सच्ची दौलत
हम अकसर अपनी ज़मीन-जायदाद, धन-संपत्ति को ही अपनी दौलत मानते हैं। रुपया-पैसा हमारी सांसारिक ज़रूरतों को पूरा करने का साधन है लेकिन इसे हमारी सच्ची दौलत नहीं कहा जा सकता। दौलत को संपन्नता के रूप में परिभाषित किया जाता है। अगर हम इस बात को समझ लें तो सच्ची दौलत वह है जिसे हम अनुभव करते हैं न कि जिसके हम मालिक होते हैं। सच्ची दौलत का अर्थ हर किसी के लिए अलग हो सकता है; कुछ लोगों के लिए अच्छा स्वास्थ्य सच्ची दौलत है जबकि हो सकता है कि दूसरों के लिए संतोष या करुणा ही सच्ची दौलत हो। सच्ची दौलत को मापना मुश्किल है लेकिन इसे प्यार, ख़ुशी, अच्छे काम करने के अवसर आदि कई तरीक़ों से ज़ाहिर किया जा सकता है।
संतमत पर चलने वाले जिज्ञासुओं या नामदान प्राप्त कर चुके लोगों के लिए रूहानी दौलत ही उनकी सच्ची दौलत है। मीराबाई ने नाम को ही सच्ची दौलत कहा है:
पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो॥
बस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर, किरपा कर अपनायो॥
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो॥
खरचै नहिं कोइ चोर न लेवे, दिन दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाव खेवटिया सतगुर, भवसागर तर आयो॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
मीरा: प्रेम दीवानी
भजन-सिमरन रूहानी दौलत को इकट्ठा करने का साधन है। महाराज चरन सिंह जी समझाते हैं कि भजन-सिमरन करके हम स्वर्ग में ख़ज़ाना जमा करते हैं:
अगर दिन भर में आप दस रुपये कमाएँ और शाम को सब ख़र्च कर दें तो जहाँ से दिन शुरू किया था वहीं रह जाएँगे। सत्संग भजन की उस दौलत की रक्षा करने में आपकी मदद करेगा। सत्संग आपको नम्र रहने में सहायता देगा ताकि आप उस प्रभु के प्रतिद्वंद्वी न बन जाएँ…सत्संग आपको परमात्मा की इच्छा में रहने में मदद देगा और यही सच्ची नम्रता है, आजिज़ी है। परमात्मा अंतर में आप पर जो दया-मेहर करेगा, सत्संग उसकी रक्षा करेगा।
जीवत मरिए भवजल तरिए
संतमत का ढंग बड़ा सिलसिलेवार है। इसकी रूप-रेखा इस तरह से तैयार की गई है कि यह हमें भजन-बंदगी के लिए प्रेरित करता है। इस मार्ग पर रखा गया हर क़दम हमें रूहानी तौर पर सच्ची मुक्ति के लिए तैयार करता है। जब हम जिज्ञासु होते हैं तब हमें मार्ग के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में पता चलता है। नामदान के समय हमें यह समझाया जाता है कि उन्हें जीवन में कैसे अपनाना है और कैसे रोज़मर्रा के जीवन में अपनी प्राथमिकताओं को तय करना है। वे चार वायदे जो हमसे लिए जाते हैं, पहले से बेहतर इनसान बनने में हमारी मदद करते हैं। सत्संग और सेवा द्वारा भी हमें मदद मिलती है। सत्संग से रूहानी माहौल बनता है और हम नकारात्मक वृत्तियों से बच जाते हैं। साथ ही सत्संग हमें हमारे रूहानी कर्त्तव्य के बारे में लगातार याद दिलाता है। सेवा द्वारा जैसे-जैसे हमारे अंदर विनम्रता पैदा होती है, हमें एहसास होता है कि हमें कितना कुछ दिया गया है, साथ ही हमें मिल-जुलकर सेवा करने के महत्त्व का पता चलता है और हम अपने साथी सेवादारों की इज़्ज़त करना सीखते हैं। आख़िर में, हमारे पास अनगिनत किताबें, रिकॉर्ड किए हुए बहुत-से सत्संग और अलग-अलग भाषाओं में चैनल उपलब्ध हैं जो रूहानी दौलत को इकट्ठा करने में हमारी मदद करते हैं।
जब हम वायदों का पालन दृढ़तापूर्वक करते हैं तब हम अपनी रूहानी दौलत में निवेश कर रहे होते हैं। जो सेवा हम करते हैं, जो आध्यात्मिक पुस्तकें हम पढ़ते हैं और जो सत्संग हम सुनते हैं सभी हमारे भजन-सिमरन को सशक्त बनाते हैं। भजन-सिमरन करने में बिताया गया हर पल हमें हमारी रूहानी मंज़िल की ओर ले जाता है।
हालाँकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्संग, सेवा और चारों वायदे मंज़िल तक पहुँचने का ज़रिया हैं, ख़ुद मंज़िल नहीं हैं। नाम एक ऐसा ख़ज़ाना है जो हमें हमारे सतगुरु की बख़्शिश द्वारा प्राप्त होता है और इसे इकट्ठा करने के लिए हमें हर रोज़ कोशिश करनी पड़ती है। हमें भजन-सिमरन द्वारा इसे बढ़ाने का यत्न करना चाहिए। अगर हम भजन-सिमरन नहीं करते तो रूहानी दौलत को जमा करने के लिए की गई अन्य कोशिशों से हमें कोई ख़ास लाभ प्राप्त नहीं होगा।
बूँद-बूँद करके सागर भरता है, ठीक उसी तरह रूहानी दौलत को इकट्ठा करने के लिए हमारा हर एक क़दम महत्त्वपूर्ण है। विश्वास, कोशिश और समर्पण द्वारा ही रूहानी दौलत को जमा किया जा सकता है और जब एक बार यह ख़ज़ाना जमा हो जाता है तो इसके खोने का कोई ख़तरा नहीं होता। जो कुछ हमने जमा किया है, वह हमारे अंतिम स्वाँस तक और उसके बाद भी हमारे साथ रहता है।
आपको वापस धुर-धाम जाने के लिये पारपत्र (passport) दे दिया गया है, जहाँ परमपिता आपके आने की राह देख रहा है। दुःख-दर्द के इस संसार में इससे बढ़कर ख़ुशी, दया और आनंद की बात और क्या हो सकती है? वास्तव में, इस मार्ग पर चलनेवाले सत्संगी के सिवाय इस संसार में और कोई सुखी नहीं हो सकता। उसे हमेशा अपने असली घर, धुर-धाम को ध्यान में रखना चाहिये जहाँ सब प्रकार के सुख और आनंद उसकी राह देख रहे हैं।
महाराज चरन सिंह जी, प्रकाश की खोज
हमारी रूहानी दौलत ही हमारा असल ख़ज़ाना है, हमारी सच्ची दौलत है जिससे हमें संपन्नता, आनंद, संतोष, शांति और जीने का मक़सद मिलता है। हम इस दौलत को माप नहीं सकते, केवल इसका आनंद ले सकते हैं। हर रोज़ हमारी यही कोशिश होनी चाहिए कि हम इस दौलत को इकट्ठा करें और इसे व्यर्थ बर्बाद न करें।
ख़ामोश!
अगर ज़मीर के ख़ज़ाने
के राज़ तक पहुँचना चाहते हो,
तो सिर्फ़ दिल वहाँ पहुँच सकता है,
ज़बाँ नहीं पहुँच सकती।
जलाल अल-दीन रूमी