अज्ञानता से जागरूकता की ओर
सच्चा रूहानी मार्ग प्रकाश का मार्ग है। परमात्मा का सार और हमारी आत्मा का सार भी निर्मल प्रकाश ही है। खनिज पदार्थ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, वायरस या बैक्टीरिया, यहाँ तक कि सूक्ष्म मण्डलों के जीव भी प्रकाश की इसी शक्ति द्वारा जीवित रहते हैं। हर एक ज़र्रे का आधार भी यही ज़बरदस्त शक्ति है।
लेकिन बार-बार यही सवाल खटकता है कि हम बाहर इस संसार में सूर्य और प्रकाश देने वाले बहुत-से कृत्रिम साधनों का इतना प्रकाश देखते हैं तो फिर हमारी आत्माएँ रूहानी तौर पर अंधेरे में क्यों है? अगर हम परमात्मा का अंश हैं तो हम अपने अंदर उस प्रकाश की शक्ति का अनुभव क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
हीरा तो हीरा ही होता है। अगर उसे कीचड़ में फेंक दें तो उस पर कीचड़ लिपट जायेगा, पर जैसे ही उसे धोकर साफ़ कर लेंगे तो वही चमक वापस आ जायेगी। आत्मा एक हीरा है। हर आत्मा परमात्मा की अंश है। आत्मा अपने आप में निर्मल है, पर इसने मन का साथ ले लिया है और यह मन इंद्रियों का ग़ुलाम है। इसी कारण आत्मा भी अति गंदी और मैली हो चुकी है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
हुज़ूर महाराज जी अकसर बिजली के बल्ब का उदाहरण दिया करते थे। अगर आप बल्ब के ऊपर बहुत-से काले पर्दे लपेट दें तो उसकी रोशनी धुँधली पड़ जाती है। ठीक उसी तरह, यह कल्पना कर पाना भी मुश्किल है कि हमने रचना के आरम्भ से कितने कर्म इकट्ठे कर लिए हैं। एक के बाद एक इन काले पर्दों ने हमारी आत्मा के अलौकिक प्रकाश को छुपा दिया है।
आत्मा को सीमा में रहकर कार्य करना पड़ता है।…यह संसार इसका अपना घर नहीं है। यहाँ आत्मा को मन और भौतिक पदार्थों के कई आवरणों में रहकर, इनके ज़रिए कार्य करना पड़ता है।… हालाँकि मन उच्चकोटि का जड़ पदार्थ है लेकिन हम इसे जड़ पदार्थ नहीं समझते। इन सभी आवरणों से ढकी आत्मा को अपनी पहचान करने में और अपनी राह पर चलने में बहुत मुश्किल होती है।
द पाथ ऑफ़ द मास्टर्ज़
एक समय था जब हमारी सुरत दिव्य अमृत का पान करती थी। बदक़िस्मती से आज आत्मा की ख़ुराक काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार है, इसलिए यह अंधकार में है।अगर अंधकार प्रकाश को समझने की कोशिश करे तो वह कभी सफल नहीं होगा। अंधकार अपने आप को सीमित कर लेता है। लेकिन एक बात तय है; जहाँ प्रकाश होता है वहाँ अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए अंधेरा नहीं ठहर सकता। इसलिए ख़ुशी की बात यह है कि अंधेरे का अपना कोई वुजूद नहीं है, यह केवल हमारे मन में प्रकाश का अभाव है। इस अंधकारमय अवस्था में हमने अपने सच्चे आंतरिक स्वरूप से अलग अपनी एक पहचान बना ली है जिस कारण हम माया और ग़लत धारणाओं में जीने के लिए मजबूर हैं। नतीजा यह होता है कि हम जो कुछ भी महसूस करते, समझते या अनुभव करते हैं उसकी वजह यही विकृत धारणाएँ हैं और इनकी कोई असलियत नहीं है।
हम अपनी इंद्रियों द्वारा जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह बस एक भ्रम है। प्रोजेक्टर में रोशनी होती है: वही परम सत्ता है। फिर उसमें फ़िल्म होती है जिसमें से होकर रोशनी चमकती है: वही मन है। और फिर एक पर्दा होता है जिस पर छवियों के प्रतिबिंब दिखाई देते हैं: वही यह संसार है…प्रोजेक्टर की रोशनी बंद कर दीजिए और सब कुछ गायब हो जाएगा।
वन बीइंग वन
मान लीजिए कि हमारे पास ख़ूबसूरती से तराशा हुआ काँच का टुकड़ा है। जब हम इसे देखते हैं तो यह हमें हीरे की तरह लगता है। जबकि असल में वह काँच ही है। हीरा कहाँ है? उसका अस्तित्व कहाँ है? असल में तो उसका कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि वह तो काँच है। हीरे का अस्तित्व सिर्फ़ हमारी सोच में है। अगर हीरों का कोई जौहरी उस टुकड़े का मूल्यांकन करे तो वह उसके काँच होने की पुष्टि करेगा। जब काँच के हीरा होने का भ्रम दूर होता है तब अगर वह टुकड़ा हमसे कहीं खो जाए या इधर-उधर रखा जाए तो हमें उसके खोने का कोई अफ़सोस नहीं होता।
जिस तरह चंद्रमा सूर्य की रोशनी को अपनी सतह पर परावर्तित करता है ठीक उसी तरह हमारा मन हमारी आत्मा से रोशनी लेता है। जब कोई व्यक्ति अपने मन के दायरे से ऊपर उठ जाता है तब उसे आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, ज्ञान रूपी प्रकाश उसके मन में प्रवेश कर जाता है और उसे सत्य का ज्ञान हो जाता है। उसे दुनिया की असलियत समझ आ जाती है। उसकी आंतरिक दृष्टि स्पष्ट हो जाती है और उसे दिखाई देने लगता है कि धन, प्रसिद्धि और दुनियावी रिश्ते सभी मिथ्या हैं, इसलिए वह उनके खो जाने से दु:खी नहीं होता। वह स्थूल जगत से बेलाग हो जाता है और अंतर में सिर्फ़ प्रभु के सच्चे प्रेम से जुड़ जाता है।
“आत्म-ज्ञान प्राप्त हो जाने का क्या अर्थ है?”
“समझ लेना।”
“क्या?”
“सफलता का खोखलापन, उपलब्धियों की अर्थहीनता, मनुष्य के संघर्ष की असारता,” सतगुरु ने समझाया।
एंथोनी डी मेलो, वन मिण्ट नॉनसेंस
महात्मा बुद्ध ने हमें यह समझाया कि हमारे सभी दु:खों का कारण अज्ञानता है। जब उनसे पूछा गया कि ऐसे दु:ख से उनका क्या अभिप्राय है तब उन्होंने इस बात को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया कि कैसे एक घोर अंधेरी रात में, एक व्यक्ति चट्टान से गिर गया। उसने रात के घोर अँधेरे में एक पेड़ की शाखा पकड़ ली। उसे इस बात का पता नहीं था कि नीचे क्या है – ज़मीन, गहरी घाटी या पानी।
वह सारी रात काँपता और रोता रहा। डर के मारे उसने शाखा को और भी कसकर पकड़ लिया। सुबह जब उजाला हुआ तब उसने देखा कि वह ज़मीन से सिर्फ़ एक फुट दूर था। यही अज्ञानता है और अज्ञानता में ऐसा ही होता है।
संत-महात्मा अकसर समझाते हैं कि अंधकार अज्ञानता का प्रतीक है क्योंकि हम इस बात से अनजान हैं कि हमारा असल स्वरूप क्या है। बाहरी तौर पर हम वर्तमान पल में रहकर, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हमने चाबियाँ कहाँ रखी थीं और बोलने से पहले सोचकर, जागरूकता का ‘अभ्यास’ कर सकते हैं। बेशक़ ये गुण सीखने लायक़ हैं लेकिन सच्ची जागरूकता तो अंतर में शब्द के बारे में सचेत होना है।
नाम या शब्द ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो हमें हमारी अज्ञानता और उसके फलस्वरूप पैदा हुए दु:खों से मुक्ति दिला सकती है। मन के अधीन होने के कारण हमें शब्द से जुड़ने के मार्ग या साधन का ज्ञान नहीं है। पूर्ण सतगुरु नामदान के समय हमें इसकी उचित युक्ति समझाते हैं। वह हमें निज-घर – सचखंड पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार॥
एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार॥
आदि ग्रंथ, गुरबानी सिलेक्शन्ज़, वॉल्यूम I, से उद्धरित
संस्कृत में, ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। सतगुरु हमें समझाते हैं कि हम भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा अपनी आंतरिक आँखों में नाम रूपी सुरमा कैसे डाल सकते हैं – यह एक ऐसा रूपक है जो शब्द की शक्ति को दर्शाता है कि शब्द रूहानी तौर पर अंधों को रोशनी देता है ताकि वे देख सकें।
भजन-सिमरन में तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी होती है क्योंकि आत्मा को अलौकिक प्रकाश के साथ सहज होने में समय लगता है। सतगुरु के लिए किसी आत्मा को रूहानी तौर पर परिपक्व हुए बिना रूहानी मंडलों में ले जाकर उस आंतरिक प्रकाश का प्रत्यक्ष अनुभव करवाना बिलकुल भी मुश्किल नहीं है। लेकिन शिष्य के लिए उस अलौकिक प्रकाश को एकाएक देखना और बर्दाश्त करना आसान नहीं होगा। इसे देखने के लिए हमारी आंतरिक आँख का धीरे-धीरे खुलना ही सही है ताकि हम इस दुनिया में अपना संतुलन न खो बैठें।
हक़ीक़त के नज़दीक आना सूरज के नज़दीक आने जैसा है। हमारा उद्देश्य आंतरिक प्रकाश के नज़दीक आते जाना है जब तक कि हमारा अहंकार समाप्त न हो जाए। फिर आत्मा उस पतंगे जैसी हो जाती है जिसमें ज्योति के लिए इतनी तीव्र कशिश होती है कि वह तेज़ी से लौ की ओर बढ़ता जाता है और उस में अपनी हस्ती और पहचान खो देता है।
प्रकाश की क़द्र करने के लिए पहले अंधकार से गुज़रना होगा। भजन-सिमरन करते समय जब हमें अंदर कुछ दिखाई नहीं देता तो वह असल में ‘शून्य अवस्था’ नहीं होती बल्कि यह अंधकारपूर्ण आकाश है जो हम देखते हैं। अगर हम अपने ध्यान को बिना भटकाए तीसरे तिल पर एकाग्र करें तो हमारे अंदर शब्द की ध्वनि और प्रकाश प्रकट हो जाते हैं।
तब तक, सृष्टि की इस व्यवस्था में अंधकार अपनी भूमिका निभाता है। हर चीज़ का अपना समय होता है, हर चीज़ के पीछे कोई वजह होती है और हर चीज़ के पनपने का अपना मौसम होता है। बीज को अंकुरित होने के लिए कुछ समय के लिए सूरज की रोशनी से दूर, ज़मीन के नीचे रहना पड़ता है तभी वह अंकुरित होकर प्रकाश में आता है।
वह प्रकाश हमारे अंदर है, पर जब तक हम उस प्रकाश को अंदर देख नहीं लेते, जब तक हम उसमें समा नहीं जाते, तब तक हमें उस प्रकाश की पहचान नहीं होती। हज़रत ईसा ने कहा है, ‘अगर तुम एक आँख वाले हो जाओगे तो तुम्हारा पूरा शरीर प्रकाश से भर जायेगा।’…उस प्रकाश को देखने के लिये आपको अंदर की वह तीसरी आँख खोलनी होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1