जीते-जी मरना
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या
हर किसी ने एक न एक दिन इस संसार को छोड़कर जाना है। क्या इनसान क्या हैवान, क्या अमीर क्या ग़रीब, क्या तंदुरुस्त क्या बीमार; मौत से कोई नहीं बच सकता। मृत्यु के द्वार से सबको गुज़रना पड़ता है। जो आत्मा देह में आई है उसे एक दिन इस देह का त्याग करना पड़ेगा। हम सब जानते हैं कि एक दिन हमें इस संसार से ज़रूर चले जाना है, पर यह नहीं पता कि कब।
मरना सत्य है, मगर जीना (इस संसार में) झूठ है। “शरीर मिट्टी है और इसने एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है।” मृत्यु के बाद का सफ़र कैसा होगा, इसके बारे में हमने कभी सोचा तक नहीं। हम दूसरों के मरने पर रोते हैं। पर असल में हमें अपनी मौत की चिंता करनी चाहिए और मृत्यु के बाद के जीवन के लिए तैयारी करनी चाहिए।
मौत क्या है? क्या हमें मौत के समय पीड़ा होती है? इस पीड़ा के बारे में श्रीमद् भागवत् में ज़िक्र है कि मृत्यु के समय शरीर से निकलने में आत्मा को इतनी पीड़ा होती है जितनी एक लाख बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने पर होती है। क़ुरान शरीफ़ में कहा गया है, “मौत के समय होनेवाली पीड़ा की तुलना उस पीड़ा से की जा सकती है जो किसी काँटेदार झाड़ी के शरीर में ज़ोर से घुसने पर होती है।” आदि ग्रंथ में भी मौत की पीड़ा के बारे में कुछ संकेत दिए गए हैं।
मौत के बाद हमें किन राहों में से गुज़रना पड़ेगा? वहाँ हमारा वास्ता किन के साथ पड़ेगा? इस पर विचार करना ज़रूरी है। ग्रंथ-पोथियों में इसके बारे में कुछ वर्णन मिलते हैं, पर हम उन्हें कल्पित कथाएँ समझकर उन पर ध्यान नहीं देते। शायद हम यह समझते हैं कि यह जीव को पाप कर्म करने से रोकने के लिए हैं या उन्हें शुभ कर्म करने के लिए प्रेरित करने के लिए हैं। हमें मौत के द्वार से गुज़रना पड़ेगा। इससे कोई भी बच नहीं सकता। सेंट पॉल कहते हैं: “मौत वह अंतिम शत्रु है जिस पर हमें विजय प्राप्त करनी है।” हमें इस विषय पर आँखें नहीं मूँद लेनी चाहिएँ।
हम सबका अनुभव है कि अगर हमें किसी दूसरे देश में सफ़र पर जाना हो तो हम उसके लिए तैयारी करते हैं, साथ में ज़रूरी ख़र्च का भी प्रबंध कर लेते हैं। उस जगह पहुँचने के लिए हम ताँगे, मोटरगाड़ी या रेलगाड़ी में जाने का इंतज़ाम करते हैं। उस देश में किसी मित्र को पत्र लिखते हैं और वहाँ ठहरने का इंतज़ाम भी कर लेते हैं। सांसारिक मामलों में तो हम इतने समझदार हैं कि बिना सोचे-समझे कभी कोई यात्रा नहीं करते। जब हमें किसी नए देश में जाना हो तो हम वहाँ किसी मार्गदर्शक को साथ लेने का इंतज़ाम भी करते हैं। मगर मौत के बाद के सफ़र, जिसका ख़तरा सबके सिर पर मँडरा रहा है और अपनी बारी आने पर जिसका सामना सभी को करना पड़ेगा, उसके बारे में हम थोड़ी-सी भी फ़िक्र नहीं करते। इस सफ़र को तय करने के लिए नाम या शब्द रूपी भोजन की ज़रूरत है क्या हमने उसका इंतज़ाम कर लिया है? क्या हमने कोई ऐसा रहबर या सतगुरु ढूँढ़ लिया है जिसे मार्ग का ज्ञान है और जो ख़ुद मार्ग पर चल चुका है, जो हमारे साथ चले? हमें वहाँ जाकर कहाँ रहना है, क्या हमने कभी इस बारे में विचार किया है? ये बातें तो एक ओर रहीं, हमें तो यह भी पता नहीं कि हमें जाना कहाँ है और वहाँ कौन हमारी सहायता कर सकता है; यहाँ तक कि हम तो मौत को ही भुलाए बैठे हैं।
सांसारिक कार्य-व्यवहार में तो हम बड़े होशियार हैं और हर काम को सफलतापूर्वक करने के लिए उचित इंतज़ाम करते हैं। लेकिन मृत्यु जिसका समय निश्चित नहीं है और जो किसी भी समय आ सकती है – बचपन में, जवानी में या बुढ़ापे में – उसके बारे में हमने कभी एक पल के लिए भी विचार नहीं किया।
मौत के बारे में केवल सतगुरु को पूर्ण ज्ञान होता है। मृत्यु के समय, जब परिवार और बाल-बच्चे, हमारी धन-दौलत, ज़मीन-जायदाद और शरीर सब साथ छोड़ देते हैं तब संत-सतगुरु अपने शिष्य के साथ-साथ चलते हैं। वह जीव के सच्चे और भरोसेमंद साथी होते हैं।
पूर्ण सतगुरु मृत्यु के उस पार सूक्ष्म, कारण और निर्मल रूहानी मंडलों के सच्चे रहनुमा होते हैं। इसीलिए धर्म-ग्रंथों में किसी ऐसे सतगुरु से मिलाप और मन ही मन उनका ध्यान करने पर बहुत बल दिया गया है। ऐसा करने पर ही हम जन्म-मरण की जड़ को काटकर चिरस्थायी आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
संत-महात्माओं ने मौत की पहेली को सुलझा लिया है। वे प्रतिदिन अपनी मर्ज़ी से ऊँचे रूहानी मंडलों की सैर करते हैं। उनकी संगति में जाकर हम भी मृत्यु पर जीत हासिल करने की युक्ति सीख लेते हैं।
मौत से डरनेवाली कोई बात नहीं। यह सिर्फ़ आत्मा के शरीर को छोड़ जाने का नाम है। इस स्थूल शरीर को त्यागकर आत्मा सूक्ष्म, कारण और उनसे भी ऊपर के मंडलों में चली जाती है। इसे फ़ारसी भाषा में ‘इंतकाल’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘तबदील हो जाना।’ यह हमारी आत्मा का स्थूल इंद्रियों को छोड़कर सूक्ष्म मंडलों में प्रवेश करना है। यह सिर्फ़ शरीर रूपी इस चोले को छोड़ देना है। यह कोई नेस्तो-नाबूद हो जाना या बिलकुल नष्ट हो जाना नहीं है। मृत्यु के बाद भी जीवन क़ायम रहता है, हालाँकि हम उसे देख नहीं पाते। सभी संत-महात्मा इस सिद्धांत को स्वीकार करते हैं।
महाराज सावन सिंह जी, फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ द मास्टर्ज़, वॉल्यूम I