निष्काम कर्म
निस्स्वार्थ सेवा संतमत की रूहानी शिक्षाओं का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। दरअसल, सभी आध्यात्मिक मार्ग अपने शिष्यों को किसी भी रूप में मानवता की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह सेवा पूरी तरह से स्वैच्छिक है और अपनी क्षमता के अनुसार की जा सकती है।
सभी महान व्यक्तियों ने अपने जीवन में इस सिद्धांत का पालन किया है कि ख़ुशी देने में है, लेने में नहीं। बिना किसी फल की इच्छा के, निस्स्वार्थ भाव से किसी दूसरे की सेवा करने को ही भगवद् गीता में निष्काम कर्म या इच्छारहित कर्म कहा गया है।
सतगुरु अकसर हमें बताते हैं कि संतमत में हर बात का एक समानांतर होता है। बाहरी सत्संग, सेवा, दर्शन – ये सभी आख़िर में हमें आंतरिक अनुशासन की ओर ले जाने के लिए हैं। भजन-सिमरन के अलावा बेशक़ बाहरी सेवा एक शिष्य की रूहानी यात्रा में सबसे अधिक फ़ायदेमंद और संतोषजनक कार्य है लेकिन यह केवल एक ज़रिया है, अंत नहीं।
मानवता की वास्तविक सेवा क्या है?
युगों-युगों से पुनर्जन्म के चक्कर में फँसी आत्मा को आवागमन से आज़ाद कराना और उसको उन निर्मल रूहानी मण्डलों में पहुँचाना जहाँ से वह फिर जन्म-मरण के चक्कर में वापस न आये। बाक़ी सभी सेवाएँ अस्थायी हैं।…सबसे पहले आप अपनी सेवा करें, फिर बाक़ी लोगों की सेवा करने की सोचें। एक क़ैदी दूसरे क़ैदी को आज़ाद नहीं कर सकता।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
तन, मन और धन की सेवा अपने अंदर उच्च गुणों को पैदा करने के लिए की जाती है। इनमें से हर सेवा हमारे अंदर विनम्रता पैदा करती है, हमें धन-दौलत के लोभ और पद्वियों के अहंकार से मुक्त करती है और हमारी बेक़ाबू प्रवृत्तियों और इच्छाओं पर क़ाबू पाने में मदद करती हैं। हालाँकि, ये सब सेवाएँ उस सर्वोत्तम सेवा – सुरत-शब्द की सेवा – की तैयारी हैं जिसे करने के लिए यह मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है।
मनुष्य के लिए सबसे उत्तम सेवा या निष्काम कर्म अपनी सुरत को शरीर के नौ द्वारों में से समेटकर ऊपर तीसरे तिल पर इकट्ठा करना है। यहाँ सुरत सृष्टि में निरंतर गूँज रहे शब्द के साथ जुड़ जाती है। यह दिव्य मिलाप आत्मा या सुरत को मन और शरीर के भ्रम से बाहर खींचना शुरू कर देता है; उसके बाद ही आत्मा का अपने निज-घर, अपने रचयिता की ओर असल रूहानी सफ़र शुरू होता है।
हरि और गुरु की सेवा केवल वही कर सकता है जिस पर मालिक की अपार दया हो।…गुरु की सेवा उसको मिलती है जिसके धुर का भाग्य (लेख) हो…जो सतगुरु की सेवा में लगा है वह बड़ा भाग्यशाली है। सतगुरु में मालिक समाया हुआ है।
महाराज सावन सिंह जी, गुरुमत सिद्धांत, भाग 2
संत-सतगुरु सबसे बड़ी सेवा या निष्काम कर्म करते हैं। वह हमें परमात्मा के ‘शब्द’ (नाम) का भेद देते हैं, जो अहंकार को नष्ट कर देता है; यही ‘शब्द’ मन और शरीर को निर्मल करता है और हमें परमात्मा से मिलाप के क़ाबिल बनाता है। पूर्ण संत-सतगुरु शिष्य को दीक्षा देते हैं और उसे रूहानी अभ्यास या भजन-बंदगी – परमात्मा के नाम के सिमरन और ध्यान – के लिए प्रेरित करते हैं।
संत-महात्मा परमात्मा के प्रेम और भक्ति में लीन रहते हैं; वह अपनी सुरत को परमात्मा में अभेद कर चुके होते हैं; और अब वह दूसरी जीवात्माओं को निज-घर पहुँचाने की परमात्मा द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी को पूरा करने में जुटे हैं जोकि किसी के द्वारा की जानेवाली सर्वोत्तम सेवा है।
गुरु अर्जुन देव जी ने फ़रमाया है:
संत की सेवा नामु धिआईऐ॥
आदि ग्रंथ
सतगुरु के निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना और परमात्मा के नाम का ध्यान करना ही सबसे बड़ा दान या निष्काम कर्म है। इस निरंतर अभ्यास द्वारा हमारी सुरत अंदर लगातार गूँज रहे शब्द में समा जाती है।
सतगुर की सेवा सफल है जे को करे चित लाए॥
नाम पदारथ पाईऐ अचिंत वसै मन आए॥
गुरु अमरदास जी, आदि ग्रंथ, सेवा पुस्तक से उद्धरित