ऐ ग़ाफ़िल रूह
ऐ ग़ाफ़िल रूह,
जाग और पहचान अपने असल को।
तू कोयले का टुकड़ा नहीं,
बल्कि चमकता हीरा है।
आसान नहीं है राह रूहानी नूर की,
चुनौतियाँ बेशुमार रोकेंगी राह तेरी।
वक़्त है मशग़ूल हो जाने का,
स्नान रूहानी ही है बंदगी रोज़ की।
वक़्त आ गया है अपने घर लौटने का।
इक मुद्दत हुई तुझे दूर हुए,
इस दुनिया की गुबंद में क़ैद,
मन के बहकावे में उलझे।
ख़ुद को कर पाक-साफ़ कि ख़ुदा के लायक़ बने।
कर तैयारी उसके स्वागत की,
कर स्वागत हमसफ़र का,
मनाओ जश्न कि फिर से मिलन हुआ।
जाग उस गहरे अंधेरे से।
एक चित्त एक ध्यान हो,
पकड़ ले उस रौशन नूर को,
हो जा विलीन उस असीम-अनंत में।