन की समस्याओं को लेकर हमारे नज़रिए को बदल देगी और हमें इस आरज़ी, मायामय संसार के बंधनों से ऊपर उठने में मदद करेगी। सचेत होकर किए गए भजन-सिमरन का हर पल मन को वश में करने के संघर्ष को जारी रखने और आख़िरकार सतगुरु के नूरी स्वरूप में समाने के क़ाबिल बनाता है।
तीसरे तिल में पहुँचना, तारा-मण्डल, सूर्य और चन्द्र को पार करना, गुरु के नूरी स्वरूप का दर्शन करना शिष्य का कर्तव्य है, चाहे वह इस ज़िन्दगी में पहुँचे या दूसरी ज़िन्दगी में। यह उसका काम है और उसे ही करना है, तो फिर क्यों न इसे अभी किया जाये, रोके क्यों रखा जाये?
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2