समझदारी-भरे जवाब
गुरु नानक देव जी के बारे में एक जानी-मानी साखी है। गुरु साहिब ने कुछ लोगों को गंगा में नहाते हुए देखा। उन्होंने देखा कि वे लोग सूरज की ओर पानी डाल रहे थे। इस पर गुरु नानक देव जी ने उनसे पूछा: “तुम लोग यह क्या कर रहे हो?”
उन्होंने जवाब दिया, “हम सूरज को पानी भेज रहे हैं।”
यह सुनकर गुरु नानक देव जी गंगा नदी में उतर गए और उलटी दिशा में पानी डालना शुरू कर दिया।
लोग हैरान रह गए और पूछने लगे, “यह आप क्या कर रहे हैं?”
गुरु नानक देव जी ने बड़े शांत भाव से कहा: “मैं करतारपुर अपने खेतों में पानी दे रहा हूँ। मेरे खेत इस दिशा में हैं।”
“करतारपुर में आपके खेतों तक पानी कैसे पहुँचेगा?”
गुरु नानक साहिब ने बड़े सहज भाव से कहा: “अगर आपका पानी सूरज तक पहुँच सकता है तो मेरा क्यों नहीं, मेरे खेत तो पास ही हैं।”
मत को भरम भुलै संसार
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कहा जाता है कि बसन्त ऋतु में राबिया घर के अंदर दाख़िल हुईं और बाहर नहीं निकलीं। उनकी सेविका ने कहा, “मालकिन, बाहर आइए और क़ुदरत के नज़ारे देखिए!” राबिया ने उत्तर दिया, “आप एक बार अंदर आइए और क़ादिर का दीदार कीजिए! क़ादिर के दीदार में मसरूफ़ होने के कारण मेरे पास क़ुदरत के नज़ारे देखने का वक़्त नहीं।”
राबिया, द वुमन हू मस्ट बी हर्ड
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जुनैद को मुर्शिद मानकर शिबली उनके पास गया और बोला, “बहुत-से लोगों ने मुझे बताया है कि आप जाग्रति और इल्मे इलाही (दिव्य ज्ञान) रूपी मोतियों में माहिर हैं। आप उनमें से एक मोती मुझे दे दें या एक मोती मुझे बेच दें।”
जुनैद ने मुस्कराकर कहा, “अगर मैं इसे बेचता हूँ तो तुम इसकी क़ीमत नहीं चुका सकोगे। अगर मैं इसे तुम्हें मुफ़्त देता हूँ तो इतनी आसानी से मिलने की वजह से तुम इसकी क़द्र नहीं करोगे। तुम वैसा ही करो जैसा मैंने किया है और समुद्र में कूद जाओ। अगर तुम सब्र से इंतज़ार करोगे तो तुम्हें मोती मिल जाएगा।”
आध्यात्मिक मार्गदर्शक, भाग 2