क्या आप जानते हैं?
जब मन में प्रेम के साथ सतगुरु याद आ गए, तो सब काम – परमार्थी और दुनिया के – अच्छे लगेंगे, मन में कोई तकलीफ़ नहीं होगी। आप जो व्यवहार के काम भी करेंगे, (उनका भी) परमार्थी फल होगा जी।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1
***
सन्तजन भूत, भविष्य और वर्तमान – तीनों का पूरा ज्ञान रखते हैं। आपको जब आन्तरिक अनुभव होगा, तो आप इनके बारे में जानने लगेंगे। ज्ञान का भण्डार आपके अन्दर है। शब्द-धुन ही भण्डार है, जो ज्ञान का स्रोत है। आपकी आत्मा शब्द-धुन के द्वारा जितनी चढ़ाई करेगी, उतना ही ज़्यादा ज्ञान प्राप्त करेगी। वह ज्ञान आपका अपना अनुभव होगा।
लेकिन इस ज्ञान को अपने या दूसरों के दुनियावी मामलों को सुलझाने में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसे केवल अन्दर की तरक़्क़ी के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। अगर कोई इनसान इस शक्ति का इस्तेमाल दुनियावी कामों के लिए करने लगता है, तो मन बहिर्मुखी होकर फैल जाता है। इसके कारण साधक की उन्नति में केवल बाधा ही नहीं आती, बल्कि उसकी अन्दर की चढ़ाई भी बन्द हो जाती है।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
***
जिसे आप कर्म का विधाता कहते हैं, यह सारा संसार उसी के वश में है। केवल पूरे सतगुरु तथा संत, जो अकालपुरुष प्रभु के प्रिय पुत्र होते हैं, इस बंधन से परे हैं। सतगुरु सदा समर्थ हैं और हर तरह के कर्मों को वश में कर सकते हैं, किंतु परमपिता की इच्छा के अनुसार ही वे ऐसा करते हैं। बाक़ी सारी सृष्टि कर्मों के क़ानून के अधीन है।
महाराज चरन सिंह जी, प्रकाश की खोज