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भाग 22 • अंक 1
जनवरी फ़रवरी 2026
नए साल का संदेश
आप ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। ज्ञान आपके अन्दर है। शब्द-धुन ही वह ज्ञान है। …
बेहद ज़रूरी
विचार करने योग्य
वह जो मेरे हृदय को ख़ुशी से सराबोर कर देता है
यह प्रश्न अकसर पूछा जाता है कि पूर्ण सतगुरु की पहचान कैसे की जाए? …
क्या आप जानते हैं?
सजग रहकर कर्त्तव्य निभाना
जीते-जी मरना
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या …
निष्काम कर्म
ख़ुश रहें
जीवन के उतार-चढ़ाव के बावजूद ख़ुश रहना एक आदर्श रूहानी जीवन की पहचान है। …
सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए चुनिंदा सवाल-जवाब …
अज्ञानता से जागरूकता की ओर
सच्ची दौलत
हम अकसर अपनी ज़मीन-जायदाद, धन-संपत्ति को ही अपनी दौलत मानते हैं। …
रूहानी फुलझड़ियाँ
ऐ ग़ाफ़िल रूह
ऐ ग़ाफ़िल रूह, जाग और पहचान अपने असल को। तू कोयले का टुकड़ा नहीं, बल्कि चमकता हीरा है। …
एकाग्रता
हुज़ूर के सत्संग दौरे
समझदारी-भरे जवाब
अंतर का प्रकाश
दिल से दिल की बात
एक बार किसी ने महाराज जी से विनती की कि आप अपने परिवार, विशेष तौर पर अपने पिता जी के बारे में …
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नए साल का संदेश
आप ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। ज्ञान आपके अन्दर है। शब्द-धुन ही वह ज्ञान है। आप इसका अभ्यास जितना ज़्यादा करेंगे उतने ही ज़्यादा ऊँचे जायेंगे और ज्ञानी बनेंगे। यह ज्ञान सचखण्ड में जाकर पूर्ण होता है। इसलिए पहले आप सुमिरन के ज़रिये ख़याल को समेटिए और अन्दर लाइए। तीसरे तिल में बैठिए और घण्टे की आवाज़ को पकड़िए और इसके सहारे पाँचवें मण्डल (सचखण्ड) तक पहुँचिए। यह मार्ग शुरू में लम्बा और नीरस लग सकता है, लेकिन इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। परमात्मा एक है और उससे मिलने की राह भी एक ही है और वह है – शब्द-धुन।
रास्ता आपके अन्दर है, शब्द-धुन ही वह सीधी सड़क है। ख़ुद परमात्मा हमारे अन्दर है। जो अन्दर गये हैं सिर्फ़ वे ही इस बात को समझ सकते हैं और इसकी क़द्र कर सकते हैं। अन्य लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। नाम के सुमिरन के ज़रिये फैले हुए मन को अन्दर लाइए और गुरु की मदद से शब्द-धुन को पकड़िए तथा मन और माया के देश को पार करके अपने घर सचखण्ड पहुँच जायें, जहाँ हमेशा आनन्द ही आनन्द है।
सिर्फ़ इनसान को ही ऊपर जाने का अधिकार है। किसी दूसरे जीव को, यहाँ तक कि देवी देवताओं को भी यह हक़ हासिल नहीं है। इनसान सृष्टि का सिरमौर (अशरफ़-उल-मख़्लूक़ात) है। इसलिए वक़्त का हर एक पल क़ीमती है और इनसान का यह फ़र्ज़ है कि वह अपने वक़्त का सही इस्तेमाल करे। सिर्फ़ इस राह में बिताये गये वक़्त का ही लेखा होता है। नये साल के मौक़े पर मेरा यही सन्देश है कि आपसे जितनी ज़्यादा हो सके शब्द की कमाई कीजिए, ताकि आप ख़ुद ईसा मसीह के दर्शन करें। शब्द आपको स्थायी शान्ति तथा आनन्द के धाम में पहुँचा देगा।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
बेहद ज़रूरी
हम इस दुनिया में ख़ुश नहीं हैं, यही कारण है कि हम तितली बनने का सपना देखते हैं – यही वजह है कि आत्मा मुक्त होने का सपना देखती है। हम इस जीवन रूपी सपने में क्यों रहना चाहेंगे जब हम ‘दाओ’ में अनंत काल तक रहने का आनंद प्राप्त कर सकते हैं?
इंट्रोडक्शन टू द दाओ
अपने जीवन को संत-महात्माओं के उपदेश के अनुसार ढालने के लिए समय और दृढ़ संकल्प का होना ज़रूरी है ताकि हम हर पल रूहानी जीवन जी सकें। शिष्य होने के नाते अपने स्रोत में वापस समाने के लिए हमने इस मार्ग को चुना है और इस यात्रा के लिए अपनी अपेक्षाओं को नियंत्रित करना भी ज़रूरी है। हम कर्मों के परिणाम से बच नहीं सकते, हमें शारीरिक और मानसिक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। चूंकि दाओ या शब्द में विलीन होने से पहले बाक़ी बचे सभी कर्मों के हिसाब-किताब को चुकता करना आवश्यक है, इसलिए हमारी वापसी की यात्रा कठिन और कष्टदायक हो सकती है, भले ही ऊपरी तौर पर यह आसान दिखाई दे।
बहुत-से क़ैदी जेल में अपना समय समाज में वापस शामिल होने की तैयारी में बिताते हैं जैसे कि वे आगे पढ़ाई करते हैं, नए कौशल सीखते हैं, अपने प्रियजनों के साथ नाता मज़बूत करते हैं और उनका विश्वास जीतते हैं। अगर वे जेल में अपना समय रिहा होने के बाद अगले अपराध करने की योजना बनाने में बिता दें तो हम उन्हें मूर्ख ही समझेंगे। इसी तरह, यदि हम भजन-बंदगी करके हमेशा के लिए दुनिया के आवागमन के चक्र से मुक्ति पाने के बजाय जन्म-मरण के इस बंदीख़ाने में अपना जीवन उन गतिविधियों में बिताते हैं जो हमें यहीं बाँधे रखती हैं तो हमें समझदार कौन कहेगा?
मन को स्थिर करने और अपने कर्मों का भुगतान करने के लिए आजीवन किया जानेवाला संघर्ष हमें कईं बार हताश कर देता है ख़ासकर तब, जब कोई राहत नज़र नहीं आती। जहाँ कुछ लोग संघर्ष करना छोड़ देते हैं वहीं रूहानियत के मार्ग पर चलने वाले साधक आत्मसमर्पण कर देते हैं। संघर्ष करना छोड़ देने का मतलब है हार मान लेना जबकि आत्मसमर्पण में हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करने के बाद सतगुरु के आगे समर्पण कर देते हैं कि अब मैं सब कुछ आप पर छोड़ता हूँ। जैसे कि कहा जाता है, परमात्मा हमें वह नहीं देता जिसे हम सँभाल सकते हैं पर जो हमें दिया गया है उसे सँभालने में वह हमारी मदद करता है; इसलिए हमें इस विश्वास के साथ सुकून मिल सकता है कि अपने रूहानी अभ्यास में दृढ़ रहकर हम जन्म-मरण के इस चक्र से मुक्त होने की कोशिश कर सकते हैं। सच्चे दिल से की गई कोशिश हमारी रूह की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है जैसा कि नीचे दी गई कहानी में बताया गया है।
एक महिला को तितली का कोकून मिला और उसने देखा कि तितली अपने शरीर को कोकून से बाहर निकालने की कोशिश में किस तरह संघर्ष कर रही थी। आख़िरकार तितली ने कोशिश करना बंद कर दिया मानो जितनी कोशिश वह कर सकती थी, कर चुकी थी, वह अब और कोशिश नहीं कर सकती थी। महिला ने तितली की मदद करने का फ़ैसला किया और एक कैंची लेकर कोकून को काट दिया ताकि तितली आसानी से बाहर आ सके। तितली बाहर तो निकल आई और महिला उसे उम्मीद-भरी नज़रों से देखने लगी कि वह अपने पंख फैलाएगी और उड़ेगी। मगर इसके बजाय तितली का शरीर सूजा हुआ था और उसके पंख छोटे और सिकुड़े हुए थे जो उसके शरीर को सँभालने के लिए न तो बढ़े और न ही फैले। नतीजा यह हुआ कि तितली को अपना बाक़ी का जीवन इधर-उधर रेंगते हुए बिताना पड़ा और वह कभी उड़ने के लायक़ नहीं हो पाई। लेकिन नेकनीयत होने पर भी वह महिला जल्दबाज़ी में यह नहीं समझ पाई कि कोकून के छोटे से छेद में से निकलने का संघर्ष तितली के लिए कितना ज़रूरी था। तितली के शरीर में से द्रव्य को उसके पंखों तक पहुँचाने के लिए यह क़ुदरत का तरीक़ा था ताकि जब वह उस कोकून से आज़ाद हो तो उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाए।
इसी तरह, हमारी रूहानी तरक़्क़ी के दौरान सतगुरु दया-मेहर करके हमारी सँभाल करते हैं ताकि हम अपनी वापसी की यात्रा के लिए काफ़ी मज़बूत बन सकें। कठिनाइयों रहित जीवन व्यक्ति को पंगु बना देता है। हमें उतने समय के लिए और उतनी ही शिद्दत से संघर्ष करना पड़ता है, जितना हमारे लिए ज़रूरी है लेकिन हमारे लिए अंतर में क्या कुछ किया जा रहा है हम उसको नहीं देख पाते। मुश्किलों के दौरान, हमें यह समझना चाहिए कि जो कुछ हो रहा है, वह हमारी रूहानी उड़ान के लिए हमारे पंखों को मज़बूती देगा। इसलिए यह पूरी प्रक्रिया बेहद ज़रूरी है।
दो लकड़ियाँ
जब आपस में रगड़ी जाती हैं, आग पैदा करती हैं;
आग के पास रखने पर, धातु पिघल जाती है;
गोल चीज़ें अकसर घूमती हैं,
खोखली चीज़ें अधिकतर तैरती हैं।
यह उनका सहज स्वभाव है।इसलिए, जब बसंत की हवाएँ आती हैं,
तो वे समय पर बारिश लाती हैं;
और असंख्य चीज़ें उत्पन्न होती हैं
और पोषित होती हैं।
पंखदार जीव सेते हैं
और अपने अंडों से बच्चों को जन्म देते हैं,
स्तनधारी जीव गर्भ धारण करते हैं और
अपनी संतान को जन्म देते हैं।
पौधे और पेड़ खिलते हैं, …
असल में ऐसा होते हुए किसी ने कभी नहीं देखा
फिर भी कार्य पूरा हो जाता है।
हुआइनान्ज़ी, इंट्रोडक्शन टू द दाओ से उद्धृत
विचार करने योग्य
हमारा शरीर एक कोट के समान है जो जन्म के समय हमें काल से मिला था; एक दिन हमें इसे वापस लौटाना पड़ेगा। जो चीज़ किसी से उधार ली गई है, उसे वापस करते हुए हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिये। सत्संगी को इससे कहीं अच्छी अवस्था में जाना है। इस मोटे कोट से कहीं अच्छे वस्त्र पहनना है, तो फिर उसे टाट के वस्त्रों के बदले मख़मल का कोट लेने में घबराना क्यों चाहिये! और फिर अगर सत्संगी ने अपनी ज़िन्दगी में इस अन्तिम दिन के लिये तैयारी कर ली है, तो वह इस वस्त्र बदलने की घड़ी में कोई दु:ख नहीं उठाता, बल्कि एक दूल्हे के समान प्रसन्न रहता है।
महाराज सावन सिंह जी, प्रभात का प्रकाश
***
व्यापार में तथा जीवन के अन्य क्षेत्रों में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है। परंतु चिंता ने कभी किसी का कुछ नहीं सँवारा। प्रत्येक समस्या को निजी अनुभव, सांसारिक सूझबूझ तथा प्रेम और विश्वास से ही सुलझाना उचित है।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
***
तारा-मण्डल, सूर्य और चन्द्र को पार करके उस स्थान पर पहुँचने से पहले भी, जहाँ सतगुरु के नूरी स्वरूप का मिलाप होता है, कभी-कभी सतगुरु अपनी दया-मेहर से हमें दर्शन दे देते हैं। यह सब उनकी दया-मेहर पर निर्भर करता है। परन्तु इस महान् वरदान को हमेशा के लिये प्राप्त करने के लिये हमें तारा मण्डल, सूर्य और चन्द्र को पार करना होगा। ये नियम और क़ानून हम पर लागू होते हैं, सतगुरु पर नहीं। वे हमें जब चाहें दर्शन दे सकते हैं। एक चिथड़ों में लिपटा दरिद्र भिखारी अपनी मर्ज़ी से बादशाह के महल में नहीं जा सकता, पर बादशाह को अपने महल से उतरकर भिखारी की झोंपड़ी में जाने से कोई नहीं रोक सकता।
महाराज चरन सिंह जी, दिव्य प्रकाश
वह जो मेरे हृदय को ख़ुशी से सराबोर कर देता है
यह प्रश्न अकसर पूछा जाता है कि पूर्ण सतगुरु की पहचान कैसे की जाए?
हमने संतमत के साहित्य में पढ़ा है और सत्संगों में सुना है कि कुछ ऐसे विशेष लक्षण हैं जिनसे सच्चे संत की पहचान की जा सकती है। वे जीवों की भलाई के लिए संसार में आते हैं और उन्हें शिष्यों की धन-दौलत की चाह नहीं होती, वे अपनी कमाई पर निर्वाह करते हैं और शब्द-मार्ग का उपदेश देते हैं। इन विशेष लक्षणों द्वारा हमें बौद्धिक स्तर पर विश्वास हो जाता है कि गुरु पूर्ण हैं क्योंकि किसी भी रूहानी मार्ग या सफ़र पर चलने से पहले बुद्धि का संतुष्ट होना ज़रूरी है। हालाँकि सूफ़ी फ़क़ीर मनेरी कहते हैं:
यह ठीक नहीं है कि एक नया खोजी ख़ुदा के बंदों को अपनी कमज़ोर बुद्धि के तराज़ू में तौले या अपनी सीमित दृष्टि से यह देखने की उम्मीद करे कि कौन ख़ुदा से रिश्ता जोड़कर उसके क़रीब आ गया है!
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2
फिर एक जिज्ञासु यह कैसे जान पाएगा कि उसने अपने सतगुरु को खोज लिया है?
क्योंकि सतगुरु शब्द का देहधारी रूप है और हम भी शब्द का ही अंश हैं, इसलिए जब हम सतगुरु से मिलते हैं तो उनके साथ अपनापन महसूस होता है। कभी ऐसा लगता है कि हम पहले ही सतगुरु से मिल चुके हैं और कभी ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा से ही सतगुरु को जानते हैं। वास्तव में उच्च आध्यात्मिक स्तर पर हम सतगुरु का ही रूप हैं। किसी दूसरे का हमारे साथ इतना गहरा रिश्ता या संबंध कैसे हो सकता है? सतगुरु हमारा ही असली रूप है। अंतर केवल इतना है कि देहधारी सतगुरु यह जानते हैं कि उनका असली स्वरूप शब्द है, जब कि हमें इस सच्चाई का ज्ञान नहीं है।
हउ जीवा नाम धिआए
सतगुरु या सच्चे संत वे हैं जिन्होंने अपने अंतर में परमात्मा की पहचान कर ली है। उनकी सुरत जाग्रत हो चुकी होती है और वे परमात्मा के प्रेम से भरपूर होते हैं। वे हमारे अंदर उस प्यार को जगाने के लिए आते हैं मगर हम अपने सीमित दायरे के कारण उस अथाह प्यार का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते।
एक अन्य सूफ़ी इब्न ख़फ़ीफ़ लिखते हैं कि (आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2 से उद्धरित) जिज्ञासु को ऐसे मुर्शिद की तलाश करनी चाहिए “जिसे देखकर ख़ुदा याद आ जाए, जिसका प्रभाव दिल को छू ले और जो लफ़्ज़ों के ज़रिए नहीं बल्कि अपनी करनी के ज़रिए आपको सलाह दे।”
हम नहीं जानते कि परमात्मा कैसा दिखता है और कैसा लगता है। मगर हम इतना जानते हैं कि जब हम अपने सतगुरु के साथ होते हैं तब हम कुछ ऐसा महसूस करते हैं जो इस संसार से परे होता है, कुछ ऐसा जो हमें अंदर तक छू जाता है और हमें एहसास दिलाता है कि हम निज-घर के नज़दीक हैं।
सतगुरु का उपदेश उनके निजी अनुभव पर आधारित होता है इसलिए उनमें हमें बौद्धिक तौर पर संतुष्ट करके हमारा विश्वास दृढ़ करने का सामर्थ्य होता है। इस तरह, हमें सहज ही समझ आ जाता है कि वह प्रेम की साकार मूरत हैं इसीलिए हम उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। सतगुरु हमें समझाते हैं कि हम सब शब्द का रूप हैं, हम सब परमात्मा रूपी महासागर की बूँदें हैं। लेकिन यह केवल तभी होता है जब हम सतगुरु के वुजूद में से निकलने वाली प्रेम, सुकून और मुक्ति की तरंगों को अनुभव करने लगते हैं फिर हम सचमुच परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास करना शुरू कर देते हैं। सूफ़ी शायर शिरीन मग़रिबी अपने सतगुरु के बारे में लिखते हैं:
एक दिलकश नज़र के ज़रिए,
आपकी आँखें मेरे जैसी हज़ारों थकी-हारी रूहों को
वक़्त के झमेलों से छुटकारा दिलाने का वादा करती हैं।
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2
जब हम अपने गुरु के सामने होते हैं तब हम परम आनंद के इस स्रोत से उतना ही ग्रहण कर पाते हैं जितना हम ग्रहण करने के क़ाबिल होते हैं।
सतगुरु की मौजूदगी में हर कोई एक जैसा महसूस नहीं करता; हर कोई समान कशिश के साथ सतगुरु की ओर खिंचा नहीं चला आता। लेकिन जिस आत्मा को अपने सतगुरु की पहचान हो जाती है, वह निश्चित रूप से उनकी ओर खिंची चली आती है, फिर चाहे उसमें तड़प कम हो या बहुत अधिक–कशिश और प्रेम सदा होगा। असल में, धर्मग्रंथों में यह कहा गया है कि आपको पूर्ण सतगुरु मिल गए हैं या नहीं इस बात को जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका यह है कि आपको उनकी मौजूदगी में ख़ुशी महसूस होती है या नहीं?
सतगुरु को खोजने के लिये ठोस तथ्यों और आँकड़ों या विश्वसनीय भाषणों और तर्कों की आवश्यकता नहीं है; ज़रूरी यह है कि हमें उनकी मौजूदगी में आंतरिक ख़ुशी महसूस हो।
असल में, सतगुरु ही हमारी तलाश करते हैं। हम सोचते हैं कि सतगुरु की खोज करने के लिए हमारे पास थोड़ी-बहुत समझ है, लेकिन उनकी खोज करने और उनके साथ रहने की हमारी कोशिशें उतनी ही सीमित हैं जितना हमारे लिए उन्हें समझ पाना। सतगुरु हमें स्वयं अपनी ओर खींचते हैं; उन्हीं के प्यार की वजह से हम सुरक्षित महसूस करते हैं। उनकी मौजूदगी में हम जिस आनंद का अनुभव करते हैं, वह उस आनंद को और अधिक पाने के लिए प्रयास करने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं छोड़ते – इसी आनंद को वह ‘शब्द’ कहते हैं।
क्या आप जानते हैं?
जब मन में प्रेम के साथ सतगुरु याद आ गए, तो सब काम – परमार्थी और दुनिया के – अच्छे लगेंगे, मन में कोई तकलीफ़ नहीं होगी। आप जो व्यवहार के काम भी करेंगे, (उनका भी) परमार्थी फल होगा जी।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1
***
सन्तजन भूत, भविष्य और वर्तमान – तीनों का पूरा ज्ञान रखते हैं। आपको जब आन्तरिक अनुभव होगा, तो आप इनके बारे में जानने लगेंगे। ज्ञान का भण्डार आपके अन्दर है। शब्द-धुन ही भण्डार है, जो ज्ञान का स्रोत है। आपकी आत्मा शब्द-धुन के द्वारा जितनी चढ़ाई करेगी, उतना ही ज़्यादा ज्ञान प्राप्त करेगी। वह ज्ञान आपका अपना अनुभव होगा।
लेकिन इस ज्ञान को अपने या दूसरों के दुनियावी मामलों को सुलझाने में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसे केवल अन्दर की तरक़्क़ी के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। अगर कोई इनसान इस शक्ति का इस्तेमाल दुनियावी कामों के लिए करने लगता है, तो मन बहिर्मुखी होकर फैल जाता है। इसके कारण साधक की उन्नति में केवल बाधा ही नहीं आती, बल्कि उसकी अन्दर की चढ़ाई भी बन्द हो जाती है।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
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जिसे आप कर्म का विधाता कहते हैं, यह सारा संसार उसी के वश में है। केवल पूरे सतगुरु तथा संत, जो अकालपुरुष प्रभु के प्रिय पुत्र होते हैं, इस बंधन से परे हैं। सतगुरु सदा समर्थ हैं और हर तरह के कर्मों को वश में कर सकते हैं, किंतु परमपिता की इच्छा के अनुसार ही वे ऐसा करते हैं। बाक़ी सारी सृष्टि कर्मों के क़ानून के अधीन है।
महाराज चरन सिंह जी, प्रकाश की खोज
सजग रहकर कर्त्तव्य निभाना
सिर्फ़ इसलिए कि हम बिना गैजेट्स, किताबों या कागज़ात के किसी कोने में चुपचाप बैठे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि भजन-बंदगी पूरे दिन की योजना बनाने, समस्याओं का हल खोजने, दिन में सपने देखने या फिर दिन-भर के कार्यों का जायज़ा लेने का समय है।
भजन-सिमरन के दौरान ऐसा महसूस हो सकता है कि हम कुछ ख़ास नहीं कर रहे लेकिन असल में हम अपने अंतर में सबसे गहन, महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी कार्य कर रहे होते हैं। दरअसल, यह कहा जा सकता है कि हम जितने भी काम करते हैं उनमें से यह सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है क्योंकि यह हमारे असल वुजूद – हमारी आत्मा – की बेहतरी के लिए है।
इसलिए इस कार्य को करने के लिए हमें दूसरे महत्त्वपूर्ण सांसारिक कार्यों की तुलना में बहुत अधिक सजग रहने और ध्यान देने की ज़रूरत पड़ती है। क्या हम अपनी भजन-बंदगी उतने ही ध्यान से करते हैं जितने ध्यान से हम चेक भरते हैं, दवाई खाते हैं, योजना बनाते हैं, किसी के बाल काटते हैं या खाना बनाते हैं?
क्या भजन-बंदगी में बैठने से पहले, हम ख़ुद को मानसिक रूप से उस कार्य के लिए तैयार करते हैं जो हम करनेवाले हैं या फिर हम पहले जिस काम में तल्लीनता से लगे थे उसे एकदम से छोड़कर बस एक कोने में बैठ जाते हैं? चूँकि भजन-बंदगी की विधि सरल है मगर इसका यह मतलब नहीं है कि यह वाकई आसान है। दिन के सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य को करने से पहले हमें ख़ुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए।
हमारा मन अकसर तरह-तरह के ख़यालों की वजह से भटक जाता है और भजन-बंदगी अपने ख़याल को बार-बार तीसरे तिल पर वापस लाने का अभ्यास है। मन ऑटो पायलट मोड पर काम करता है और जहाँ चाहता है, हमें ले जाता है। रूहानी अभ्यास के ज़रिए इस ऑटो पायलट मोड को बंद किया जा सकता है और मन की लग़ाम को अपने हाथों में लिया जा सकता है।
तिब्बती गुरु जमयांग ख्येंत्से द्वारा अपने शिष्य अपा पंत को दी गई निम्नलिखित हिदायत इस बात को स्पष्ट करती है:
“देखो, यह कुछ इस तरह है: जब पिछला विचार ख़त्म हो जाए और अगला विचार अभी तक उठा न हो तब क्या बीच में अंतराल नहीं आता?”
“जी” अपा पंत ने कहा।
“तो, उसे बढ़ाओ। वही भजन-बंदगी है।”
द टिबेटन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग
मन ने तो भटकना ही है और जब यह भटके तो बिना किसी आक्रोश के, हमें सिर्फ़ इतना समझ लेना चाहिए कि वह भटक गया है और उसे आराम से उसके ठिकाने पर वापस ले आना चाहिए। भजन-सिमरन के दौरान भले ही हमारा शरीर आरामदायक आसन में हो लेकिन हमारा मन पूरी तरह से सजग रहना चाहिए; इसे तीसरे तिल पर स्थिर करके निरंतर पाँच नाम का सिमरन करते रहना चाहिए।
अपने भजन-सिमरन को पूरी निष्ठा से करने के लिए हमें उस पल में पूरी तरह से मौजूद रहना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हम अपना सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं और इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं। जब हम भजन-सिमरन करते हैं तब हम अपना कर्त्तव्य सजग रहकर निभा रहे होते हैं – जैसे फ़ौजी सीमा पर तैनात रहते हुए चौकस, शस्त्रों से लैस और हमला करने के लिए तैयार रहते हैं। हम यक़ीनन रिज़र्व ड्यूटी पर नहीं होते जो किसी कार्य के लिए बुलाए जाने का इंतज़ार करते रहें या इस इंतज़ार में रहें कि हमारा ध्यान अपने आप केंद्रित हो जाए।
यह मन के साथ एक बहुत बड़ी लड़ाई है।…हमारा दुश्मन हम सब के अंदर ही है।…हम यह भी नहीं जानते कि वह कब हमें धोखा दे दे, कब हमारे साथ छल-कपट करके रास्ते से भटका दे।…इस तरह यह मन के साथ हमारा लगातार चलनेवाला संघर्ष है। हमें हमेशा चौकस रहना है और हर रोज़, हर पल इसकी गतिविधियों पर निगरानी रखनी है।…अगर हम संघर्ष करते रहेंगे, इसे जारी रखेंगे तो आख़िरकार जीत हमारी ही होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
भजन-सिमरन के दौरान, पूरी तरह से सजग रहकर हम अपने ध्यान को केंद्रित करने की क़ुदरती क़ाबिलीयत को विकसित कर रहे होते हैं। इस सजगता से हम इस लायक़ बन जाएँगे कि हमें अपने जीवन में सतगुरु की मौजूदगी का एहसास होगा; इससे हम अपनी कमियों और उन चीज़ों के प्रति सजग होंगे जिन पर ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सजगता जीवन की समस्याओं को लेकर हमारे नज़रिए को बदल देगी और हमें इस आरज़ी, मायामय संसार के बंधनों से ऊपर उठने में मदद करेगी। सचेत होकर किए गए भजन-सिमरन का हर पल मन को वश में करने के संघर्ष को जारी रखने और आख़िरकार सतगुरु के नूरी स्वरूप में समाने के क़ाबिल बनाता है।
तीसरे तिल में पहुँचना, तारा-मण्डल, सूर्य और चन्द्र को पार करना, गुरु के नूरी स्वरूप का दर्शन करना शिष्य का कर्तव्य है, चाहे वह इस ज़िन्दगी में पहुँचे या दूसरी ज़िन्दगी में। यह उसका काम है और उसे ही करना है, तो फिर क्यों न इसे अभी किया जाये, रोके क्यों रखा जाये?
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
जीते-जी मरना
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या
हर किसी ने एक न एक दिन इस संसार को छोड़कर जाना है। क्या इनसान क्या हैवान, क्या अमीर क्या ग़रीब, क्या तंदुरुस्त क्या बीमार; मौत से कोई नहीं बच सकता। मृत्यु के द्वार से सबको गुज़रना पड़ता है। जो आत्मा देह में आई है उसे एक दिन इस देह का त्याग करना पड़ेगा। हम सब जानते हैं कि एक दिन हमें इस संसार से ज़रूर चले जाना है, पर यह नहीं पता कि कब।
मरना सत्य है, मगर जीना (इस संसार में) झूठ है। “शरीर मिट्टी है और इसने एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है।” मृत्यु के बाद का सफ़र कैसा होगा, इसके बारे में हमने कभी सोचा तक नहीं। हम दूसरों के मरने पर रोते हैं। पर असल में हमें अपनी मौत की चिंता करनी चाहिए और मृत्यु के बाद के जीवन के लिए तैयारी करनी चाहिए।
मौत क्या है? क्या हमें मौत के समय पीड़ा होती है? इस पीड़ा के बारे में श्रीमद् भागवत् में ज़िक्र है कि मृत्यु के समय शरीर से निकलने में आत्मा को इतनी पीड़ा होती है जितनी एक लाख बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने पर होती है। क़ुरान शरीफ़ में कहा गया है, “मौत के समय होनेवाली पीड़ा की तुलना उस पीड़ा से की जा सकती है जो किसी काँटेदार झाड़ी के शरीर में ज़ोर से घुसने पर होती है।” आदि ग्रंथ में भी मौत की पीड़ा के बारे में कुछ संकेत दिए गए हैं।
मौत के बाद हमें किन राहों में से गुज़रना पड़ेगा? वहाँ हमारा वास्ता किन के साथ पड़ेगा? इस पर विचार करना ज़रूरी है। ग्रंथ-पोथियों में इसके बारे में कुछ वर्णन मिलते हैं, पर हम उन्हें कल्पित कथाएँ समझकर उन पर ध्यान नहीं देते। शायद हम यह समझते हैं कि यह जीव को पाप कर्म करने से रोकने के लिए हैं या उन्हें शुभ कर्म करने के लिए प्रेरित करने के लिए हैं। हमें मौत के द्वार से गुज़रना पड़ेगा। इससे कोई भी बच नहीं सकता। सेंट पॉल कहते हैं: “मौत वह अंतिम शत्रु है जिस पर हमें विजय प्राप्त करनी है।” हमें इस विषय पर आँखें नहीं मूँद लेनी चाहिएँ।
हम सबका अनुभव है कि अगर हमें किसी दूसरे देश में सफ़र पर जाना हो तो हम उसके लिए तैयारी करते हैं, साथ में ज़रूरी ख़र्च का भी प्रबंध कर लेते हैं। उस जगह पहुँचने के लिए हम ताँगे, मोटरगाड़ी या रेलगाड़ी में जाने का इंतज़ाम करते हैं। उस देश में किसी मित्र को पत्र लिखते हैं और वहाँ ठहरने का इंतज़ाम भी कर लेते हैं। सांसारिक मामलों में तो हम इतने समझदार हैं कि बिना सोचे-समझे कभी कोई यात्रा नहीं करते। जब हमें किसी नए देश में जाना हो तो हम वहाँ किसी मार्गदर्शक को साथ लेने का इंतज़ाम भी करते हैं। मगर मौत के बाद के सफ़र, जिसका ख़तरा सबके सिर पर मँडरा रहा है और अपनी बारी आने पर जिसका सामना सभी को करना पड़ेगा, उसके बारे में हम थोड़ी-सी भी फ़िक्र नहीं करते। इस सफ़र को तय करने के लिए नाम या शब्द रूपी भोजन की ज़रूरत है क्या हमने उसका इंतज़ाम कर लिया है? क्या हमने कोई ऐसा रहबर या सतगुरु ढूँढ़ लिया है जिसे मार्ग का ज्ञान है और जो ख़ुद मार्ग पर चल चुका है, जो हमारे साथ चले? हमें वहाँ जाकर कहाँ रहना है, क्या हमने कभी इस बारे में विचार किया है? ये बातें तो एक ओर रहीं, हमें तो यह भी पता नहीं कि हमें जाना कहाँ है और वहाँ कौन हमारी सहायता कर सकता है; यहाँ तक कि हम तो मौत को ही भुलाए बैठे हैं।
सांसारिक कार्य-व्यवहार में तो हम बड़े होशियार हैं और हर काम को सफलतापूर्वक करने के लिए उचित इंतज़ाम करते हैं। लेकिन मृत्यु जिसका समय निश्चित नहीं है और जो किसी भी समय आ सकती है – बचपन में, जवानी में या बुढ़ापे में – उसके बारे में हमने कभी एक पल के लिए भी विचार नहीं किया।
मौत के बारे में केवल सतगुरु को पूर्ण ज्ञान होता है। मृत्यु के समय, जब परिवार और बाल-बच्चे, हमारी धन-दौलत, ज़मीन-जायदाद और शरीर सब साथ छोड़ देते हैं तब संत-सतगुरु अपने शिष्य के साथ-साथ चलते हैं। वह जीव के सच्चे और भरोसेमंद साथी होते हैं।
पूर्ण सतगुरु मृत्यु के उस पार सूक्ष्म, कारण और निर्मल रूहानी मंडलों के सच्चे रहनुमा होते हैं। इसीलिए धर्म-ग्रंथों में किसी ऐसे सतगुरु से मिलाप और मन ही मन उनका ध्यान करने पर बहुत बल दिया गया है। ऐसा करने पर ही हम जन्म-मरण की जड़ को काटकर चिरस्थायी आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
संत-महात्माओं ने मौत की पहेली को सुलझा लिया है। वे प्रतिदिन अपनी मर्ज़ी से ऊँचे रूहानी मंडलों की सैर करते हैं। उनकी संगति में जाकर हम भी मृत्यु पर जीत हासिल करने की युक्ति सीख लेते हैं।
मौत से डरनेवाली कोई बात नहीं। यह सिर्फ़ आत्मा के शरीर को छोड़ जाने का नाम है। इस स्थूल शरीर को त्यागकर आत्मा सूक्ष्म, कारण और उनसे भी ऊपर के मंडलों में चली जाती है। इसे फ़ारसी भाषा में ‘इंतकाल’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘तबदील हो जाना।’ यह हमारी आत्मा का स्थूल इंद्रियों को छोड़कर सूक्ष्म मंडलों में प्रवेश करना है। यह सिर्फ़ शरीर रूपी इस चोले को छोड़ देना है। यह कोई नेस्तो-नाबूद हो जाना या बिलकुल नष्ट हो जाना नहीं है। मृत्यु के बाद भी जीवन क़ायम रहता है, हालाँकि हम उसे देख नहीं पाते। सभी संत-महात्मा इस सिद्धांत को स्वीकार करते हैं।
महाराज सावन सिंह जी, फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ द मास्टर्ज़, वॉल्यूम I
निष्काम कर्म
निस्स्वार्थ सेवा संतमत की रूहानी शिक्षाओं का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। दरअसल, सभी आध्यात्मिक मार्ग अपने शिष्यों को किसी भी रूप में मानवता की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह सेवा पूरी तरह से स्वैच्छिक है और अपनी क्षमता के अनुसार की जा सकती है।
सभी महान व्यक्तियों ने अपने जीवन में इस सिद्धांत का पालन किया है कि ख़ुशी देने में है, लेने में नहीं। बिना किसी फल की इच्छा के, निस्स्वार्थ भाव से किसी दूसरे की सेवा करने को ही भगवद् गीता में निष्काम कर्म या इच्छारहित कर्म कहा गया है।
सतगुरु अकसर हमें बताते हैं कि संतमत में हर बात का एक समानांतर होता है। बाहरी सत्संग, सेवा, दर्शन – ये सभी आख़िर में हमें आंतरिक अनुशासन की ओर ले जाने के लिए हैं। भजन-सिमरन के अलावा बेशक़ बाहरी सेवा एक शिष्य की रूहानी यात्रा में सबसे अधिक फ़ायदेमंद और संतोषजनक कार्य है लेकिन यह केवल एक ज़रिया है, अंत नहीं।
मानवता की वास्तविक सेवा क्या है?
युगों-युगों से पुनर्जन्म के चक्कर में फँसी आत्मा को आवागमन से आज़ाद कराना और उसको उन निर्मल रूहानी मण्डलों में पहुँचाना जहाँ से वह फिर जन्म-मरण के चक्कर में वापस न आये। बाक़ी सभी सेवाएँ अस्थायी हैं।…सबसे पहले आप अपनी सेवा करें, फिर बाक़ी लोगों की सेवा करने की सोचें। एक क़ैदी दूसरे क़ैदी को आज़ाद नहीं कर सकता।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
तन, मन और धन की सेवा अपने अंदर उच्च गुणों को पैदा करने के लिए की जाती है। इनमें से हर सेवा हमारे अंदर विनम्रता पैदा करती है, हमें धन-दौलत के लोभ और पद्वियों के अहंकार से मुक्त करती है और हमारी बेक़ाबू प्रवृत्तियों और इच्छाओं पर क़ाबू पाने में मदद करती हैं। हालाँकि, ये सब सेवाएँ उस सर्वोत्तम सेवा – सुरत-शब्द की सेवा – की तैयारी हैं जिसे करने के लिए यह मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है।
मनुष्य के लिए सबसे उत्तम सेवा या निष्काम कर्म अपनी सुरत को शरीर के नौ द्वारों में से समेटकर ऊपर तीसरे तिल पर इकट्ठा करना है। यहाँ सुरत सृष्टि में निरंतर गूँज रहे शब्द के साथ जुड़ जाती है। यह दिव्य मिलाप आत्मा या सुरत को मन और शरीर के भ्रम से बाहर खींचना शुरू कर देता है; उसके बाद ही आत्मा का अपने निज-घर, अपने रचयिता की ओर असल रूहानी सफ़र शुरू होता है।
हरि और गुरु की सेवा केवल वही कर सकता है जिस पर मालिक की अपार दया हो।…गुरु की सेवा उसको मिलती है जिसके धुर का भाग्य (लेख) हो…जो सतगुरु की सेवा में लगा है वह बड़ा भाग्यशाली है। सतगुरु में मालिक समाया हुआ है।
महाराज सावन सिंह जी, गुरुमत सिद्धांत, भाग 2
संत-सतगुरु सबसे बड़ी सेवा या निष्काम कर्म करते हैं। वह हमें परमात्मा के ‘शब्द’ (नाम) का भेद देते हैं, जो अहंकार को नष्ट कर देता है; यही ‘शब्द’ मन और शरीर को निर्मल करता है और हमें परमात्मा से मिलाप के क़ाबिल बनाता है। पूर्ण संत-सतगुरु शिष्य को दीक्षा देते हैं और उसे रूहानी अभ्यास या भजन-बंदगी – परमात्मा के नाम के सिमरन और ध्यान – के लिए प्रेरित करते हैं।
संत-महात्मा परमात्मा के प्रेम और भक्ति में लीन रहते हैं; वह अपनी सुरत को परमात्मा में अभेद कर चुके होते हैं; और अब वह दूसरी जीवात्माओं को निज-घर पहुँचाने की परमात्मा द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी को पूरा करने में जुटे हैं जोकि किसी के द्वारा की जानेवाली सर्वोत्तम सेवा है।
गुरु अर्जुन देव जी ने फ़रमाया है:
संत की सेवा नामु धिआईऐ॥
आदि ग्रंथ
सतगुरु के निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना और परमात्मा के नाम का ध्यान करना ही सबसे बड़ा दान या निष्काम कर्म है। इस निरंतर अभ्यास द्वारा हमारी सुरत अंदर लगातार गूँज रहे शब्द में समा जाती है।
सतगुर की सेवा सफल है जे को करे चित लाए॥
नाम पदारथ पाईऐ अचिंत वसै मन आए॥
गुरु अमरदास जी, आदि ग्रंथ, सेवा पुस्तक से उद्धरित
ख़ुश रहें
जीवन के उतार-चढ़ाव के बावजूद ख़ुश रहना एक आदर्श रूहानी जीवन की पहचान है।
संतमत में हमारा मिलाप ऐसे सतगुरु से होता है जो हमें रूहानियत के सच्चे पहलुओं के बारे में बताते हैं। हमें शब्द-धुन या नाम के बारे में पता चलता है जिसे हम भजन-सिमरन द्वारा अनुभव कर सकते हैं। हमारे असल स्वरूप की खोज हमारे रहन-सहन में बदलाव से शुरू होती है जिसमें नामदान के समय दिए गए वचनों का पालन करना – शाकाहारी भोजन खाना, शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थों से परहेज़ करना और नैतिक जीवन जीना – शामिल है। जब नामदान की बख़्शिश होने पर हमें सतगुरु द्वारा सिखाई गई युक्ति के मुताबिक़ भजन-बंदगी करने का मौक़ा मिलता है तब वह इस रूहानी सफ़र में हमारे रहनुमा बनते हैं।
सतगुरु हमारा साथ कभी नहीं छोड़ते। हम जानते हैं कि वक़्त चाहे अच्छा हो या बुरा, सतगुरु हमेशा हमारे अंग-संग हैं और वह इस मार्ग पर हर क़दम पर हमारी मदद कर रहे हैं। हमें उनकी दी हुई दातों और नाम की बख़्शिश के लिए हरदम शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि निस्संदेह यह अनमोल ख़ज़ाना है।
मालिक हमें जैसे भी, जिन हालात में भी रखता है, हमें ख़ुश रहने की कोशिश करनी चाहिये। जो कुछ भी वह दे, हमें उसकी दया-मेहर समझकर ग्रहण करना चाहिये। इसी लिये हज़रत ईसा ने कहा था: तुम छोटे बच्चे की तरह बनो। आप उसे खेलने के लिये एक पत्थर भी देते हो तो भी वह ख़ुश हो जाता है और अगर आप उसे खेलने के लिये हीरा देते हो तो भी वह ख़ुश रहता है। वह पत्थर और हीरे में फ़र्क़ नहीं करता। इसलिये चाहे सर्द हवा चल रही हो या गरम, हमें भी ज़िंदगी की घटनाओं में फ़र्क़ नहीं करना चाहिये। जिस हाल में मालिक रखे हमें उसी में ख़ुश रहना चाहिये।
हमारा ऐसा नज़रिया तभी बन सकता है, जब हम नियमपूर्वक भजन-सिमरन करते हैं। केवल भजन-सिमरन के द्वारा ही हम अपने अंदर वह शांति क़ायम कर सकते हैं और फिर दूसरों के साथ भी वह सुख-शांति बाँट सकते हैं। आप किसी दु:खी इनसान के पास जाते हैं, तो वह आपको दो मिनट में दु:खी कर देगा। लेकिन अगर आप किसी ख़ुशमिज़ाज इनसान के पास जाते हैं, तो चाहे आप कितने भी दु:खी क्यों न हों, आप उसके पास से हँसते-मुस्कराते हुए वापस आयेंगे, क्योंकि हम दूसरों को वही देते हैं जो हमारे पास है, हम वही बाँटते हैं जो हमारे पास है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
हर बार जब हम भजन-बंदगी में बैठते हैं तब हमें दिव्य अमृत का आनंद लेने का मौक़ा मिलता है और यही वह शक्तिशाली साधन है जिसके ज़रिए हमारे अंदर बदलाव आता है और हम निर्मल होते हैं। हम पहले से कहीं बेहतर इनसान बन जाते हैं क्योंकि भजन-सिमरन से हमें अपने विकारों पर क़ाबू पाने की ताक़त मिलती है और जीवन के प्रति हमारा नज़रिया बदल जाता है। हम सचमुच ख़ुश रहने लगते हैं चाहे हमारे हालात कैसे भी क्यों न हों। इसके अलावा, महाराज चरन सिंह जी हमें याद दिलाते हैं कि यह दुनिया सिर्फ़ एक रंगमंच है जहाँ हम अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं:
अपने पार्ट को अच्छी तरह निभाकर हम ज़िंदगी की स्टेज पर अच्छे कलाकार बन सकते हैं। हमारे भाग्य में जो कुछ भी लिखा है उसे मालिक की मौज समझकर ख़ुशी-ख़ुशी मंजूर कर लेना चाहिये और आप यह तभी कर सकते हैं, जब आप नियमपूर्वक भजन-सिमरन करते हैं। कोई दूसरा तरीक़ा नहीं है। लेकिन हम अपने आप को उस रोल से जोड़ लेते हैं और इसे ही सच समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम केवल अपना रोल निभा रहे हैं। इसलिये हमें हमेशा यह बात याद रखनी चाहिये कि यह केवल ऐक्टिंग है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। हमें इस बात का एहसास ज़रूर होना चाहिये और यह केवल भजन-सिमरन से ही हो सकता है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है। नहीं तो हम नाटक के दूसरे पात्रों में उलझकर रह जाते हैं।
संत संवाद, भाग 3
यह दुनिया सिर्फ़ एक रंगमंच है जहाँ हम सब अपने प्रारब्ध के अनुसार मिली हुई भूमिका को निभा रहे हैं। यह सब एक भ्रम है इसलिए हमें अपनी भूमिकाओं में बहुत ज़्यादा नहीं खो जाना चाहिए क्योंकि इनमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर हम इस बात को ज़हन में रखें तो फिर हम चाहे कोई भी भूमिका निभाएँ, हम हमेशा उसमें ख़ुश रहते हैं। आख़िरकार, यह बस एक भूमिका ही तो है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। फिर हमें जो भी मिलता है, हम उसी में संतुष्ट रहते हैं। हमें अपनी और अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हमारे लिए मुश्किलें और समस्याएँ बढ़ जाती हैं जैसा कि नीचे दी गई कहानी में बताया गया है।
जंगल में एक कौआ रहता था और अपनी ज़िंदगी से पूरी तरह संतुष्ट था। लेकिन एक दिन उसने एक हंस को देखा। उसने सोचा, “यह हंस तो बहुत सफ़ेद है और मैं कितना काला हूँ। यह हंस दुनिया का सबसे ख़ुश पक्षी होगा।”
उसने जब हंस को अपने इस विचार के बारे में बताया। हंस ने जवाब दिया, “असल में, मुझे लग रहा था कि मैं सबसे ख़ुश पक्षी हूँ जब तक मैंने तोते को नहीं देखा था, जिसके दो रंग हैं। अब मुझे लगता है कि तोता ही इस संसार में सबसे ख़ुश पक्षी है।” फिर कौआ तोते के पास गया। तोते ने बताया, “मैं बहुत ख़ुशी-ख़ुशी जीवन जी रहा था, जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था। मैं तो सिर्फ़ दो रंग का हूँ लेकिन मोर के पास तो बहुत-से रंग हैं।”
फिर कौआ चिड़ियाघर में एक मोर के पास गया और उसने देखा कि मोर को देखने के लिए सैकड़ों लोग जमा थे। जब लोग चले गए तब कौआ मोर के पास आया।
कौए ने कहा, “प्रिय मोर, तुम कितने सुंदर हो। तुम्हें देखने के लिए हर रोज़ हज़ारों लोग आते हैं। जब लोग मुझे देखते हैं तब मुझे तुरंत भगा देते हैं। मुझे लगता है कि तुम दुनिया के सबसे ख़ुश पक्षी हो।”
मोर ने जवाब दिया, “मैं हमेशा सोचता था कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और ख़ुश पक्षी हूँ। लेकिन मेरी सुंदरता की वजह से मुझे इस चिड़ियाघर में बंद कर दिया गया है। मैंने चिड़ियाघर को बड़े ग़ौर से देखा है और मैंने पाया है कि कौआ ही एकमात्र ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में नहीं रखा गया है। इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं यह सोच रहा हूँ कि अगर मैं एक कौआ होता तो मैं ख़ुशी से हर जगह घूम सकता था।”
जब हम दूसरों के साथ बेवजह तुलना करने लगते हैं तब हम ख़ुद ही अपने दु:ख का कारण बन जाते हैं और परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया है, हम उसकी क़द्र नहीं कर पाते। इसी कारण दु:खों का कभी न समाप्त होनेवाला सिलसिला शुरू हो जाता है।
उन चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय, जो हमारे पास नहीं हैं, हम उन चीज़ों के साथ भी ख़ुश रह सकते हैं जो हमारे पास हैं। इस दुनिया में हमेशा कोई न कोई ऐसा ज़रूर होगा जिसके पास हमसे ज़्यादा या हमसे कम होगा।
दुनिया में जो व्यक्ति संतुष्ट रहता है, वही सबसे अधिक सुखी है। हमें इस जीवन में और रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए प्रसन्नचित्त और ख़ुश रहना चाहिए। हमें अपने असली मक़सद को कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमें इसी जन्म में वापस अपने रूहानी स्रोत में समाना है जैसे बूँद सागर में समा जाती है।
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संतोष क्या है? अपने प्रारब्ध को ख़ुशी-ख़ुशी भोगना, कोई इच्छा न रखना और परमात्मा के आगे किसी दुनियावी पदार्थ के लिये प्रार्थना न करना। हमें चाहिये कि वह जो भी दे उसी में ख़ुश रहें, जीवन में हमेशा संतुष्ट रहें, इस रचना में अपने जीवनरूपी नाटक को एक दर्शक की तरह देखते रहें यानी वह हमें जो कुछ भी दे, उसी में संतुष्ट रहें, दूसरे शब्दों में हम परमात्मा की रज़ा में रहें, यह भी संतोष है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए चुनिंदा सवाल-जवाब
प्रश्न: अगर आपने भक्ति और भजन-सिमरन नहीं किया तो क्या फिर भी मृत्यु के समय सतगुरु आपको लेने के लिए आएँगे?
उत्तर: बहन जी, ईसा मसीह ने दो बातें कही हैं। वह फ़रमाते हैं कि जब तुम पुत्र को देखोगे और उस पर विश्वास करोगे तब मैं तुम्हें अंतिम दिन जीवित कर दूँगा। ‘पुत्र को देखने’ का अर्थ है कि तुम एक देहधारी सतगुरु की संगति में जाओ। ‘उस पर विश्वास करो’ का अर्थ है कि अगर तुम उनकी शिक्षाओं का ईमानदारी से पालन करते हो तो वह तुम्हें अंतिम दिन जीवित कर देंगे। यदि तुम उनके उपदेश का पालन नहीं करते, उनके अनुसार जीवन व्यतीत नहीं करते, तो फ़ैसला उनका है कि वह आएँ या न आएँ। लेकिन अगर हम उनके उपदेश के अनुसार जीवन बिताते हैं और उसका पालन करते हैं तो फिर हम दावा कर सकते हैं। वरना यह केवल उनकी बख़्शिश है।
लाइट ऑन सेंट जॉन
प्रश्न: महाराज जगत सिंह जी की पुस्तक ‘आत्म-ज्ञान’ में हमने पढ़ा था कि एक शिष्य द्वारा दूसरे शिष्य की निंदा करना बहुत बड़ा पाप है। जो दूसरों की निंदा करता है उसे इसका क्या परिणाम भोगना पड़ता है?
उत्तर: सभी संत हमें एक ही बात समझाते आये हैं। क्राइस्ट ने भी कहा है कि तुम्हें अपनी आँख का शहतीर तो दिखाई नहीं देता लेकिन दूसरे की आँख का तिनका भी दिखाई देता है। सरदार बहादुर महाराज जी के कहने का अभिप्राय था कि दूसरों की निंदा करने के बदले हमें अपनी निंदा करनी चाहिये कि हममें वह कौन-सी कमी है जिसके कारण हमारा किसी के साथ गुज़ारा नहीं होता। अगर कोई हमें सहयोग नहीं दे रहा तो इस बात के लिये उसकी निंदा करने के बजाय हमें ही दूसरों को सहयोग देना चाहिये। हमें परिस्थिति के अनुसार अपने आप को ढालना होगा, परिस्थिति हमारे मुताबिक़ नहीं ढल सकती। दूसरों से अच्छे व्यवहार की आशा करने के बजाय हमें ख़ुद दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये। हमारी दूसरों से हमेशा यही अपेक्षा रहती है कि वे हमारे साथ शालीनता से पेश आयें और उनका व्यवहार मित्रतापूर्ण तथा प्रेम से भरा हुआ हो। लेकिन हम यह नहीं समझते कि उस सबकी शुरुआत हमें ही करनी होगी। उनके कहने का यही अभिप्राय है कि अपने अंदर झाँके बिना और अपने दोष देखकर उन्हें सुधारने के बजाय, बेवजह किसी की निंदा करना पाप है। जीज़स क्राइस्ट का उपदेश, भाग 2, (सेंट मैथ्यू)
प्रश्न: क्या प्यार में आकर सतगुरु के पीछे-पीछे दौड़ना भी वैसे ही है जैसे कि अपने आंतरिक अनुभवों और अपनी प्रीति और भक्ति की भावनाओं को बाहर प्रकट करना?
उत्तर: देहस्वरूप सतगुरु के पीछे दौड़ने और सतगुरु से प्रेम करने में बहुत अंतर है। गुरु के पीछे-पीछे दौड़ने का मतलब यह नहीं कि आपको गुरु से प्यार है। संभव है कि आप अंदर प्यार से ख़ाली हों और फिर भी गुरु के पीछे दौड़ रहे हों। और यह भी हो सकता है कि आप सतगुरु के प्यार से भरे हुए हों और फिर भी अपने स्थान से इंच भर भी न हिलें। अगर आप अनुशासन में रहना पसंद करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपके अंदर प्रेम नहीं है। गुरु के पीछे दौड़ना कोई बहुत प्यार तो प्रकट नहीं करता।
सच्चा प्रेम हमेशा अंतर में होता है। जब आप प्यार का प्रदर्शन करने की कोशिश करते हैं तो उसकी गहराई खो देते हैं। आपको चाहिए कि उस प्रेम को अपने अंदर हज़म करें। बाहरी प्रदर्शन से उसकी गहराई ख़त्म हो जाती है।
जीवत मरिए भवजल तरिए
प्रश्न: महाराज जी, मुझे बताया गया है कि यदि कोई बहुत भारी शारीरिक परिश्रम करता है और बहुत थक जाता है तो उसके लिए शरीर से चेतना को समेटना ज़्यादा मुश्किल होता है।
उत्तर: मैं नहीं समझता कि शारीरिक कार्य या परिश्रम का और शरीर को ख़ाली करके ख़याल को ऊपर लाने का कोई आपसी संबंध है। असल में इनका कोई संबंध नहीं है। इंद्रियों के भोगों का मोह ही आँखों के पीछे एकाग्र होने में रुकावट डालता है। कठिन परिश्रम इसमें कोई अड़चन नहीं डालता, क्योंकि परिश्रम शरीर करता है, मन नहीं। क्या आपके ख़याल से ऐसे दुर्बल व्यक्ति, जो कोई शारीरिक कार्य नहीं करते, आसानी से अपने ख़याल को समेट लेते हैं?
जो लोग बहुत सख़्त मेहनत करते हैं, वे बहुत थक जाते हैं और उन्हें नींद पूरी किए बिना भजन के लिए बैठने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। शारीरिक परिश्रम करने या न करने से अंदर जाने में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
जीवत मरिए भवजल तरिए
अज्ञानता से जागरूकता की ओर
सच्चा रूहानी मार्ग प्रकाश का मार्ग है। परमात्मा का सार और हमारी आत्मा का सार भी निर्मल प्रकाश ही है। खनिज पदार्थ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, वायरस या बैक्टीरिया, यहाँ तक कि सूक्ष्म मण्डलों के जीव भी प्रकाश की इसी शक्ति द्वारा जीवित रहते हैं। हर एक ज़र्रे का आधार भी यही ज़बरदस्त शक्ति है।
लेकिन बार-बार यही सवाल खटकता है कि हम बाहर इस संसार में सूर्य और प्रकाश देने वाले बहुत-से कृत्रिम साधनों का इतना प्रकाश देखते हैं तो फिर हमारी आत्माएँ रूहानी तौर पर अंधेरे में क्यों है? अगर हम परमात्मा का अंश हैं तो हम अपने अंदर उस प्रकाश की शक्ति का अनुभव क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
हीरा तो हीरा ही होता है। अगर उसे कीचड़ में फेंक दें तो उस पर कीचड़ लिपट जायेगा, पर जैसे ही उसे धोकर साफ़ कर लेंगे तो वही चमक वापस आ जायेगी। आत्मा एक हीरा है। हर आत्मा परमात्मा की अंश है। आत्मा अपने आप में निर्मल है, पर इसने मन का साथ ले लिया है और यह मन इंद्रियों का ग़ुलाम है। इसी कारण आत्मा भी अति गंदी और मैली हो चुकी है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
हुज़ूर महाराज जी अकसर बिजली के बल्ब का उदाहरण दिया करते थे। अगर आप बल्ब के ऊपर बहुत-से काले पर्दे लपेट दें तो उसकी रोशनी धुँधली पड़ जाती है। ठीक उसी तरह, यह कल्पना कर पाना भी मुश्किल है कि हमने रचना के आरम्भ से कितने कर्म इकट्ठे कर लिए हैं। एक के बाद एक इन काले पर्दों ने हमारी आत्मा के अलौकिक प्रकाश को छुपा दिया है।
आत्मा को सीमा में रहकर कार्य करना पड़ता है।…यह संसार इसका अपना घर नहीं है। यहाँ आत्मा को मन और भौतिक पदार्थों के कई आवरणों में रहकर, इनके ज़रिए कार्य करना पड़ता है।… हालाँकि मन उच्चकोटि का जड़ पदार्थ है लेकिन हम इसे जड़ पदार्थ नहीं समझते। इन सभी आवरणों से ढकी आत्मा को अपनी पहचान करने में और अपनी राह पर चलने में बहुत मुश्किल होती है।
द पाथ ऑफ़ द मास्टर्ज़
एक समय था जब हमारी सुरत दिव्य अमृत का पान करती थी। बदक़िस्मती से आज आत्मा की ख़ुराक काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार है, इसलिए यह अंधकार में है।अगर अंधकार प्रकाश को समझने की कोशिश करे तो वह कभी सफल नहीं होगा। अंधकार अपने आप को सीमित कर लेता है। लेकिन एक बात तय है; जहाँ प्रकाश होता है वहाँ अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए अंधेरा नहीं ठहर सकता। इसलिए ख़ुशी की बात यह है कि अंधेरे का अपना कोई वुजूद नहीं है, यह केवल हमारे मन में प्रकाश का अभाव है। इस अंधकारमय अवस्था में हमने अपने सच्चे आंतरिक स्वरूप से अलग अपनी एक पहचान बना ली है जिस कारण हम माया और ग़लत धारणाओं में जीने के लिए मजबूर हैं। नतीजा यह होता है कि हम जो कुछ भी महसूस करते, समझते या अनुभव करते हैं उसकी वजह यही विकृत धारणाएँ हैं और इनकी कोई असलियत नहीं है।
हम अपनी इंद्रियों द्वारा जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह बस एक भ्रम है। प्रोजेक्टर में रोशनी होती है: वही परम सत्ता है। फिर उसमें फ़िल्म होती है जिसमें से होकर रोशनी चमकती है: वही मन है। और फिर एक पर्दा होता है जिस पर छवियों के प्रतिबिंब दिखाई देते हैं: वही यह संसार है…प्रोजेक्टर की रोशनी बंद कर दीजिए और सब कुछ गायब हो जाएगा।
वन बीइंग वन
मान लीजिए कि हमारे पास ख़ूबसूरती से तराशा हुआ काँच का टुकड़ा है। जब हम इसे देखते हैं तो यह हमें हीरे की तरह लगता है। जबकि असल में वह काँच ही है। हीरा कहाँ है? उसका अस्तित्व कहाँ है? असल में तो उसका कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि वह तो काँच है। हीरे का अस्तित्व सिर्फ़ हमारी सोच में है। अगर हीरों का कोई जौहरी उस टुकड़े का मूल्यांकन करे तो वह उसके काँच होने की पुष्टि करेगा। जब काँच के हीरा होने का भ्रम दूर होता है तब अगर वह टुकड़ा हमसे कहीं खो जाए या इधर-उधर रखा जाए तो हमें उसके खोने का कोई अफ़सोस नहीं होता।
जिस तरह चंद्रमा सूर्य की रोशनी को अपनी सतह पर परावर्तित करता है ठीक उसी तरह हमारा मन हमारी आत्मा से रोशनी लेता है। जब कोई व्यक्ति अपने मन के दायरे से ऊपर उठ जाता है तब उसे आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, ज्ञान रूपी प्रकाश उसके मन में प्रवेश कर जाता है और उसे सत्य का ज्ञान हो जाता है। उसे दुनिया की असलियत समझ आ जाती है। उसकी आंतरिक दृष्टि स्पष्ट हो जाती है और उसे दिखाई देने लगता है कि धन, प्रसिद्धि और दुनियावी रिश्ते सभी मिथ्या हैं, इसलिए वह उनके खो जाने से दु:खी नहीं होता। वह स्थूल जगत से बेलाग हो जाता है और अंतर में सिर्फ़ प्रभु के सच्चे प्रेम से जुड़ जाता है।
“आत्म-ज्ञान प्राप्त हो जाने का क्या अर्थ है?”
“समझ लेना।”
“क्या?”
“सफलता का खोखलापन, उपलब्धियों की अर्थहीनता, मनुष्य के संघर्ष की असारता,” सतगुरु ने समझाया।
एंथोनी डी मेलो, वन मिण्ट नॉनसेंस
महात्मा बुद्ध ने हमें यह समझाया कि हमारे सभी दु:खों का कारण अज्ञानता है। जब उनसे पूछा गया कि ऐसे दु:ख से उनका क्या अभिप्राय है तब उन्होंने इस बात को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया कि कैसे एक घोर अंधेरी रात में, एक व्यक्ति चट्टान से गिर गया। उसने रात के घोर अँधेरे में एक पेड़ की शाखा पकड़ ली। उसे इस बात का पता नहीं था कि नीचे क्या है – ज़मीन, गहरी घाटी या पानी।
वह सारी रात काँपता और रोता रहा। डर के मारे उसने शाखा को और भी कसकर पकड़ लिया। सुबह जब उजाला हुआ तब उसने देखा कि वह ज़मीन से सिर्फ़ एक फुट दूर था। यही अज्ञानता है और अज्ञानता में ऐसा ही होता है।
संत-महात्मा अकसर समझाते हैं कि अंधकार अज्ञानता का प्रतीक है क्योंकि हम इस बात से अनजान हैं कि हमारा असल स्वरूप क्या है। बाहरी तौर पर हम वर्तमान पल में रहकर, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हमने चाबियाँ कहाँ रखी थीं और बोलने से पहले सोचकर, जागरूकता का ‘अभ्यास’ कर सकते हैं। बेशक़ ये गुण सीखने लायक़ हैं लेकिन सच्ची जागरूकता तो अंतर में शब्द के बारे में सचेत होना है।
नाम या शब्द ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो हमें हमारी अज्ञानता और उसके फलस्वरूप पैदा हुए दु:खों से मुक्ति दिला सकती है। मन के अधीन होने के कारण हमें शब्द से जुड़ने के मार्ग या साधन का ज्ञान नहीं है। पूर्ण सतगुरु नामदान के समय हमें इसकी उचित युक्ति समझाते हैं। वह हमें निज-घर – सचखंड पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार॥
एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार॥
आदि ग्रंथ, गुरबानी सिलेक्शन्ज़, वॉल्यूम I, से उद्धरित
संस्कृत में, ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। सतगुरु हमें समझाते हैं कि हम भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा अपनी आंतरिक आँखों में नाम रूपी सुरमा कैसे डाल सकते हैं – यह एक ऐसा रूपक है जो शब्द की शक्ति को दर्शाता है कि शब्द रूहानी तौर पर अंधों को रोशनी देता है ताकि वे देख सकें।
भजन-सिमरन में तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी होती है क्योंकि आत्मा को अलौकिक प्रकाश के साथ सहज होने में समय लगता है। सतगुरु के लिए किसी आत्मा को रूहानी तौर पर परिपक्व हुए बिना रूहानी मंडलों में ले जाकर उस आंतरिक प्रकाश का प्रत्यक्ष अनुभव करवाना बिलकुल भी मुश्किल नहीं है। लेकिन शिष्य के लिए उस अलौकिक प्रकाश को एकाएक देखना और बर्दाश्त करना आसान नहीं होगा। इसे देखने के लिए हमारी आंतरिक आँख का धीरे-धीरे खुलना ही सही है ताकि हम इस दुनिया में अपना संतुलन न खो बैठें।
हक़ीक़त के नज़दीक आना सूरज के नज़दीक आने जैसा है। हमारा उद्देश्य आंतरिक प्रकाश के नज़दीक आते जाना है जब तक कि हमारा अहंकार समाप्त न हो जाए। फिर आत्मा उस पतंगे जैसी हो जाती है जिसमें ज्योति के लिए इतनी तीव्र कशिश होती है कि वह तेज़ी से लौ की ओर बढ़ता जाता है और उस में अपनी हस्ती और पहचान खो देता है।
प्रकाश की क़द्र करने के लिए पहले अंधकार से गुज़रना होगा। भजन-सिमरन करते समय जब हमें अंदर कुछ दिखाई नहीं देता तो वह असल में ‘शून्य अवस्था’ नहीं होती बल्कि यह अंधकारपूर्ण आकाश है जो हम देखते हैं। अगर हम अपने ध्यान को बिना भटकाए तीसरे तिल पर एकाग्र करें तो हमारे अंदर शब्द की ध्वनि और प्रकाश प्रकट हो जाते हैं।
तब तक, सृष्टि की इस व्यवस्था में अंधकार अपनी भूमिका निभाता है। हर चीज़ का अपना समय होता है, हर चीज़ के पीछे कोई वजह होती है और हर चीज़ के पनपने का अपना मौसम होता है। बीज को अंकुरित होने के लिए कुछ समय के लिए सूरज की रोशनी से दूर, ज़मीन के नीचे रहना पड़ता है तभी वह अंकुरित होकर प्रकाश में आता है।
वह प्रकाश हमारे अंदर है, पर जब तक हम उस प्रकाश को अंदर देख नहीं लेते, जब तक हम उसमें समा नहीं जाते, तब तक हमें उस प्रकाश की पहचान नहीं होती। हज़रत ईसा ने कहा है, ‘अगर तुम एक आँख वाले हो जाओगे तो तुम्हारा पूरा शरीर प्रकाश से भर जायेगा।’…उस प्रकाश को देखने के लिये आपको अंदर की वह तीसरी आँख खोलनी होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
सच्ची दौलत
हम अकसर अपनी ज़मीन-जायदाद, धन-संपत्ति को ही अपनी दौलत मानते हैं। रुपया-पैसा हमारी सांसारिक ज़रूरतों को पूरा करने का साधन है लेकिन इसे हमारी सच्ची दौलत नहीं कहा जा सकता। दौलत को संपन्नता के रूप में परिभाषित किया जाता है। अगर हम इस बात को समझ लें तो सच्ची दौलत वह है जिसे हम अनुभव करते हैं न कि जिसके हम मालिक होते हैं। सच्ची दौलत का अर्थ हर किसी के लिए अलग हो सकता है; कुछ लोगों के लिए अच्छा स्वास्थ्य सच्ची दौलत है जबकि हो सकता है कि दूसरों के लिए संतोष या करुणा ही सच्ची दौलत हो। सच्ची दौलत को मापना मुश्किल है लेकिन इसे प्यार, ख़ुशी, अच्छे काम करने के अवसर आदि कई तरीक़ों से ज़ाहिर किया जा सकता है।
संतमत पर चलने वाले जिज्ञासुओं या नामदान प्राप्त कर चुके लोगों के लिए रूहानी दौलत ही उनकी सच्ची दौलत है। मीराबाई ने नाम को ही सच्ची दौलत कहा है:
पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो॥
बस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर, किरपा कर अपनायो॥
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो॥
खरचै नहिं कोइ चोर न लेवे, दिन दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाव खेवटिया सतगुर, भवसागर तर आयो॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
मीरा: प्रेम दीवानी
भजन-सिमरन रूहानी दौलत को इकट्ठा करने का साधन है। महाराज चरन सिंह जी समझाते हैं कि भजन-सिमरन करके हम स्वर्ग में ख़ज़ाना जमा करते हैं:
अगर दिन भर में आप दस रुपये कमाएँ और शाम को सब ख़र्च कर दें तो जहाँ से दिन शुरू किया था वहीं रह जाएँगे। सत्संग भजन की उस दौलत की रक्षा करने में आपकी मदद करेगा। सत्संग आपको नम्र रहने में सहायता देगा ताकि आप उस प्रभु के प्रतिद्वंद्वी न बन जाएँ…सत्संग आपको परमात्मा की इच्छा में रहने में मदद देगा और यही सच्ची नम्रता है, आजिज़ी है। परमात्मा अंतर में आप पर जो दया-मेहर करेगा, सत्संग उसकी रक्षा करेगा।
जीवत मरिए भवजल तरिए
संतमत का ढंग बड़ा सिलसिलेवार है। इसकी रूप-रेखा इस तरह से तैयार की गई है कि यह हमें भजन-बंदगी के लिए प्रेरित करता है। इस मार्ग पर रखा गया हर क़दम हमें रूहानी तौर पर सच्ची मुक्ति के लिए तैयार करता है। जब हम जिज्ञासु होते हैं तब हमें मार्ग के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में पता चलता है। नामदान के समय हमें यह समझाया जाता है कि उन्हें जीवन में कैसे अपनाना है और कैसे रोज़मर्रा के जीवन में अपनी प्राथमिकताओं को तय करना है। वे चार वायदे जो हमसे लिए जाते हैं, पहले से बेहतर इनसान बनने में हमारी मदद करते हैं। सत्संग और सेवा द्वारा भी हमें मदद मिलती है। सत्संग से रूहानी माहौल बनता है और हम नकारात्मक वृत्तियों से बच जाते हैं। साथ ही सत्संग हमें हमारे रूहानी कर्त्तव्य के बारे में लगातार याद दिलाता है। सेवा द्वारा जैसे-जैसे हमारे अंदर विनम्रता पैदा होती है, हमें एहसास होता है कि हमें कितना कुछ दिया गया है, साथ ही हमें मिल-जुलकर सेवा करने के महत्त्व का पता चलता है और हम अपने साथी सेवादारों की इज़्ज़त करना सीखते हैं। आख़िर में, हमारे पास अनगिनत किताबें, रिकॉर्ड किए हुए बहुत-से सत्संग और अलग-अलग भाषाओं में चैनल उपलब्ध हैं जो रूहानी दौलत को इकट्ठा करने में हमारी मदद करते हैं।
जब हम वायदों का पालन दृढ़तापूर्वक करते हैं तब हम अपनी रूहानी दौलत में निवेश कर रहे होते हैं। जो सेवा हम करते हैं, जो आध्यात्मिक पुस्तकें हम पढ़ते हैं और जो सत्संग हम सुनते हैं सभी हमारे भजन-सिमरन को सशक्त बनाते हैं। भजन-सिमरन करने में बिताया गया हर पल हमें हमारी रूहानी मंज़िल की ओर ले जाता है।
हालाँकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्संग, सेवा और चारों वायदे मंज़िल तक पहुँचने का ज़रिया हैं, ख़ुद मंज़िल नहीं हैं। नाम एक ऐसा ख़ज़ाना है जो हमें हमारे सतगुरु की बख़्शिश द्वारा प्राप्त होता है और इसे इकट्ठा करने के लिए हमें हर रोज़ कोशिश करनी पड़ती है। हमें भजन-सिमरन द्वारा इसे बढ़ाने का यत्न करना चाहिए। अगर हम भजन-सिमरन नहीं करते तो रूहानी दौलत को जमा करने के लिए की गई अन्य कोशिशों से हमें कोई ख़ास लाभ प्राप्त नहीं होगा।
बूँद-बूँद करके सागर भरता है, ठीक उसी तरह रूहानी दौलत को इकट्ठा करने के लिए हमारा हर एक क़दम महत्त्वपूर्ण है। विश्वास, कोशिश और समर्पण द्वारा ही रूहानी दौलत को जमा किया जा सकता है और जब एक बार यह ख़ज़ाना जमा हो जाता है तो इसके खोने का कोई ख़तरा नहीं होता। जो कुछ हमने जमा किया है, वह हमारे अंतिम स्वाँस तक और उसके बाद भी हमारे साथ रहता है।
आपको वापस धुर-धाम जाने के लिये पारपत्र (passport) दे दिया गया है, जहाँ परमपिता आपके आने की राह देख रहा है। दुःख-दर्द के इस संसार में इससे बढ़कर ख़ुशी, दया और आनंद की बात और क्या हो सकती है? वास्तव में, इस मार्ग पर चलनेवाले सत्संगी के सिवाय इस संसार में और कोई सुखी नहीं हो सकता। उसे हमेशा अपने असली घर, धुर-धाम को ध्यान में रखना चाहिये जहाँ सब प्रकार के सुख और आनंद उसकी राह देख रहे हैं।
महाराज चरन सिंह जी, प्रकाश की खोज
हमारी रूहानी दौलत ही हमारा असल ख़ज़ाना है, हमारी सच्ची दौलत है जिससे हमें संपन्नता, आनंद, संतोष, शांति और जीने का मक़सद मिलता है। हम इस दौलत को माप नहीं सकते, केवल इसका आनंद ले सकते हैं। हर रोज़ हमारी यही कोशिश होनी चाहिए कि हम इस दौलत को इकट्ठा करें और इसे व्यर्थ बर्बाद न करें।
ख़ामोश!
अगर ज़मीर के ख़ज़ाने
के राज़ तक पहुँचना चाहते हो,
तो सिर्फ़ दिल वहाँ पहुँच सकता है,
ज़बाँ नहीं पहुँच सकती।
जलाल अल-दीन रूमी
रूहानी फुलझड़ियाँ
ऐ ग़ाफ़िल रूह
ऐ ग़ाफ़िल रूह,
जाग और पहचान अपने असल को।
तू कोयले का टुकड़ा नहीं,
बल्कि चमकता हीरा है।
आसान नहीं है राह रूहानी नूर की,
चुनौतियाँ बेशुमार रोकेंगी राह तेरी।
वक़्त है मशग़ूल हो जाने का,
स्नान रूहानी ही है बंदगी रोज़ की।
वक़्त आ गया है अपने घर लौटने का।
इक मुद्दत हुई तुझे दूर हुए,
इस दुनिया की गुबंद में क़ैद,
मन के बहकावे में उलझे।
ख़ुद को कर पाक-साफ़ कि ख़ुदा के लायक़ बने।
कर तैयारी उसके स्वागत की,
कर स्वागत हमसफ़र का,
मनाओ जश्न कि फिर से मिलन हुआ।
जाग उस गहरे अंधेरे से।
एक चित्त एक ध्यान हो,
पकड़ ले उस रौशन नूर को,
हो जा विलीन उस असीम-अनंत में।
एकाग्रता
21वीं शताब्दी में जिस तरह का जीवन हम जी रहे हैं, उसमें अपने ध्यान को एकाग्र करना मुश्किल होता जा रहा है। चाहे हम कामकाज पर हों, सड़क पर हों या छुट्टी पर, हमारे फ़ोन पर बीच-बीच में सूचना, संदेश की घण्टी या बीप बजती रहती है और हमसे अकसर यह उम्मीद की जाती है कि हम तुरंत जवाब दें। दुनिया की तेज़ रफ़्तार के साथ चलने के लिए हम ज़्यादा से ज़्यादा काम करते हैं, अपनी दिनचर्या को बहुत व्यस्त कर लेते हैं जो आज के समय में आम-सी बात हो गई है क्योंकि हमसे एक ही समय में अनेक कार्य करने की उम्मीद की जाती है।
एक समय में सिर्फ़ एक ही काम करना हमें बहुत नीरस लगता है और बिना कुछ किए बैठे रहना हमें सामान्य नहीं लगता। हम काम करते हुए साथ में संगीत सुनना शुरू कर देते हैं, टेलीविज़न पर अलग-अलग कार्यक्रम देखते हुए खाना खाते हैं और जब हमें जीवन के कुछ सबसे अनमोल पलों को जीना चाहिए तब हम सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने के लिए रील बनाने में लग जाते हैं। हम अपने मन को दुनिया में व्यस्त रखने और मनोरंजन में लगाए रखने के इतने आदी हो चुके हैं कि अब हमारा इस लत पर कोई नियंत्रण नहीं रहा।
बेशक़, इसकी एक क़ीमत चुकानी पड़ती है—निरंतर गतिविधियाँ हमारे ध्यान को भंग कर रही हैं और हमारी एकाग्रता में गंभीर रूप से बाधा बन रही हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सफलता और ख़ुशी मन के सक्रिय होने से नहीं बल्कि एकाग्र होने से मिलेगी।
मन की एकाग्रता आपको शांति और आनंद देती है। आपका मन जितना अधिक फैला होता है, आप उतने ही ज़्यादा उदास और दु:खी रहते हैं। जितना ज़्यादा आपका मन केंद्रित और एकाग्र होता है, आप उतने ही ख़ुश और शांतचित्त रहते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
हमें प्यार के एहसास से आनंद क्यों मिलता है? एक मधुर गीत हमें आनंदित क्यों करता है? वह इसलिए क्योंकि हमारे जज़्बात और एहसास हमारे फैले हुए ख़याल को इकट्ठा कर देते हैं जिससे ध्यान को केंद्रित और एकाग्र होने में मदद मिलती है। आनंद का एहसास ख़ास परिस्थितियों में होता है मगर यह उन परिस्थितियों की वजह से पैदा नहीं होता; यह हमारे अंदर से पैदा होता है जब हम मन को एकाग्र और स्थिर कर पाते हैं ।
इस मार्ग पर चलनेवाले साधक होने के नाते हमारा मक़सद मन को तीसरे तिल पर टिकाना है ताकि हम ख़ुद को आत्मा की लय यानी शब्द और परमात्मा से जोड़ सकें जो परम शांति व आनंद का मूल स्त्रोत है। हमारा एक ही कर्त्तव्य है और वह है पाँच नाम के सिमरन द्वारा ध्यान को एकाग्र करने का अभ्यास करना। इस दुनिया में हमारे समय और ध्यान के लायक़ इससे ज़्यादा ज़रूरी और कोई काम नहीं है।
हम अकसर अपने भजन-सिमरन को यह सोचकर कम समय देते हैं कि हमें दूसरे कार्यों को करने के लिए समय चाहिए। हालाँकि अगर हम अपना दिन शुरू करने से पहले भजन-सिमरन करने को पहल दें तो इससे न केवल हम अपने असल वुजूद से जुड़ पाएँगे बल्कि इससे प्राप्त हुई एकाग्रता रोज़मर्रा की चुनौतियों का धैर्य के साथ सामना करने में हमारी मदद करेगी। भजन-सिमरन में लगाया गया समय ही सार्थक है—यह कभी व्यर्थ नहीं जाता।
हम हर रोज़ जो एकाग्र होने की कोशिश करते हैं, वह हम एकाग्र होने की आदत डालते हैं।…यह हमारे पूरे दिन के कामकाज में भी हमारे साथ बनी रहती है। यह एकाग्रता किसी ख़ास वक़्त तक सीमित नहीं होती। हर बात में एकाग्र रहने की, अपने जीवन के छोटे से छोटे काम में भी एकाग्र होने की एक आदत बन जाती है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
यह संसार हमारे ख़याल को बाहर सैकड़ों दिशाओं में भटकाता है मगर हमें इस नकारात्मक बहाव के विपरीत चलना है। यह आसान नहीं है, पर रूहानी मंज़िल पर पहुँचने के लिए पूर्ण एकाग्रता और ध्यान इसी पर निर्भर है।
सवाल किसी तरह भी तीसरे तिल में पहुँचने का है। आपको अपने ही ख़याल को एकाग्र करना है। अगर आपने अपने ख़याल को तीसरे तिल में इकट्ठा कर लिया तो आपने अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई जीत ली।…कवि, चित्रकार और गायक इसी केन्द्र से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। सभी महान् विचारक अपने विचारों की स्पष्टता के लिए इसी केन्द्र से मदद पाते हैं। दुनिया में जो भी वैज्ञानिक उन्नति हुई है तीसरा तिल ही उसका केन्द्र है। आँखों के पीछे का यह केन्द्र सभी प्रेरणाओं का स्रोत है, जिससे संसार के सब श्रेष्ठ ग्रन्थ उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में भी हम जो उन्नति करेंगे, उसके लिए भी ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत यही बिन्दु रहेगा। आध्यात्मिक संघर्ष में लगे हुए मनुष्य से मिलने के लिए परमात्मा की किरण ऊपर के मण्डलों से उतरकर इसी केन्द्र में आती है।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
हुज़ूर के सत्संग दौरे
हैवन ऑन अर्थ से उद्धरित
अगर हम गुरु नानक साहिब, कबीर साहिब और गुरु रविदास जी जैसे संतों के जीवन के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि यातायात के सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ कीं, संतमत की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया और जिज्ञासुओं को नामदान की बख़्शिश की। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी अकसर भारी असुविधा और कष्ट सहते हुए अट्ठासी वर्ष की आयु तक सत्संग देने के लिए दौरे करते रहे। अपनी बीमारी के बावजूद, सरदार बहादुर महाराज जी ने भी सत्संग, दर्शन और नाम की बख़्शिश करने के लिए कई दौरे किए। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी ने न सिर्फ़ भारत में बल्कि विदेशों में भी उस महान परंपरा को जारी रखा, सच कहें तो आप ने दुनिया भर में यात्राएँ कीं। आपने उन बहुत-से देशों में भी संतमत के उपदेश को पहुँचाया, जहाँ पहले कभी किसी पूर्ण संत के आगमन का कोई रिकॉर्ड तक नहीं है।
यद्यपि महाराज जी ने सन् 1961 तक कोई विदेशी दौरा नहीं किया, फिर भी उन्होंने गुरुगद्दी पर विराजमान होने के कुछ महीनों बाद ही भारत में अपने दौरे शुरू कर दिए। सन् 1952 की गर्मियों में मैदानी इलाकों की गर्मी से राहत पाने के लिए डलहौज़ी की यात्रा की और सत्संग देने के लिए आस-पास के पहाड़ी इलाकों की यात्राएँ कीं। इससे पहले, महाराज जी ने मार्च, सन् 1952 में अमृतसर में एक सत्संग फ़रमाया था जो कि डेरे से बाहर आपका पहला सत्संग था। सत्संगियों और साधकों की बहुत ज़्यादा भीड़ उमड़ी थी और सत्संग हॉल का खुला परिसर खचाखच भरा हुआ था। महाराज जी ने नवंबर, सन् 1953 में दिल्ली में दो सत्संग दिए, यह दिल्ली में आपका पहला सत्संग दौरा था। सत्संग शामियानों के नीचे खुले मैदान में आयोजित किए गए थे, और वहाँ संगत की गिनती पंद्रह हज़ार से भी अधिक थी।
बड़े महाराज जी के एक पुराने शिष्य, बख़्शी मलूक चंद जी ने सन् 1950 के दशक के आरंभ में महाराज जी की पहली दिल्ली यात्रा का एक दिलचस्प किस्सा सुनाया:
महाराज जी ने मुझे बुलाकर कहा, “बाबा जी महाराज के एक वृद्ध सत्संगी भाई नारायण दास जी यहाँ दिल्ली में रहते हैं। कृपया जाकर उनसे कह दें कि मैं कल शाम चार बजे उनसे मिलने आऊँगा।”
मैं भाई नारायण दास को जानता था और उनसे अकसर मिलता रहता था। उसी दिन मैं उनके घर गया। जब मैंने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी, तो उन्होंने आवाज़ लगाई, “अंदर आ जाइए, बख़्शी जी।” मैं हैरान रह गया और अंदर जाकर मैंने उनसे पूछा कि आपको कैसे पता चला कि मैं ही आपके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हूँ। उन्होंने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया बल्कि मुझसे कहा कि जो संदेश मैं लाया हूँ, वह उन्हें दे दूँ। मैं जानता था कि वह एक कमाईवाली रूह हैं और अब अपना ज़्यादातर समय भजन-सिमरन में ही बिताते हैं, इसलिए मैंने पूछा, “भाई साहिब, बताइए, आपको कैसे पता चला कि मैं ही आपके दरवाज़े पर आया हूँ और यह भी कि मेरे पास आपके लिए एक संदेश है?”
पहले तो भाई नारायण दास मेरे सवाल का जवाब देने में आनाकानी करते रहे। मेरे ज़ोर देने पर आख़िरकार उन्होंने बताया कि परसों बाबा जी महाराज अंदर प्रकट हुए थे और उन्होंने फ़रमाया था, “नारायण दास, मैं परसों शाम चार बजे तुम्हारे पास देहस्वरूप में आऊँगा।”
यह सुनकर मैंने उन्हें महाराज जी का संदेश सुनाया। वह बहुत प्रसन्न हो गए और इतना सुखद संदेश लाने के लिए उन्होंने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया। मैंने ऐतराज़ किया, “संदेश तो आपके पास पहले से ही था, फिर मुझे धन्यवाद क्यों?” उन्होंने उत्तर दिया, “जब सतगुरु द्वारा अंदर दिए गए संदेश सच हो जाते हैं, तो आनंद महसूस होना क़ुदरती है।”
अगले दिन जब हुज़ूर महाराज जी, बाबा जी महाराज के इस वृद्ध शिष्य से मिलने आए, तो मैं भी वहीं मौजूद था; महाराज जी उनके साथ आधे घंटे तक रहे। पूरा समय भाई नारायण दास उन्हें एकटक देखते रहे, ज़ाहिर है कि वे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे क्योंकि सतगुरु देहस्वरूप में उनसे मिलने के लिए आए थे।
समझदारी-भरे जवाब
गुरु नानक देव जी के बारे में एक जानी-मानी साखी है। गुरु साहिब ने कुछ लोगों को गंगा में नहाते हुए देखा। उन्होंने देखा कि वे लोग सूरज की ओर पानी डाल रहे थे। इस पर गुरु नानक देव जी ने उनसे पूछा: “तुम लोग यह क्या कर रहे हो?”
उन्होंने जवाब दिया, “हम सूरज को पानी भेज रहे हैं।”
यह सुनकर गुरु नानक देव जी गंगा नदी में उतर गए और उलटी दिशा में पानी डालना शुरू कर दिया।
लोग हैरान रह गए और पूछने लगे, “यह आप क्या कर रहे हैं?”
गुरु नानक देव जी ने बड़े शांत भाव से कहा: “मैं करतारपुर अपने खेतों में पानी दे रहा हूँ। मेरे खेत इस दिशा में हैं।”
“करतारपुर में आपके खेतों तक पानी कैसे पहुँचेगा?”
गुरु नानक साहिब ने बड़े सहज भाव से कहा: “अगर आपका पानी सूरज तक पहुँच सकता है तो मेरा क्यों नहीं, मेरे खेत तो पास ही हैं।”
मत को भरम भुलै संसार
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कहा जाता है कि बसन्त ऋतु में राबिया घर के अंदर दाख़िल हुईं और बाहर नहीं निकलीं। उनकी सेविका ने कहा, “मालकिन, बाहर आइए और क़ुदरत के नज़ारे देखिए!” राबिया ने उत्तर दिया, “आप एक बार अंदर आइए और क़ादिर का दीदार कीजिए! क़ादिर के दीदार में मसरूफ़ होने के कारण मेरे पास क़ुदरत के नज़ारे देखने का वक़्त नहीं।”
राबिया, द वुमन हू मस्ट बी हर्ड
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जुनैद को मुर्शिद मानकर शिबली उनके पास गया और बोला, “बहुत-से लोगों ने मुझे बताया है कि आप जाग्रति और इल्मे इलाही (दिव्य ज्ञान) रूपी मोतियों में माहिर हैं। आप उनमें से एक मोती मुझे दे दें या एक मोती मुझे बेच दें।”
जुनैद ने मुस्कराकर कहा, “अगर मैं इसे बेचता हूँ तो तुम इसकी क़ीमत नहीं चुका सकोगे। अगर मैं इसे तुम्हें मुफ़्त देता हूँ तो इतनी आसानी से मिलने की वजह से तुम इसकी क़द्र नहीं करोगे। तुम वैसा ही करो जैसा मैंने किया है और समुद्र में कूद जाओ। अगर तुम सब्र से इंतज़ार करोगे तो तुम्हें मोती मिल जाएगा।”
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2
अंतर का प्रकाश
एक दिन सूर्य और गुफ़ा में बातचीत हुई। दोनों ने एक-दूसरे से ख़ैरियत पूछी और अपने रोज़मर्रा के जीवन के बारे में बातचीत की। सूर्य अंधकार के मायने नहीं समझ पा रहा था जबकि गुफा प्रकाश के अर्थ को नहीं समझ पा रही थी। उन्होंने कुछ पलों के लिए एक-दूसरे के जीवन में झाँकने का फ़ैसला किया। जब गुफा ने सूर्य के प्रकाश को देखा तो वह प्रकाश को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई; सूर्य के तेज प्रकाश में वह हर चीज़ को देख सकती थी। गुफा ने माना कि सूर्य का प्रकाश इतना अद्भुत था कि वह वर्णन से परे था। हालाँकि जब सूर्य गुफा में गया तो उसे कुछ भी फ़र्क़ नज़र नहीं आया। सूर्य और गुफा दोनों ही इस बात से हैरान थे। गुफा ने पाया कि सूर्य के प्रकाशमय संसार और उसके अंधेरे संसार में उल्लेखनीय अंतर था। हालाँकि सूर्य का मानना यह था कि दोनों के संसार एक जैसे दिखते हैं।
सूर्य को अंतर क्यों नहीं दिखाई दिया? जब सूर्य गुफा में गया, वह अपना प्रकाश साथ ले गया और गुफा के अंधेरे से अंधेरे कोने भी रोशन हो गए। सूर्य को तो केवल प्रकाश के बारे में ही पता था। इसी तरह, एक आत्म-ज्ञानी को कभी भी अँधकार में नहीं धकेला जा सकता क्योंकि उसका प्रकाश सदा उसके साथ ही रहता है। अगर किसी के अंदर अंधकार यानी नकारात्मकता, भय व संदेह है तो वह अनजाने में गुफा की तरह बन जाता है। लेकिन अगर कोई सूर्य की तरह प्रकाशवान है तो किसी भी तरह का अंधकार उसे प्रभावित नहीं कर पाता क्योंकि उसके पास प्रकाश है जिसमें अंधकार रह ही नहीं सकता।
हम सूर्य की तरह कैसे बनें? हम जहाँ भी जाएँ, वहाँ प्रकाश कैसे फैलाएँ? हमें यह प्रकाश कहाँ से मिलेगा? कहानी में गुफा और सूर्य मनुष्य की मानसिकता के प्रतीक हैं और जब हम अपने रूहानी सफ़र पर निकल पड़ते हैं तो धीरे-धीरे हम अँधेरे को प्रकाश में बदल सकते हैं। यह सफ़र उस दिव्य प्रकाश की खोज के लिए है जो हमारे भीतर मौजूद है जो हमारी हस्ती का सार है।
संत-महात्मा प्रकाश के पुंज होते हैं जो इस प्रकाश का अनुभव करने में हमारी मदद करते हैं। परमात्मा संत-महात्माओं को मनुष्य के रूप में भेजता है बिलकुल उसी तरह जिस तरह सूर्य अपनी किरणों को भेजता है। किरणें सूर्य से अलग नहीं होतीं; सूर्य की वजह से ही इनका अस्तित्व होता है और इनमें सूर्य जैसी ख़ूबियाँ होती हैं। जब सूर्य अस्त होता है तब वे किरणें सूर्य में समाकर सूर्य ही बन जाती हैं। किरणें सदा सूर्य से जुड़ी रहती हैं और सूर्य से दूर होने पर भी इनके गुण समान होते हैं – ये सदा सूर्य का हिस्सा होती हैं। इसी तरह, सतगुरु इंसान के रूप में हमारे स्तर पर आकर हमसे नाता जोड़ते हैं; वे स्वयं सत्य का निजी अनुभव कर चुके होते हैं और हमें मार्ग दिखा सकते हैं। वह निराकार परमात्मा स्वयं मनुष्य का रूप धारण करता है।
मैं जगत् की ज्योति हूँ। जो मेरे पीछे-पीछे आएगा, वह अंधकार में नहीं चलेगा बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा।
बाइबल, जॉन 8:12
हर का सेवक सो हर जेहा॥ भेद न जाणहो माणस देहा॥
गुरु नानक देव जी, प्रकाश की खोज
हज़रत ईसा भी इसी सत्य की पुष्टि करते हैं, जब वह फ़रमाते हैं:
मेरा विश्वास करो कि मैं परमपिता में हूँ, और परमपिता मुझमें है: नहीं तो मेरे इन कामों के कारण ही मेरा विश्वास करो।
बाइबल, जॉन 14:11
एक बार जब हमारा मिलाप पूर्ण संत-सतगुरु से हो जाता है जिन्होंने स्वयं आत्म-साक्षात्कार कर लिया है तब हमारा अपने आंतरिक प्रकाश की खोज का सफ़र शुरू हो जाता है। तब हम अपनी अज्ञानता के अंधकार को पीछे छोड़कर आंतरिक प्रकाश के क़रीब पहुँच सकते हैं जैसे कि ऊपर दी गई कहानी में बताया गया है। पूर्ण संत-सतगुरु ही हमें आंतरिक प्रकाश का नूरानी मार्ग दिखाते हैं और हमें शब्द या नाम के मार्ग का भेद बताते हैं।
पूर्ण संत-सतगुरु की दया-मेहर से जब जीव उस शब्द के साथ जुड़ जाता है तब उसकी आंतरिक आँखें खुल जाती हैं, उसकी आत्मा का अंधापन दूर हो जाता है। उसके अंदर इलाही नूर प्रकट हो जाता है और अज्ञानता का अंधकार दूर हो जाता है।
अंतर चानण अगिआन अंधेर गवाइआ॥
गुरु नानक देव जी, प्रकाश की खोज
इस आंतरिक प्रकाश का वर्णन करते हुए हज़रत ईसा ने फ़रमाया है:
शरीर का प्रकाश आँख है, इसलिए अगर तुम एक आँख वाले हो जाओ तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमय हो जाएगा।
बाइबल, मैथ्यू 6:22
नामदान के समय हमें अंतर में दिव्य प्रकाश को देखने और आवाज़ को सुनने की युक्ति समझाई जाती है। हमारी आत्मा उसी दिव्य शब्द या नाम का रूप है जो हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। हम इस रूहानी सत्य का अनुभव तभी कर सकते हैं जब हम भजन-सिमरन करके सतगुरु की दया-मेहर द्वारा शब्द या नाम में अभेद हो जाते हैं।
उलटा कूवा गगन में तिस में जरै चिराग॥
तिस में जरै चिराग बिना रोगन बिन बाती।
छ: रितु बारह मास रहत जरतै दिन राती॥
सतगुरु मिला जो होय ताहि की नजर में आवै।
बिना सतगुरु कोउ होय, नहीं वा को दरसावै॥
पलटू साहिब
चाहे वह दिव्य प्रकाश सदा हमारे भीतर जगमगा रहा है मगर सच्चे संत-सतगुरु के बिना हम अज्ञानता के घोर अंधकार में ही खोए रहेंगे। सतगुरु के बिना न तो प्रकाश दिखाई देता है, न ही मुक्ति मिल पाती है। सतगुरु शिष्य और मुक्ति के बीच की अहम कड़ी हैं।
दिल से दिल की बात
एक बार किसी ने महाराज जी से विनती की कि आप अपने परिवार, विशेष तौर पर अपने पिता जी के बारे में कुछ बतायें, क्योंकि वे न केवल एक सतगुरु के पिता थे, बल्कि एक सतगुरु के पुत्र भी थे। महाराज जी ने उत्तर दिया, “इसमें जाननेवाली कौन-सी बात है?” आपने समझाया कि जीवन-वृत्तान्त के विवरण सेनाध्यक्षों व राजनीतिज्ञों के बारे में शायद ज़रूरी हों, लेकिन सन्तों की जीवनी तो उनकी संगत होती है और उनका उपदेश होता है, जो उनकी संगत में प्रतिबिम्बित होता है।
प्रेम की विरासत
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बाबा सावन सिंह जी के असीम प्रेम और आध्यात्मिक महानता के बारे में सैकड़ों कहानियाँ सुनाई जाती हैं। इनमें से एक कहानी किसी अजनबी के बारे में है। वह सत्संग में बैठा महाराज जी के उपदेश को चुपचाप सुन रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह उठकर खड़ा हो गया और सत्संग को बीच में ही रोककर कहने लगा कि उसे विश्वास नहीं होता कि सत्संग करनेवाला गुरु सच्चा है और उसका तात्पर्य यह था कि वह एक पाखंडी है।
वहाँ उपस्थित सत्संगी हक्के-बक्के रह गए और बहुत क्रोधित हो गए, वे उसे बाहर निकालने ही वाले थे कि महाराज जी ने उन्हें संयम में रहने का संकेत देकर शांत किया और कहा, “तुम इस पर क्रोधित क्यों हो रहे हो? उसे अपनी राय रखने का अधिकार है और जब मैं क्रोधित नहीं हूँ, तो तुम क्यों क्रोधित हो रहे हो?”
इसके तुरंत बाद वह अजनबी महाराज जी के चरणों पर गिर पड़ा और उसने स्वीकार किया: “मैं कई वर्षों से किसी पूर्ण सतगुरु की खोज कर रहा हूँ। मैंने कई लोगों पर यह कठोर चाल चली है जो सच्चे संत होने का दावा करते थे पर वे हमेशा बहुत अधिक क्रोधित हो जाते थे। मैं हर बार यही सोचता था, ‘तो इन्होंने अभी तक पाँच शत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं की है, जिनमें से एक क्रोध है और इसलिए अभी इनका ख़ुद पर ही नियंत्रण नहीं है।’ और मैंने यह सोचकर खोज जारी रखी कि अभी भी सच्चे गुरु की तलाश करना बाक़ी है। मुझे अब जाकर एक ऐसा गुरु मिला है जो क्रोध या कड़वाहट से मुक्त है। मुझे आख़िरकार एक सच्चा संत मिल गया है।”
द मिस्टिक फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ संत मत
हर दूसरे महीने प्रकाशित होने वाली पत्रिका, रूहानी रिश्ता, दुनिया भर के विभिन्न देशों के सेवादारों की टीमों द्वारा निर्मित की जाती है। इसके मौलिक लेख, कविताएँ और कार्टून संत मत की शिक्षाओं को अनेक दृष्टिकोणों और सांस्कृतिक परिवेशों से प्रस्तुत करते हैं। नए संस्करण प्रत्येक दूसरे महीने की पहली तारीख को, 1 जनवरी से शुरू होते हुए, पोस्ट किए जाएंगे।
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