एकाग्रता
21वीं शताब्दी में जिस तरह का जीवन हम जी रहे हैं, उसमें अपने ध्यान को एकाग्र करना मुश्किल होता जा रहा है। चाहे हम कामकाज पर हों, सड़क पर हों या छुट्टी पर, हमारे फ़ोन पर बीच-बीच में सूचना, संदेश की घण्टी या बीप बजती रहती है और हमसे अकसर यह उम्मीद की जाती है कि हम तुरंत जवाब दें। दुनिया की तेज़ रफ़्तार के साथ चलने के लिए हम ज़्यादा से ज़्यादा काम करते हैं, अपनी दिनचर्या को बहुत व्यस्त कर लेते हैं जो आज के समय में आम-सी बात हो गई है क्योंकि हमसे एक ही समय में अनेक कार्य करने की उम्मीद की जाती है।
एक समय में सिर्फ़ एक ही काम करना हमें बहुत नीरस लगता है और बिना कुछ किए बैठे रहना हमें सामान्य नहीं लगता। हम काम करते हुए साथ में संगीत सुनना शुरू कर देते हैं, टेलीविज़न पर अलग-अलग कार्यक्रम देखते हुए खाना खाते हैं और जब हमें जीवन के कुछ सबसे अनमोल पलों को जीना चाहिए तब हम सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने के लिए रील बनाने में लग जाते हैं। हम अपने मन को दुनिया में व्यस्त रखने और मनोरंजन में लगाए रखने के इतने आदी हो चुके हैं कि अब हमारा इस लत पर कोई नियंत्रण नहीं रहा।
बेशक़, इसकी एक क़ीमत चुकानी पड़ती है—निरंतर गतिविधियाँ हमारे ध्यान को भंग कर रही हैं और हमारी एकाग्रता में गंभीर रूप से बाधा बन रही हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सफलता और ख़ुशी मन के सक्रिय होने से नहीं बल्कि एकाग्र होने से मिलेगी।
मन की एकाग्रता आपको शांति और आनंद देती है। आपका मन जितना अधिक फैला होता है, आप उतने ही ज़्यादा उदास और दु:खी रहते हैं। जितना ज़्यादा आपका मन केंद्रित और एकाग्र होता है, आप उतने ही ख़ुश और शांतचित्त रहते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
हमें प्यार के एहसास से आनंद क्यों मिलता है? एक मधुर गीत हमें आनंदित क्यों करता है? वह इसलिए क्योंकि हमारे जज़्बात और एहसास हमारे फैले हुए ख़याल को इकट्ठा कर देते हैं जिससे ध्यान को केंद्रित और एकाग्र होने में मदद मिलती है। आनंद का एहसास ख़ास परिस्थितियों में होता है मगर यह उन परिस्थितियों की वजह से पैदा नहीं होता; यह हमारे अंदर से पैदा होता है जब हम मन को एकाग्र और स्थिर कर पाते हैं ।
इस मार्ग पर चलनेवाले साधक होने के नाते हमारा मक़सद मन को तीसरे तिल पर टिकाना है ताकि हम ख़ुद को आत्मा की लय यानी शब्द और परमात्मा से जोड़ सकें जो परम शांति व आनंद का मूल स्त्रोत है। हमारा एक ही कर्त्तव्य है और वह है पाँच नाम के सिमरन द्वारा ध्यान को एकाग्र करने का अभ्यास करना। इस दुनिया में हमारे समय और ध्यान के लायक़ इससे ज़्यादा ज़रूरी और कोई काम नहीं है।
हम अकसर अपने भजन-सिमरन को यह सोचकर कम समय देते हैं कि हमें दूसरे कार्यों को करने के लिए समय चाहिए। हालाँकि अगर हम अपना दिन शुरू करने से पहले भजन-सिमरन करने को पहल दें तो इससे न केवल हम अपने असल वुजूद से जुड़ पाएँगे बल्कि इससे प्राप्त हुई एकाग्रता रोज़मर्रा की चुनौतियों का धैर्य के साथ सामना करने में हमारी मदद करेगी। भजन-सिमरन में लगाया गया समय ही सार्थक है—यह कभी व्यर्थ नहीं जाता।
हम हर रोज़ जो एकाग्र होने की कोशिश करते हैं, वह हम एकाग्र होने की आदत डालते हैं।…यह हमारे पूरे दिन के कामकाज में भी हमारे साथ बनी रहती है। यह एकाग्रता किसी ख़ास वक़्त तक सीमित नहीं होती। हर बात में एकाग्र रहने की, अपने जीवन के छोटे से छोटे काम में भी एकाग्र होने की एक आदत बन जाती है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
यह संसार हमारे ख़याल को बाहर सैकड़ों दिशाओं में भटकाता है मगर हमें इस नकारात्मक बहाव के विपरीत चलना है। यह आसान नहीं है, पर रूहानी मंज़िल पर पहुँचने के लिए पूर्ण एकाग्रता और ध्यान इसी पर निर्भर है।
सवाल किसी तरह भी तीसरे तिल में पहुँचने का है। आपको अपने ही ख़याल को एकाग्र करना है। अगर आपने अपने ख़याल को तीसरे तिल में इकट्ठा कर लिया तो आपने अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई जीत ली।…कवि, चित्रकार और गायक इसी केन्द्र से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। सभी महान् विचारक अपने विचारों की स्पष्टता के लिए इसी केन्द्र से मदद पाते हैं। दुनिया में जो भी वैज्ञानिक उन्नति हुई है तीसरा तिल ही उसका केन्द्र है। आँखों के पीछे का यह केन्द्र सभी प्रेरणाओं का स्रोत है, जिससे संसार के सब श्रेष्ठ ग्रन्थ उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में भी हम जो उन्नति करेंगे, उसके लिए भी ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत यही बिन्दु रहेगा। आध्यात्मिक संघर्ष में लगे हुए मनुष्य से मिलने के लिए परमात्मा की किरण ऊपर के मण्डलों से उतरकर इसी केन्द्र में आती है।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2