हुज़ूर के सत्संग दौरे
हैवन ऑन अर्थ से उद्धरित
अगर हम गुरु नानक साहिब, कबीर साहिब और गुरु रविदास जी जैसे संतों के जीवन के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि यातायात के सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ कीं, संतमत की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया और जिज्ञासुओं को नामदान की बख़्शिश की। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी अकसर भारी असुविधा और कष्ट सहते हुए अट्ठासी वर्ष की आयु तक सत्संग देने के लिए दौरे करते रहे। अपनी बीमारी के बावजूद, सरदार बहादुर महाराज जी ने भी सत्संग, दर्शन और नाम की बख़्शिश करने के लिए कई दौरे किए। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी ने न सिर्फ़ भारत में बल्कि विदेशों में भी उस महान परंपरा को जारी रखा, सच कहें तो आप ने दुनिया भर में यात्राएँ कीं। आपने उन बहुत-से देशों में भी संतमत के उपदेश को पहुँचाया, जहाँ पहले कभी किसी पूर्ण संत के आगमन का कोई रिकॉर्ड तक नहीं है।
यद्यपि महाराज जी ने सन् 1961 तक कोई विदेशी दौरा नहीं किया, फिर भी उन्होंने गुरुगद्दी पर विराजमान होने के कुछ महीनों बाद ही भारत में अपने दौरे शुरू कर दिए। सन् 1952 की गर्मियों में मैदानी इलाकों की गर्मी से राहत पाने के लिए डलहौज़ी की यात्रा की और सत्संग देने के लिए आस-पास के पहाड़ी इलाकों की यात्राएँ कीं। इससे पहले, महाराज जी ने मार्च, सन् 1952 में अमृतसर में एक सत्संग फ़रमाया था जो कि डेरे से बाहर आपका पहला सत्संग था। सत्संगियों और साधकों की बहुत ज़्यादा भीड़ उमड़ी थी और सत्संग हॉल का खुला परिसर खचाखच भरा हुआ था। महाराज जी ने नवंबर, सन् 1953 में दिल्ली में दो सत्संग दिए, यह दिल्ली में आपका पहला सत्संग दौरा था। सत्संग शामियानों के नीचे खुले मैदान में आयोजित किए गए थे, और वहाँ संगत की गिनती पंद्रह हज़ार से भी अधिक थी।
बड़े महाराज जी के एक पुराने शिष्य, बख़्शी मलूक चंद जी ने सन् 1950 के दशक के आरंभ में महाराज जी की पहली दिल्ली यात्रा का एक दिलचस्प किस्सा सुनाया:
महाराज जी ने मुझे बुलाकर कहा, “बाबा जी महाराज के एक वृद्ध सत्संगी भाई नारायण दास जी यहाँ दिल्ली में रहते हैं। कृपया जाकर उनसे कह दें कि मैं कल शाम चार बजे उनसे मिलने आऊँगा।”
मैं भाई नारायण दास को जानता था और उनसे अकसर मिलता रहता था। उसी दिन मैं उनके घर गया। जब मैंने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी, तो उन्होंने आवाज़ लगाई, “अंदर आ जाइए, बख़्शी जी।” मैं हैरान रह गया और अंदर जाकर मैंने उनसे पूछा कि आपको कैसे पता चला कि मैं ही आपके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हूँ। उन्होंने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया बल्कि मुझसे कहा कि जो संदेश मैं लाया हूँ, वह उन्हें दे दूँ। मैं जानता था कि वह एक कमाईवाली रूह हैं और अब अपना ज़्यादातर समय भजन-सिमरन में ही बिताते हैं, इसलिए मैंने पूछा, “भाई साहिब, बताइए, आपको कैसे पता चला कि मैं ही आपके दरवाज़े पर आया हूँ और यह भी कि मेरे पास आपके लिए एक संदेश है?”
पहले तो भाई नारायण दास मेरे सवाल का जवाब देने में आनाकानी करते रहे। मेरे ज़ोर देने पर आख़िरकार उन्होंने बताया कि परसों बाबा जी महाराज अंदर प्रकट हुए थे और उन्होंने फ़रमाया था, “नारायण दास, मैं परसों शाम चार बजे तुम्हारे पास देहस्वरूप में आऊँगा।”
यह सुनकर मैंने उन्हें महाराज जी का संदेश सुनाया। वह बहुत प्रसन्न हो गए और इतना सुखद संदेश लाने के लिए उन्होंने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया। मैंने ऐतराज़ किया, “संदेश तो आपके पास पहले से ही था, फिर मुझे धन्यवाद क्यों?” उन्होंने उत्तर दिया, “जब सतगुरु द्वारा अंदर दिए गए संदेश सच हो जाते हैं, तो आनंद महसूस होना क़ुदरती है।”
अगले दिन जब हुज़ूर महाराज जी, बाबा जी महाराज के इस वृद्ध शिष्य से मिलने आए, तो मैं भी वहीं मौजूद था; महाराज जी उनके साथ आधे घंटे तक रहे। पूरा समय भाई नारायण दास उन्हें एकटक देखते रहे, ज़ाहिर है कि वे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे क्योंकि सतगुरु देहस्वरूप में उनसे मिलने के लिए आए थे।