दिल से दिल की बात
एक बार किसी ने महाराज जी से विनती की कि आप अपने परिवार, विशेष तौर पर अपने पिता जी के बारे में कुछ बतायें, क्योंकि वे न केवल एक सतगुरु के पिता थे, बल्कि एक सतगुरु के पुत्र भी थे। महाराज जी ने उत्तर दिया, “इसमें जाननेवाली कौन-सी बात है?” आपने समझाया कि जीवन-वृत्तान्त के विवरण सेनाध्यक्षों व राजनीतिज्ञों के बारे में शायद ज़रूरी हों, लेकिन सन्तों की जीवनी तो उनकी संगत होती है और उनका उपदेश होता है, जो उनकी संगत में प्रतिबिम्बित होता है।
प्रेम की विरासत
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बाबा सावन सिंह जी के असीम प्रेम और आध्यात्मिक महानता के बारे में सैकड़ों कहानियाँ सुनाई जाती हैं। इनमें से एक कहानी किसी अजनबी के बारे में है। वह सत्संग में बैठा महाराज जी के उपदेश को चुपचाप सुन रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह उठकर खड़ा हो गया और सत्संग को बीच में ही रोककर कहने लगा कि उसे विश्वास नहीं होता कि सत्संग करनेवाला गुरु सच्चा है और उसका तात्पर्य यह था कि वह एक पाखंडी है।
वहाँ उपस्थित सत्संगी हक्के-बक्के रह गए और बहुत क्रोधित हो गए, वे उसे बाहर निकालने ही वाले थे कि महाराज जी ने उन्हें संयम में रहने का संकेत देकर शांत किया और कहा, “तुम इस पर क्रोधित क्यों हो रहे हो? उसे अपनी राय रखने का अधिकार है और जब मैं क्रोधित नहीं हूँ, तो तुम क्यों क्रोधित हो रहे हो?”
इसके तुरंत बाद वह अजनबी महाराज जी के चरणों पर गिर पड़ा और उसने स्वीकार किया: “मैं कई वर्षों से किसी पूर्ण सतगुरु की खोज कर रहा हूँ। मैंने कई लोगों पर यह कठोर चाल चली है जो सच्चे संत होने का दावा करते थे पर वे हमेशा बहुत अधिक क्रोधित हो जाते थे। मैं हर बार यही सोचता था, ‘तो इन्होंने अभी तक पाँच शत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं की है, जिनमें से एक क्रोध है और इसलिए अभी इनका ख़ुद पर ही नियंत्रण नहीं है।’ और मैंने यह सोचकर खोज जारी रखी कि अभी भी सच्चे गुरु की तलाश करना बाक़ी है। मुझे अब जाकर एक ऐसा गुरु मिला है जो क्रोध या कड़वाहट से मुक्त है। मुझे आख़िरकार एक सच्चा संत मिल गया है।”
द मिस्टिक फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ संत मत